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स्पेशल स्टिंग इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट : शिक्षा का ‘ब्लैक मार्केट’, निजी स्कूलों की ‘लूट’ का बड़ा स्टिंग ऑपरेशन!


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स्पेशल स्टिंग इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट : शिक्षा का ‘ब्लैक मार्केट’, निजी स्कूलों की ‘लूट’ का बड़ा स्टिंग ऑपरेशन!

किताबो के खेल का पर्दाफाश.. पब्लिशर्स और निजी स्कूलों की मिलीभगत पर जनमानस शेखावाटी की डिजिटल स्ट्राइक, कई महीनो स्कूल संचालक बनकर रहे पत्रकार, 9 लाख की किताबो की डील मात्र 3 लाख में तय... ज्ञान के मंदिर या कमीशन की दुकाने? 65 से 80% कमीशन के खेल से उठा पर्दा... पब्लिशर ने थमा दी फतेहपुर के कई नामचीन स्कूलों के कमीशन के खेल की लंबी लिस्ट... जिम्मेदार मूकदर्शक..?

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : आबिद खान दाडून्दा / अनिल शेखीसर

फतेहपुर : राजस्थान के सीकर जिला में फतेहपुर सहित कई जगहों पर शिक्षा के नाम पर ‘सरेआम डकैती’ का खेल चल रहा है। जहां कई शिक्षा के मंदिर अब ‘व्यापारिक बुचड़खाने बनते नजर आ रहे हैं?, जहाँ हर नए सत्र में अभिभावकों की उम्मीदों और जेबों का कत्ल सरेआम किया जा रहा है। अफसोस हैं कि अधिकारी मौन बनकर तमाशा देख रहे हैं?।

एक तरफ सूबे के मुखिया भजन लाल शर्मा और शिक्षा मंत्री घर-घर बेहतर शिक्षा पहुंचाने का दावा कर रहे हैं, राज्य और केंद्र सरकारें अभिभावकों पर शिक्षा का व्यय ज्यादा न पड़े इसके लिए कठोर नीतियां बना रही हैं। वहीं दूसरी ओर बच्चो की किताबो में 65 से 80 प्रतिशत कमीशन का खेल खेलकर राजस्थान के सीकर सहित फतेहपुर के कई नामचीन निजी स्कूल सरकार की नीतियों की पोल खोलने में लगे हैं। जहां कमीशन की मोटी राशि बच्चो की किताबो से ऐंठ कर निजी स्कुले अभिभावकों की कमर तोड़ रही हैं। NCERT के नियमो धत्ता बताकर अभिभावकों पर महंगी महंगी पुस्तके थोंपी जा रही हैं जिस से अभिभावक अपने आपको ठग्गा महसूस कर रहा हैं। मानो गार्जियंस को लूटने की स्कूल नहीं ‘इंडस्ट्री’ खोल रखी हो. निजी स्कूलो द्वारा अभिभावको से बाजार से 5 से 8 गुना तो कही दस गुना तक भी किताबो की रेट लेकर अभिभावको से बड़े स्तर पर लूट की जा रही है।

जनमानस शेखावाटी की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के आबिद खान दाडून्दा और अनिल शेखिसर ने एक ऐसा खौफनाक स्टिंग ऑपरेशन किया है, जिसने ‘इंग्लिश मीडियम’ का चोला ओढ़े इन कई स्कूलों के असली और लालची चेहरों को बेनकाब करके जनता की अदालत में रख दिया है।

यह खुलासा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है और प्रशासनिक तंत्र की निष्क्रियता को भी कटघरे में खड़ा करता है।

कहने को यह ‘एजुकेशन सिस्टम’ है, लेकिन अंदर से यह एक ऐसा खोखला तंत्र बनता जा रहा है जहाँ ज्ञान कम और गणित ज्यादा चल रहा है और यह गणित सीधे अभिभावकों की जेब से हल की जा रही हैं।

