[pj-news-ticker post_cat="breaking-news"]

नैक मान्यता, फर्जीवाड़ा और भारतीय उच्च शिक्षा का संकट


निष्पक्ष निर्भीक निरंतर
  • Download App from
  • google-playstore
  • apple-playstore
  • jm-qr-code
X
आर्टिकल

नैक मान्यता, फर्जीवाड़ा और भारतीय उच्च शिक्षा का संकट

गुणवत्ता मूल्यांकन की आड़ में प्रमाणपत्रों का व्यापार

भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में कभी विश्वविद्यालयों की पहचान उनके विद्वान शिक्षकों, शोध कार्यों और शैक्षणिक योगदान से होती थी। आज स्थिति बदल चुकी है। अब विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा पैमाना NAAC (राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद) की ग्रेडिंग बन गई है। किसी संस्थान की वेबसाइट पर चमकता हुआ A++, A+ या A ग्रेड विद्यार्थियों और अभिभावकों को आकर्षित करने का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुका है। यह ग्रेड जितना ऊंचा होता है, उतनी ही तेजी से प्रवेश बढ़ते हैं, फीस बढ़ती है और संस्थान का शैक्षणिक बाजार विस्तार पाता है।

डॉ सागर सिंह कछवा, लेखक शिक्षा और सामाजिक विषयो के स्वतंत टिप्पणीकार है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब गुणवत्ता का यह प्रमाणपत्र शिक्षा सुधार का माध्यम न रहकर व्यावसायिक लाभ का साधन बन जाता है।

NAAC की स्थापना उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए की गई थी। इसका उद्देश्य शिक्षण, अनुसंधान, छात्र सुविधाओं, नवाचार, प्रशासनिक पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मानकों के आधार पर संस्थानों का आकलन करना था। लेकिन समय के साथ ग्रेडिंग का आर्थिक महत्व इतना बढ़ गया कि अनेक संस्थानों के लिए वास्तविक गुणवत्ता से अधिक महत्वपूर्ण “उच्च ग्रेड प्राप्त करना” बन गया।

यहीं से शुरू होती है उस संकट की कहानी, जिसने भारतीय उच्च शिक्षा की विश्वसनीयता को चुनौती दी है।

देशभर में समय-समय पर ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं कि कुछ विश्वविद्यालय और महाविद्यालय मूल्यांकन के दौरान प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों में वास्तविकता से अधिक उपलब्धियां दर्शाते हैं। शोध पत्रों की संख्या बढ़ाकर दिखाना, कागजी संगोष्ठियां आयोजित करना, काल्पनिक एमओयू प्रस्तुत करना, मूल्यांकन टीमों के सामने अस्थायी व्यवस्थाओं का प्रदर्शन करना तथा रिकॉर्ड को कृत्रिम रूप से सुदृढ़ बनाना जैसी शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।

इन शिकायतों को केवल अफवाह मानकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि पिछले वर्षों में मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़े गंभीर विवाद राष्ट्रीय स्तर पर सामने आ चुके हैं। NAAC मूल्यांकन से जुड़े कथित रिश्वतकांड में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की कार्रवाई ने पूरे देश को चौंका दिया था। आरोप सामने आए कि कुछ संस्थानों को अनुकूल ग्रेड दिलाने के लिए लगभग 1 करोड़ 80 लाख रुपये की रिश्वत की मांग और लेन-देन हुआ। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था पर लगा प्रश्नचिह्न थी, जिस पर लाखों विद्यार्थियों का भविष्य आधारित है।

यदि गुणवत्ता का प्रमाणपत्र भी खरीद-फरोख्त और प्रभाव का विषय बन जाए, तो फिर शिक्षा और व्यापार के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

राजस्थान सहित देश के कई राज्यों में निजी विश्वविद्यालयों का तेजी से विस्तार हुआ है। इनमें अनेक संस्थान उच्च शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, किंतु कुछ विश्वविद्यालयों के संबंध में समय-समय पर गंभीर शिकायतें भी सामने आई हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के एक विश्वविद्यालय से संबंधित शिकायतों और आपत्तियों के कारण उसकी NAAC मूल्यांकन प्रक्रिया को स्थगित किए जाने की चर्चा शिक्षा जगत में हुई। यह किसी संस्थान के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं है, लेकिन यह अवश्य दर्शाता है कि मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान उठाए गए प्रश्नों को अब नजरअंदाज करना संभव नहीं रह गया है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किसी एक विश्वविद्यालय का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का है। यदि किसी संस्थान के विरुद्ध शिकायतें आने के बाद ही दस्तावेजों और दावों की जांच शुरू होती है, तो यह विचारणीय है कि मूल्यांकन प्रक्रिया में प्रस्तुत तथ्यों का स्वतंत्र सत्यापन कितना प्रभावी है। क्या केवल विश्वविद्यालयों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों के आधार पर गुणवत्ता का आकलन किया जा सकता है? क्या विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पूर्व विद्यार्थियों के अनुभवों को पर्याप्त महत्व दिया जाता है? क्या मूल्यांकन प्रक्रिया स्वयं पर्याप्त रूप से पारदर्शी है?

दुर्भाग्य से आज अनेक संस्थानों में शिक्षा सुधार से अधिक महत्व “ग्रेड सुधार” को मिलने लगा है। करोड़ों रुपये भवनों की रंगाई, प्रस्तुतियों, दस्तावेजीकरण और निरीक्षण तैयारियों पर खर्च किए जाते हैं, जबकि शिक्षकों की गुणवत्ता, अनुसंधान की मौलिकता और विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास जैसे मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ज्ञान का निर्माण और सामाजिक परिवर्तन व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की भीड़ में दबने लगता है।

इस स्थिति के लिए केवल संस्थानों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। नियामक संस्थाओं को भी आत्ममंथन करना होगा। आवश्यकता है कि मूल्यांकन प्रक्रिया में तकनीक आधारित सत्यापन, स्वतंत्र ऑडिट, आकस्मिक निरीक्षण, शोध प्रकाशनों की वास्तविक जांच, विद्यार्थियों की गोपनीय प्रतिक्रिया और व्हिसलब्लोअर संरक्षण जैसी व्यवस्थाओं को अनिवार्य बनाया जाए। साथ ही, मूल्यांकन रिपोर्टों को अधिक सार्वजनिक और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

भारत विश्वगुरु बनने का सपना देख रहा है। लेकिन विश्वगुरु बनने की राह फर्जी प्रमाणपत्रों, कृत्रिम उपलब्धियों और खरीदी गई प्रतिष्ठा से होकर नहीं गुजरती। किसी भी राष्ट्र की उच्च शिक्षा व्यवस्था का आधार विश्वास होता है। यदि विद्यार्थी यह मानने लगें कि उत्कृष्टता का प्रमाणपत्र भी प्रभाव, प्रबंधन और फर्जीवाड़े से प्राप्त किया जा सकता है, तो पूरी व्यवस्था की नैतिक नींव कमजोर पड़ जाती है।

आज आवश्यकता NAAC को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसे और अधिक स्वतंत्र, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की है। क्योंकि उच्च शिक्षा में गुणवत्ता का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का मूल्यांकन है।

यदि विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिरों के बजाय प्रमाणपत्रों के बाजार बन जाएं, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी संस्थान का नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का होगा जो शिक्षा में अपना भविष्य खोज रही है। -डॉ सागर सिंह कछवा, लेखक शिक्षा और सामाजिक विषयो के स्वतंत टिप्पणीकार है।

Related Articles

Mantratoto luwakpoker aladin66 tupaiwin rupiah89 kios77 TOKO22