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परीक्षा पेपर लीक मानसिक प्रताड़ना के साथ-साथ आर्थिक बोझ भी है


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परीक्षा पेपर लीक मानसिक प्रताड़ना के साथ-साथ आर्थिक बोझ भी है

परीक्षा पेपर लीक मानसिक प्रताड़ना के साथ-साथ आर्थिक बोझ भी है

देश और प्रदेश के लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं को अपने उज्ज्वल भविष्य का आधार मानकर वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। वे दिन-रात अध्ययन कर अपने सपनों को साकार करने का प्रयास करते हैं, लेकिन जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो जाता है, तब केवल परीक्षा की गोपनीयता ही भंग नहीं होती, बल्कि लाखों युवाओं के विश्वास, आत्मबल और भविष्य पर भी गंभीर आघात पहुँचता है।

पेपर लीक की घटनाएँ केवल प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि यह युवाओं के साथ होने वाला एक प्रकार का अन्याय और मानसिक उत्पीड़न है। जब कोई अभ्यर्थी महीनों अथवा वर्षों की तैयारी के बाद परीक्षा देता है और बाद में परीक्षा निरस्त हो जाती है, तब उसके मन में निराशा, हताशा और असुरक्षा की भावना जन्म लेती है। बार-बार परीक्षाओं का स्थगित होना अथवा रद्द होना युवाओं के आत्मविश्वास को कमजोर करता है और उन्हें मानसिक तनाव, अवसाद तथा भविष्य की अनिश्चितता की ओर धकेल देता है। इसके साथ ही पेपर लीक का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव आर्थिक रूप से कमजोर एवं पिछड़े वर्गों के विद्यार्थियों पर पड़ता है।

एक गरीब परिवार का युवा परीक्षा शुल्क, कोचिंग, अध्ययन सामग्री, आवास, भोजन और यात्रा पर अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा खर्च करता है। कई अभ्यर्थी दूर-दराज़ क्षेत्रों से परीक्षा केंद्रों तक पहुँचने के लिए ऋण तक लेने को मजबूर हो जाते हैं। जब परीक्षा रद्द होती है, तब उनका यह समस्त व्यय व्यर्थ चला जाता है और पुनः परीक्षा की तैयारी एवं सहभागिता के लिए उन्हें अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के युवाओं के लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है।

सीमित संसाधनों के बावजूद वे अपने परिवार और समाज की उम्मीदों को लेकर संघर्ष करते हैं, लेकिन पेपर लीक जैसी घटनाएँ उनके सपनों को बार-बार कुचलने का कार्य करती हैं। सरकार और प्रशासन का दायित्व है कि भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता एवं गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए कठोर एवं प्रभावी व्यवस्था लागू करे। पेपर लीक में संलिप्त व्यक्तियों के विरुद्ध त्वरित और कड़ी कानूनी कार्रवाई हो तथा ऐसी घटनाओं से प्रभावित अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के लिए ठोस नीति बनाई जाए।

युवा केवल रोजगार नहीं मांग रहे हैं, वे निष्पक्ष अवसर और अपने परिश्रम का सम्मान चाहते हैं। इसलिए पेपर लीक को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि युवाओं की मानसिक शांति, आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़े गंभीर मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि समय रहते इस पर कठोर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह देश की प्रतिभा, विश्वास और भविष्य तीनों को नुकसान पहुँचाएगा। – लेखक मुकेश सैनी प्रदेश सचिव पीसीसी (ओबीसी)

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