ऐसे हुआ स्टिंग ऑपरेशन: कमीशन के काले दलदल में पहचान छिपाकर उतरे’पत्रकार

इस लूट की जड़ तक पहुंचना आसान नहीं था, क्योंकि पब्लिशर और स्कूल संचालको के बीच शातिर गिरोह की तरह कोड वर्ड्स में बात चलती हैं।

जनमानस शेखावाटी की स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम के हेड आबिद खान और अनिल शेखिसर ने इमेज और जान को दाव पर लगाकर इन कमीशन खोरो पर मजबूती से हाथ डाला अपनी पहचान छिपाई और खुद को एक ‘डमी स्कूल संचालक’ के रूप में ढाला और कई महीनों तक पब्लिकेशन कंपनियों के साथ स्कूल संचालक बनकर रहे। और उनके साथ वन टू वन मीटिंग करते रहे।

इस तरह हमारी टीम ने बनाया किताबो का डमी ऑर्डर

इस दौरान हर बातचीत, हर संकेत और हर प्रस्ताव को रिकॉर्ड किया गया, और उसे रणनीतिक तरीके से परखा भी गया, जिससे पूरे नेटवर्क की परतें एक-एक करके खुलती चली गईं। और इस कमीशन के काले खेल को लेकर सीकर सहित फतेहपुर के कई नामचीन स्कूलों के प्रमाण मिलते गए।

यह केवल स्टिंग नहीं था, बल्कि एक योजनाबद्ध मिशन था, जहाँ सच को पकड़ने के लिए झूठ का मुखौटा पत्रकारों को पहनना पड़ा। और पब्लिकेशन कंपनियों का भरोसा जीतने के लिए दोनो पत्रकारों ने डिजिटल चक्रव्यूह रचा:

ऐसे बिछाया इस जोड़ी ने डिजिटल जाल (स्टिंग की इनसाइड स्टोरी)

इस गोरखधंधे की जड़ तक पहुंचना मक्कड़जाल में फंसने जैसा था यह कोई साधारण खेल नहीं, बल्कि स्कूल संचालकों और पब्लिकेशन कंपनियों की मिलीभगत से चल रहा संगठित नेटवर्क है। सच्चाई की जड़ों तक जाने के लिए पत्रकारों ने इस दलदल में अपने आपको धकेल कर उनके जैसा बनाया पब्लिकेशन कंपनियां शुरुआती दौर में भरोसा करने से कतराती रही और गोलमाल जवाब देती रहीं, लेकिन इस जोड़ी ने लगातार प्रयास जारी रखे।

दोनों पत्रकारों ने अपनी असली पहचान छिपाई और खुद को एक नए ‘डमी स्कूल’ का संचालक बताकर पब्लिकेशन कंपनियों का भरोसा जीत लिया दोनो ने ऐसा जाल बिछाया कि एक निजी स्कूल का मालिक बना तो दूसरा प्रिंसिपल, बनकर अलग अलग पब्लिकेशन के साथ अलग अलग स्कूल नाम से डील करने में सफल हुए और कई महीनों तक उन्होंने पब्लिकेशन कंपनियों से ईमेल के जरिए ऐसा विश्वास पैदा किया कि सामने वाला भी उन्हें ‘अपने गिरोह की लूट का हिस्सा’ समझने लगा।

हमारी डील एक उस मेल पर आकर अटकी जो मेल स्कूल के नाम से हो

जब हमारी टीम को पता चला कि ये मेल ही भरोसे की चाबी है, उसके बाद डमी स्कूल के नाम मेल आईडी बनाकर डिजिटल जाल बिछाया गया। पब्लिकेशन का सच जानने के लिए बच्चों की डमी संख्या की सूची क्लास वाइज बनाई गई और स्कूलों से संबंधित कई कागजी डमी रिकॉर्ड मेंटेन किए गए।

कई महीनों तक फोन पर ‘स्कूल ओनर’ बनकर बातचीत की गई, मीटिंग हुई।

शुरुआत में पब्लिकेशन के एरिया सेल्स ऑफिसर ने 50 प्रतिशत कमीशन की का ऑफर हमे यानि कि स्कूल संचालक को किया , लेकिन हमारी टीम द्वारा जैसे-जैसे ‘बड़े स्कूल के सेटअप’ का लड्डू दिखाया तो , यह सौदा 75 से 80 प्रतिशत तक पहुंच गया। डील का अंतिम चरण ईमेल के माध्यम से पूरा हुआ, जहां पब्लिकेशन के एरिया सेल्स ऑफिसर ने पूरी तरह विश्वास कर अपने सभी वित्तीय राज उगल दिए।

