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“जब तक सूरज चांद रहेगा, ओमप्रकाश तेरा नाम रहेगा” सिंगनोर के वीर सपूत को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई, अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब


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“जब तक सूरज चांद रहेगा, ओमप्रकाश तेरा नाम रहेगा” सिंगनोर के वीर सपूत को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई, अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब

ड्यूटी के दौरान हृदय गति रुकने से हुआ निधन, तिरंगा यात्रा के प्रणेता की विदाई पर रो पड़ा पूरा गांव

जनमानस शेखावाटी सवांददाता : कैलाश बबेरवाल

उदयपुरवाटी : गुढ़ागौड़जी तहसील के सिंगनोर गांव ने गुरुवार को अपने वीर सपूत सीआरपीएफ जवान ओमप्रकाश मीणा को नम आंखों से अंतिम विदाई दी। ड्यूटी के दौरान हृदय गति रुकने (हार्ट अटैक) से हुए असामयिक निधन के बाद जब उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा तो पूरा क्षेत्र शोक में डूब गया। हर तरफ “भारत माता की जय”, “ओमप्रकाश मीणा अमर रहे” और “जब तक सूरज चांद रहेगा, ओमप्रकाश तेरा नाम रहेगा” के गगनभेदी नारों से वातावरण गूंज उठा।

गुरुवार सुबह जवान का पार्थिव शरीर गुढ़ा पुलिस स्टेशन पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे। इसके बाद युवाओं ने विशाल तिरंगा बाइक रैली निकालकर पार्थिव शरीर को गांव सिंगनोर तक पहुंचाया। रास्तेभर ग्रामीणों ने पुष्प वर्षा कर अपने वीर बेटे को श्रद्धांजलि अर्पित की। गांव में जैसे ही जवान की अंतिम यात्रा पहुंची, माहौल पूरी तरह भावुक हो गया और हर आंख नम दिखाई दी।

सैन्य सम्मान के साथ दी अंतिम सलामी

सीआरपीएफ की 55वीं बटालियन आरएएफ जयपुर की टुकड़ी ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ जवान को अंतिम सलामी दी। गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान वातावरण अत्यंत भावुक हो उठा। ग्रामीणों और परिजनों ने तिरंगे में लिपटे जवान को अंतिम प्रणाम किया। अंतिम संस्कार के समय हजारों लोगों की भीड़ मौजूद रही। क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठनों के सदस्य, पूर्व सैनिक, युवा और आसपास के गांवों के लोग भी अंतिम यात्रा में शामिल हुए।

संघर्षों के बीच तय किया देशसेवा का सफर

ओमप्रकाश मीणा का जीवन संघर्ष और प्रेरणा की मिसाल रहा। पिता मक्खन लाल मीणा के निधन के बाद उन्होंने कठिन परिस्थितियों में परिवार की जिम्मेदारी संभाली। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और वर्ष 2011 में सीआरपीएफ में भर्ती होकर देशसेवा का मार्ग चुना।

उनका चयन अजमेर से हुआ था। पहली पोस्टिंग भोपाल स्थित 41वीं बटालियन में मिली। इसके बाद उन्होंने पांच वर्षों तक श्रीनगर जैसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में सेवाएं दीं। वर्तमान में वे उड़ीसा में 127वीं बटालियन में तैनात थे। परिजनों ने बताया कि चार माह पहले ही उन्होंने हवलदार पद का प्रशिक्षण पूरा किया था और परिवार में खुशी का माहौल था, लेकिन अचानक आई दुखद खबर ने पूरे परिवार को तोड़ दिया।

गांव के युवाओं के थे प्रेरणास्रोत

ओमप्रकाश मीणा केवल एक जवान ही नहीं, बल्कि गांव के युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत थे। वे युवाओं में देशभक्ति और राष्ट्रसेवा की भावना जगाने के लिए हमेशा सक्रिय रहते थे। हर वर्ष 1 जनवरी को गांव में आयोजित होने वाली तिरंगा यात्रा के वे मुख्य सूत्रधार हुआ करते थे। गांव के युवा बताते हैं कि ओमप्रकाश हमेशा युवाओं को सेना और अर्धसैनिक बलों में भर्ती होने के लिए प्रेरित करते थे।

उनकी सादगी, मिलनसार स्वभाव और देशभक्ति के कारण गांव ही नहीं, पूरे क्षेत्र में उनकी विशेष पहचान थी। यही कारण रहा कि उनकी अंतिम यात्रा में जनसैलाब उमड़ पड़ा।

पत्नी और वृद्ध दादी का रो-रोकर बुरा हाल

जैसे ही पार्थिव शरीर घर पहुंचा, पत्नी अनुराधा और वृद्ध दादी पतासी देवी का विलाप देखकर हर व्यक्ति भावुक हो उठा। परिवार की महिलाओं और बच्चों की चीख-पुकार से माहौल गमगीन हो गया। शहीद जवान अपने पीछे पत्नी, एक बेटा और एक बेटी छोड़ गए हैं। ग्रामीण लगातार परिजनों को ढांढस बंधाते नजर आए।

पूरे गांव में शोक की लहर

सिंगनोर गांव में दिनभर शोक का माहौल बना रहा। गांव के बाजार बंद रहे और बड़ी संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। ग्रामीणों ने कहा कि गांव ने आज अपना एक ऐसा बेटा खो दिया जिसने हमेशा देश और समाज को प्राथमिकता दी। लोगों ने मांग की कि गांव में उनकी स्मृति में स्थायी स्मारक बनाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके त्याग और देशभक्ति से प्रेरणा ले सकें।

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