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राजस्थान में उपनिरीक्षक भर्ती 2021 और अनिश्चितताओं का दौर


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राजस्थान में उपनिरीक्षक भर्ती 2021 और अनिश्चितताओं का दौर

राजस्थान में उपनिरीक्षक भर्ती 2021 और अनिश्चितताओं का दौर

जयपुर : राजस्थान में उपनिरीक्षक भर्ती 2021 की प्रक्रिया 2021 से 2025 तक युवाओं की आशाओं, प्रशासन की विश्वसनीयता और न्यायिक निर्णयों को लगातार झकझोरती रही। हजारों अभ्यर्थियों के लिए स्थिर भविष्य, प्रतिष्ठा और वर्दी का सपना अब अनिश्चितताओं और लंबित फैसलों की सबसे दर्दनाक मिसाल बन गया।

सबसे संवेदनशील स्थिति उन प्रशिक्षुओं की रही जिन्हें अस्थायी नियुक्ति के बाद किशनगढ़ प्रशिक्षण केंद्रों में बिना स्पष्ट दिशा, बिना रवानगी और बिना मार्का के महीनों तक ठहरना पड़ा। साल में 12 सीएल, दिन में चार बार रोल-कॉल, परिवार से दूरी और भविष्य की अनिश्चितता ने उनकी मानसिक स्थिति को झकझोर दिया। यह प्रशिक्षण नहीं, बल्कि “चारदीवारी में बिना सजा के कैदी” जैसा अनुभव हैं ।

इस देरी की सबसे बड़ी कीमत 400+ अभ्यर्थियों ने चुकाई, जिनमें 218 राज्य सरकार के अस्थाई कर्मचारी, 190 स्थाई कर्मचारी, 39 पूर्व सैनिक और 24 केंद्र/अन्य राज्यों के कर्मचारी शामिल थे, जिन्होंने एसआई वर्दी का सपना लिए अपनी वर्तमान सेवाएँ छोड़ दी थीं।
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार कुल 838 अभ्यर्थियों में से केवल 61 दोषी पाए गए (7.28%) और बाकी पूर्णतः निर्दोष हैं। ऐसे में सभी को एक ही कठघरे में खड़ा करना न न्यायसंगत है, न नीति अनुसार। सेग्रीगेशन यानी दोषी और निर्दोष की वैज्ञानिक और पारदर्शी छंटनी ही एकमात्र न्यायसंगत समाधान है।

सेग्रीगेशन तीन मूलभूत सिद्धांत स्थापित करता है: 1. दोषियों को दंडित किया जाए, ताकि प्रक्रिया की पवित्रता और समाज का भरोसा बना रहे। 2. निर्दोषों को बिना देरी उनका हक़ मिले, क्योंकि न्याय में देरी भी अन्याय है! 3. पेपर माफिया और फर्जी नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई हो, ताकि भविष्य की भर्तियाँ सुरक्षित रहें! अधिकांश निर्दोष अभ्यर्थी वर्षों से केवल प्रतीक्षा की सज़ा भुगत रहे हैं। कई ने पुरानी सरकारी नौकरियाँ छोड़ीं, परिवार की उम्मीदों के बीच कठिन तैयारी की और फिर भी अनिश्चितता से बाहर नहीं निकल पाए। महिला अभ्यर्थियाँ मातृत्व के नए जिम्मेदारियों में पहुँची हैं, पूर्व सैनिकों के लिए यह प्रक्रिया सीमित विकल्पों वाली राह बन गई। 28 अगस्त 2025 के आदेश के विरुद्ध सरकार ने अपील दायर की है, पर सवाल यह है कि क्या यह कदम पहले नहीं उठाया जा सकता था? क्या प्रशासन सक्रिय होकर युवाओं की मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता था?

यह पूरी प्रक्रिया बताती है कि भर्ती केवल परीक्षा नहीं, बल्कि युवाओं की जीवन संरचना होती है। समय की मांग है— पेपर लीक पर शून्य सहनशीलता, डिजिटल एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र, एआई निगरानी, समयबद्ध भर्ती कैलेंडर और तेज़ अपील प्रणाली। युवाओं की उम्मीदें सबसे ऊँची कीमत पर बनती हैं। राज्य का धर्म है कि ये उम्मीदें टूटने न पाएँ।

किसी शायर ठीक लिखा है:
“दर्द के किनारे से किनारे तक चला हूँ मैं,
फिर भी न कोई मंज़िल मिली न कोई मुकाम।”

उमा व्यास (आरएएस) लेखिका विभिन्न समसामयिक मुद्दों की जानकार एवं कल्पतरू संस्थान की सक्रिय कार्यकर्त्ता है!

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