यानी ₹100 की किताब पर 75 से 80 रुपए की ‘मलाई’ सीधे स्कूल संचालक की जेब में?! और बुक डिपो वाले का कमीशन अलग से।
और बोझ उठाता है एक आम अभिभावक।

जब हमारी अंतिम डील हुई, तब इस पूरे खेल का असली काला चेहरा सामने आया जहाँ शिक्षा नहीं, बड़ी लूट का प्रतिशत तय हो रहा था। जब हमारी टीम ने पब्लिकेशन को अन्य स्कूलों से जोड़ने की बात कही तो एकस्ट्रा प्रसेंटेज कमाने का ऑफर भी मिला

9 लाख प्रिंट रेट की किताबे मिली 3 लाख में..

जब काबिल पत्रकारों ने अंतिम डील एक मथुरा के मशहूर बुक सेलर से की जो सीकर फतेहपुर चुरू रामगढ़ झुंझुनूं सहित राजस्थान के कई छोटे बड़े शहरों के नामचीन स्कूलों को किताबे सेल करता हैं। इस डील में हमारी डील 65 प्रतिशत कमीशन में तय हुई नर्सरी से आठवीं क्लास तक इंग्लिश मीडियम प्राइवेट पब्लिकेशन के RBSE के कोर्स की प्रिंट रेट का बिल 9 लाख 73 हजार 180 रूपये का बना जिसमे से हमे 65 प्रतिशत छूट यानि कि 6 लाख 32 हजार 557 रुपए छूट दी गई और 3 लाख 40 हजार 163 रुपए में डील फाइनल हुई और बताया गया कि अभिभावकों को ये किताबे 9 लाख 73 हजार 180 में बेचना हैं। मतलब साफ हो गया 6 लाख का मोटा माल सीधा स्कूल संचालकों की जेब में इस पब्लिशर ने ऑन रिकॉर्ड हमे फतेहपुर की कई नामिक स्कूलों के नाम की लिस्ट भी दी जो इस पब्लिशर से किताबे लेते हैं।  इस घिनौने खेल में ज्यादातर पब्लिशर हमे मेरठ, मथुरा, गाजियाबाद, देहली, गुड़गांव, हिसार, जयपुर, आगरा, के मिले।

9 लाख की किताबे 3 लाख में मेल पर इस तरह हुई पब्लिकेशन के साथ पत्रकारों की डील

राजस्थान बोर्ड का एक ही पेटर्न, फिर भी रेट में बड़ा अंतर

हमारी पड़ताल में सामने आया कि राजस्थान बोर्ड की NCERT इंग्लिश मीडियम स्कूलों की बुक्स का पेटर्न एक समान है, बावजूद इसके बाजार में कीमतों में भारी अंतर देखने को मिल रहा है।

जहां राजस्थान बोर्ड की इंग्लिश मीडियम कक्षा 5 वीं क्लास की किताबें ₹ 230 में उपलब्ध हैं, वहीं निजी स्कूलों और उनके द्वारा चिन्हित बुक डिपो पर वही किताबें 1540 रुपए से 2500 रुपए तक बेची जा रही हैं। जबकि ये क्लास तो बोर्ड क्लास हैं।

हैरानी की बात यह है कि पेटर्न, सिलेबस और विषयवस्तु लगभग समान होने के बावजूद कीमतों में यह अंतर किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं है।

यह अंतर केवल बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘रेट गेम’ है, जहाँ ज्ञान समान है, लेकिन कीमतों का खेल अलग-अलग जेबों के हिसाब से तय किया जा रहा है।

