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मर्डर होने पर भी बीमा कंपनी क्लेम देने से नहीं:देरी का बहाना बनाकर दावा खारिज करना गलत, 55 हजार का लगाया जुर्माना


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मर्डर होने पर भी बीमा कंपनी क्लेम देने से नहीं:देरी का बहाना बनाकर दावा खारिज करना गलत, 55 हजार का लगाया जुर्माना

मर्डर होने पर भी बीमा कंपनी क्लेम देने से नहीं:देरी का बहाना बनाकर दावा खारिज करना गलत, 55 हजार का लगाया जुर्माना

झुंझुनूं : जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग झुंझुनूं ने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी बीमित सदस्य की हत्या (मर्डर) हो जाती है, तो बीमा कंपनी इसे मृत्यु के कारणों से बाहर बताकर क्लेम भुगतान से इनकार नहीं कर सकती।

​उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेंद्र कुमार सैनी की पीठ ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के अड़ियल रवैये को अनुचित कार्य-व्यवहार और सेवा में गंभीर कमी माना है। आयोग ने कंपनी को मृतक किसान की नामांकित मां को ब्याज सहित बीमा राशि देने का आदेश सुनाया है, साथ ही कंपनी पर 55 हजार रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया है। मानसिक संताप के लिए 45 हजार और अदालती खर्च के 5,500 रुपये अलग से देने होंगे।

यह था मामला, चुनावी रंजिश में गई थी जान

​मामले के अनुसार रघुनाथपुरा निवासी अनुप देरवाला ग्राम सेवा सहकारी समिति का सदस्य था। वह सरकार की समूह व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना के तहत 5 लाख रुपये के लिए बीमित था। साल 2016 में पंचायती राज चुनाव की रंजिश को लेकर हुए एक हिंसक पारिवारिक झगड़े में अनुप देरवाला की हत्या कर दी गई थी। इस दिल दहला देने वाले झगड़े में अनुप के साथ उनके चाचा और चाचा के लड़के की भी मौत हो गई थी। ​अनुप की मृत्यु के बाद उनकी मां सुमित्रा बेनीवाल ने सहकारी समिति के माध्यम से बीमा क्लेम पेश किया था।

बीमा कंपनी की दलील, 78 दिन की देरी और आपराधिक मंशा

​बीमा कंपनी ने उपभोक्ता के इस दावे को तकनीकी आधारों पर खारिज कर दिया था। कंपनी का तर्क था कि घटना की सूचना उसे 78 दिन बाद दी गई, जबकि नियम के अनुसार यह तुरंत दी जानी चाहिए थी। इसके अलावा कंपनी ने यह भी आरोप लगाया कि मृतक स्वयं आपराधिक मंशा से उस झगड़े में शामिल था, इसलिए क्लेम का भुगतान नहीं किया जा सकता।

​आयोग की फटकार: तकनीकी आधार पर वैध दावों को नहीं रोक सकते

​दोनों पक्षों को सुनने के बाद उपभोक्ता आयोग ने पाया कि मृतक के परिजनों ने घटना के कुछ दिनों बाद ही संबंधित बैंक और सहकारी समिति को सूचित कर दिया था। आयोग ने साफ कहा कि यदि दावा प्रपत्र बीमा कंपनी तक पहुंचने में विलंब हुआ, तो इसके लिए पीड़ित परिवार जिम्मेदार नहीं है।

​फैसले की मुख्य टिप्पणी

“जब पुलिस जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य सरकारी दस्तावेजों से मृत्यु का तथ्य पूरी तरह स्थापित हो चुका हो, तो महज 78 दिन की देरी को आधार बनाकर दावा खारिज करना न्यायोचित नहीं है।”

​आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने निर्णय में रेखांकित किया कि बीमा कंपनी और राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के बीच हुए समझौते (MoU) में साफ लिखा है कि हत्या जैसी परिस्थितियों में भी बीमित सदस्य के उत्तराधिकारियों को 5 लाख रुपये की बीमा राशि देय होगी। इसके बावजूद कंपनी अपने दायित्व से बचने का प्रयास कर रही थी, जो उपभोक्ता संरक्षण कानून की भावना के खिलाफ है।

​ढिलाई बरती तो लगेगा 12.5% ब्याज

​उपभोक्ता आयोग ने पीड़ित मां को न्याय देते हुए बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि वह परिवाद दायर करने की तिथि से लेकर भुगतान के दिन तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 5 लाख रुपये की बीमा राशि अदा करे। इसके अलावा मानसिक संताप के लिए 45 हजार रुपये और वाद व्यय के रूप में 5,500 रुपये का भुगतान भी करना होगा।

​कल्याण कोष में जमा होगी पेनल्टी

बीमा कंपनी पर लगाई गई 55 हजार रुपये की शास्ति राशि ‘राजस्थान राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष, जयपुर’ में जमा करानी होगी। यदि कंपनी निर्धारित समय में इस आदेश की पालना नहीं करती है, तो उसे पूरी देय राशि पर 12.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। पालना न होने की स्थिति में आयोग के रीडर को वसूली के लिए अदालती (इजराय) कार्यवाही करने के लिए अधिकृत किया गया है।

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