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‘विधवा का दर-दर भटकना उपभोक्ता अधिनियम की हत्या करने जैसा’:कंज्यूमर कोर्ट ने LIC पर पेनल्टी लगाई; 9 साल बाद मिला न्याय


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‘विधवा का दर-दर भटकना उपभोक्ता अधिनियम की हत्या करने जैसा’:कंज्यूमर कोर्ट ने LIC पर पेनल्टी लगाई; 9 साल बाद मिला न्याय

'विधवा का दर-दर भटकना उपभोक्ता अधिनियम की हत्या करने जैसा':कंज्यूमर कोर्ट ने LIC पर पेनल्टी लगाई; 9 साल बाद मिला न्याय

झुंझुनूं : झुंझुनूं जिला उपभोक्ता आयोग ने LIC को फटकार लगाई है। आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने कहा- 9 साल 4 महीने तक किसान की मौत के बाद विधवा महिला को इंश्योरेंस प्रीमियम के लिए दर-दर भटकना पड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बनाए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की हत्या करने जैसा है।

अध्यक्ष ने फैसले की एक कॉपी मुख्य सचिव के पास भेजी है। ताकि किसानों और मजदूरों के मामलों में गाइडलाइन बनाई जा सके। वहीं अध्यक्ष ने वकीलों से अपील की है कि साल में किसी एक गरीब का केस मुफ्त में लड़ें। आयोग ने LIC को 5 लाख 54 हजार 275 रुपए, 85 हजार रुपए की पेनल्टी और 1.5 लाख रुपए (डेढ़ लाख रुपए) विशेष क्षतिपूर्ति राशि देने का आदेश दिया है।

पहले पढ़िए क्या था मामला…

LIC किसानों का नाम शामिल करना भूली

मामला सहकार जीवन सुरक्षा बीमा योजना में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की लापरवाही का है। झुंझुनूं की चुड़ैला ग्राम सेवा सहकारी समिति के 395 किसानों ने सहकार जीवन सुरक्षा योजना के तहत बीमा प्रीमियम की राशि जमा करवाई थी।

केंद्रीय सहकारी बैंक के जरिए कुल 5 लाख 54 हजार 275 रुपए का बीमा प्रीमियम एलआईसी (LIC) को भेज भी दिया गया। एलआईसी ने पैसे रख लिए, रसीद काट दी और मास्टर पॉलिसी भी जारी कर दी। लेकिन उस पॉलिसी में चुड़ैला सहकारी समिति के उन 395 किसानों के नाम शामिल करना ही भूल गए, जिन्होंने प्रीमियम दिया था।

ऐसे आई लापरवाही सामने

चुड़ैला निवासी किसान श्योराम की 17 फरवरी 2013 को मौत हो गई। श्योराम ने समिति से लोन लिया था और अपनी सुरक्षा के लिए बीमा प्रीमियम भी भरा था।

​जब श्योराम की मौत के बाद उनकी पत्नी सजना देवी ने एलआईसी के पास बीमा क्लेम का दावा किया, तो पैरों तले जमीन खिसक गई। LIC और सहकारी बैंक ने नाम की एंट्री न करने की गलती न मानते हुए 9 साल तक इधर-उधर घुमाते रहे।

अब पढ़िए उपभोक्ता आयोग की टिप्पणी

  • आयोग ने फैसला सुनाते हुए कहा- ग्रामीण और किसान उपभोक्ताओं से योजनाओं के नाम पर समय पर पैसा (प्रीमियम) तो ले लिया जाता है, लेकिन जब क्लेम देने का वक्त आता है, तो उन्हें अंतहीन कानूनी पचड़ों और मानसिक प्रताड़ना के जाल में फंसा दिया जाता है।
  • ​फैसला सुनाते हुए आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने कहा- उपभोक्ताओं को जल्दी और आसान न्याय दिलाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ लाया गया था।
  • ​वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साल 2019 में इस कानून को और ज्यादा मजबूत बनाया गया ताकि जनता को परेशान न होना पड़े।
  • ​इसके बावजूद एक पीड़ित महिला को 9 साल 4 महीने तक न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ा, जो इस कानून की आत्मा की हत्या करने जैसा है।
  • आयोग ने इस निर्णय की कॉपी सीधे मुख्य सचिव (Chief Secretary) को भेजी है, ताकि किसानों की योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए सख्त गाइडलाइन बनाई जा सके।
  • आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने वकीलों से अपील की है। उपभोक्ता कानून के त्वरित न्याय के सपने को सच करने के लिए वकील आगे आएं। साल में कम से कम एक मामला किसी गरीब या जरूरतमंद के लिए बिल्कुल मुफ्त लड़ें।

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