किताब के अंदर मिला एक ही सिलेबस, फिर भी रेट में भारी अंतर

जब हमारी टीम ने पब्लिशर द्वारा उपलब्ध किताबों और (RBSE) NCERT की पुस्तकों का गहन विश्लेषण किया, तो एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। दोनों किताबों के विषय, अध्याय और सिलेबस लगभग पूरी तरह समान पाए गए। फर्क सिर्फ इतना था कि इंडेक्स (विषय सूची) में अध्यायों के क्रम को थोड़ा आगे-पीछे कर दिया गया था, तथा आखिर के पेज में कुछ एकस्ट्रा सवाल एड किए गए थे जबकि अंदर की सामग्री ज्यों की त्यों बनी हुई थी।

यानि ज्ञान वही, विषय वही, कंटेंट वही सिर्फ प्रस्तुति का खेल बदला गया। इसके बावजूद कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिला। यह स्थिति साफ इशारा करती है कि सिलेबस के नाम पर नहीं, बल्कि सिस्टम के नाम पर ‘रेट गेम’ खेला जा रहा है, जहाँ मामूली फेरबदल को आधार बनाकर अभिभावकों की जेब पर स्कूल डाका डाला जा रहा हैं।

बनावटी गार्जियन बनकर निजी स्कूल संचालकों से की बात तो खुले कई राज

पड़ताल की इस कड़ी में जब हमारी टीम ने बनावटी गार्जियन बनकर सीकर सहित फतेहपुर के कई निजी संचालकों से अलग-अलग नंबरों से, अलग-अलग नाम से बात की और उन्हें नए एडमिशन देने का लालच दिखाया गया, तो चौंकाने वाले खुलासे हुए।

  • बातचीत में जब हमारी टीम ने फीस के बाद किताबों पर चर्चा की, तो पता चला कि स्कूल ड्रेस से लेकर किताबें तक कुछ स्कूलों में ‘इन-हाउस’ उपलब्ध करवाई जा रही हैं।
  • जहां LKG क्लास से 5th क्लास तक की किताबों की रेट 1200 से 2500 के बीच बताई गई। जबकि बाजार में वही किताबे 300 के अंदर अंदर उपलब्ध हैं।
  • कुछ स्कूलों के सामने हमारी टीम ने अपनेआप को बेरोजगार बताया तो स्कूल संचालकों ने एडमिशन दिलवाने पर भी कमीशन तक ऑफर कर दिया।
  • यहां शिक्षा नहीं, बल्कि ‘डील’ हो रही थी और हर डील में अभिभावकों को लूटने का एक नया प्रतिशत तय हो रहा था।
  • एक तरफ वह मजबूर माता-पिता हैं जो दिनभर मजदूरी करके अपने बच्चे की फीस और किताबों का खर्च जुटाते हैं, और दूसरी तरफ कुछ स्कूल संचालक हैं जो ₹240 की किताब को ₹1540 में और 190 वाली किताबें 2000 तक बेचकर अपने ऐशो-आराम के साधन तैयार कर रहे हैं।

यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय का ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ शिक्षा को व्यवसाय बनाकर नैतिक मूल्यों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह विडंबना ही है कि जहाँ बच्चों को ईमानदारी पढ़ाई जाती है, वहीं उसी स्कूल के बाहर अभिभावकों से बेईमानी का कारोबार कर रहे है।

भाई-बहन की पुरानी किताबें बना देते हैं, ‘रद्दी’: पब्लिकेशन बदलने का काला खेल

हमारी विशेष इन्वेस्टिगेशन में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। अक्सर घरों में बड़े भाई-बहन की किताबें छोटे बच्चों के काम आती हैं, लेकिन इस व्यवस्था को जानबूझकर समाप्त किया जा रहा है। हर वर्ष पब्लिकेशन बदल दिया जाता है पाठ्यक्रम लगभग समान रहता है। केवल कवर और स्वरूप बदलकर नई किताबें अनिवार्य कर दी जाती हैं।

इससे अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ बढ़ता है और बच्चों के बीच संसाधनों के पुनः उपयोग की परंपरा समाप्त होती जा रही है। यानी ज्ञान वही, किताब नई और खर्च हर साल नया।

डिस्काउंट का ‘मायाजाल’ और प्रिंट रेट की हेराफेरी

अभिभावकों को भ्रमित करने के लिए स्कूल संचालक अपने साथ अनुबंधित विशेष बुक डिपो का सुझाव देते हैं, बच्चो को विशेष बुक डिपो के लिए बाध्य किया जाता हैं। जहां ‘20% डिस्काउंट’ का लालच दिया जाता है। पांचवी क्लास की किताबो की वास्तविक स्थिति इस प्रकार है: वास्तविक कीमत: ₹236 हैं जबकि निजी स्कूलों में मिल रही उसी किताब की प्रिंटेड कीमत: करीब ₹1520 हैं 20% डिस्काउंट के बाद कीमत: लगभग ₹1216 ली जा रही हैं। जबकि बोर्ड क्लास की वही किताब अन्य जगह 236 में मिल रही हैं। अर्थात, छूट के नाम पर भी अत्यधिक मूल्य वसूला जा रहा है। यह ऐसा गणित है जिसमें हर बार उत्तर स्कूल के पक्ष में और नुकसान अभिभावकों के हिस्से में आता है।

स्कूलों का शर्मनाक तर्क: उनकी किताबो में“इंपॉर्टेंट क्वेश्चन”

जब इस विषय पर स्कूल संचालकों से प्रश्न किया गया, तो उन्होंने तर्क दिया कि इन पुस्तकों में ‘महत्वपूर्ण प्रश्न’ होते हैं, जो एक्स्ट्रा होते हैं और आखिर के पेज पर होते हैं। यह तर्क न केवल तर्कहीन है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
यदि निजी शिक्षण संस्थान स्वयं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में सक्षम हैं, तो इस प्रकार की निर्भरता अनुचित प्रतीत होती है।
सवाल यह भी है कि जब बच्चे को ‘इंग्लिश मीडियम’ के नाम पर पढ़ाने के लिए मोटी फीस ली जा रही है, तो क्या आपके शिक्षक इतने नाकाबिल हैं कि उन्हें पब्लिकेशन के छपे-छपाए सवालों की बैसाखी चाहिए?
या फिर यह ‘इंपॉर्टेंट क्वेश्चन’ नहीं, बल्कि ‘इंपॉर्टेंट कमीशन’ का मामला है?

रसूख के आगे नतमस्तक सिस्टम अधिकारी नही कर पा रहे कार्रवाई,  कोन करेगा कार्रवाई?
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्तमान समय में सब से बड़ा व्यवसाय शिक्षा होने के कारण अधिकांश शिक्षण संस्थानों में राजनेताओं के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी होने के कारण अधिकारी भी शिक्षण संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई करने से हिचकिचाते हैं।

जनमानस शेखावाटी की इस जोड़ी ने स्पष्ट किया है कि निजी स्कूलों और पब्लिशर्स के बीच अभिभावकों को लूटने का खेल धड्डले से चल रहा हैं। यह केवल शुरुआत है। यह स्टिंग भ्रष्ट स्कूल संचालकों के लिए एक चेतावनी है, जिन्होंने शिक्षा को काला धंधा बना दिया है।

यह खुलासा स्पष्ट करता है कि शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।
प्रशासन को चाहिए कि एक अभियान चलाकर वह इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करे, ताकि भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं पर अंकुश लगाया जा सके और शिक्षा वास्तव में सुलभ बन सके। एक ओर जहां निजी स्कूलों के वाहन बिना दस्तावेजों के पकड़े जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कमीशन का यह मोटा खेल बिना रोक-टोक चल रहा है।
सवाल बड़ा यह है कि क्या उन स्कूल संचालकों में संवेदनशीलता या शर्म शेष नहीं बची, जो इतना भारी कमीशन लेने के बाद भी बुनियादी व्यवस्थाओं तक को दुरुस्त नहीं कर पाए?

क्योंकि जब शिक्षा व्यापार बन जाती है, तब समाज का भविष्य केवल महंगा ही नहीं, बल्कि असुरक्षित भी हो जाता हैं।
देखना होगा कि सूबे के मुखिया इस पूरे मामले पर क्या कार्रवाई करते हैं।

जनमानस शेखावाटी का साफ संदेश हैं। कि आने वाले समय में और भी बड़े खुलासे सामने लाए जाएंगे, जिससे इस पूरे नेटवर्क की जड़ें पूरी तरह हिलाई जाएंगी। हमारा मकसद किसी विशेष संस्था का शिक्षा की साख पर सवाल करना नही हैं। हमारा मकसद हैं शिक्षा सरल और आसान बने और व्यवस्थाओं में सुधार करवाया जा सके

यह स्टिंग केवल एक समाचार नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का माध्यम है, जो अभिभावकों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करता है।

इनका क्या कहना हैं?

किरण सैनी मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी सीकर

हमारे पास निजी स्कूलों को लेकर पुस्तको, जूतों, यूनिफॉर्म, टाई, को लेकर बीकानेर निदेशक महोदय से आदेश प्राप्त हुआ हैं जिसमे निजी स्कूलों की जांच को लेकर हमने इस आदेश के आधार पर जिले के समस्त मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों को लिखित निर्देशित किया हैं कि वे अपने अपने क्षेत्र में निजी स्कूलों में पुस्तको, जूतों, टाई, युनफॉर्म, आदि के संबंध में जारी निर्देशों की पालना करते हुए आपकी स्वयं की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की समिति गठित की जाकर जांच की जाए और दिनांक 15 अप्रैल 2026 से पहले सभी निजी स्कूलों की जांच करते हुए एक प्रमाण पत्र के माध्यम से लिखित में रिपोर्ट करे। आज 15 तारीख हैं शाम तक कार्य होगा कल से रिपोर्ट्स मिलना शुरू हो जाएगी – किरण सैनी मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी सीकर

सभी अभीभावको को बताया गया हैं कि राजस्थान बोर्ड की NCERT बुक ही खरीदे बाजार से किसी पब्लिसर या स्कूलों से उपलब्ध कराई गई किताबे ना खरीदे। उनमें ऐसा कुछ विशेष नहीं हैं। स्पष्ट हैं गार्जियन और बच्चे ध्यान देवे हमारा तो साफ कहना हैं। कि गार्जियन स्कूलों से उपलब्ध किताबे खरीदो ही मत आजकल गार्जियन भी पता नहीं बच्चो को क्या बनाना चाहते हैं। अनावश्यक बोझ बच्चो पर डाल रहे हैं। निर्धारित पाठ्यक्रम ही पढ़े वो सब से बेस्ट और पर्याप्त हैं। – नरेंद्र सिंह मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी फतेहपुर (सीकर)

नरेंद्र सिंह मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी फतेहपुर (सीकर)

गड़बड़झाला?

इन सभी तथ्यों के आधार पर

जब हमारी टीम ने मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी नरेंद्र सिंह से बात की और उन से पूछा गया कि मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी ने आपको पत्र के माध्यम से आदेशित किया था और 15 अप्रेल तक जांच कर रिपोर्ट देने को कहा गया था आज 15 अप्रैल हैं। सर अब तक कितनी स्कूलें पकड़ में आई तो, नरेंद्र सिंह ने गोलमाल जवाब देते हुए कहा हमे कोई शिकायत नहीं मिली हैं। जब मीडियाकर्मी ने जोर देकर कहा सर आपके पास आपके अधिकारी का जो आदेश आया हुआ हैं तो आप किसकी शिकायत का इंतजार कर रहे हैं उस आदेश पर आपने क्या कार्रवाई की अब तक? तब उन्होंने फिर कहा हमे कोई शिकायत नहीं मिली हैं। और गोलमाल जवाब देने लग गए फिर गुस्से में आकर बोले में बाद में बात करता हूं कहकर फोन काट दिया उसके बाद हमारी टीम का फोन नही उठाया गया। मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी से हुई हमारी बातचीत से ये प्रतीत होता हैं कि मामला बड़े स्तर पर गोलमाल हैं। क्या जिला कलेक्टर और मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी सीकर इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई करेंगे ये देखना होगा

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