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त्रिपद काव्य स्वर में जीवन-मूल्य, लोकचेतना और सामाजिक सरोकार – डाॅ. नरेश सिहाग


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त्रिपद काव्य स्वर में जीवन-मूल्य, लोकचेतना और सामाजिक सरोकार – डाॅ. नरेश सिहाग

त्रिपद काव्य स्वर में जीवन-मूल्य, लोकचेतना और सामाजिक सरोकार - डाॅ. नरेश सिहाग

समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जनजीवन से जुड़े सरोकारों, नैतिक मूल्यों, सामाजिक चेतना तथा मानवीय संवेदनाओं को सरल और संप्रेषणीय भाषा में अभिव्यक्त करने वाली रचनाओं का विशेष महत्त्व है। डॉ. भरत मिश्र प्राची की ‘त्रिपद काव्य स्वर’ शृंखला इसी दृष्टि से उल्लेखनीय है। प्रस्तुत शोध आलेख में उनकी सात चयनित रचनाओं – ‘उत्तम है धन’, ‘अपना गांव’, ‘पितृपक्ष पर्व है’, ‘तीरथ समान’, ‘महाशक्ति है बेटी’, ‘वृद्धजन का करें सम्मान’ तथा ‘स्वस्थ जीवन शैली, यहीं आधार’- का विश्लेषण किया गया है। इन रचनाओं में स्वास्थ्य, सदाचार, ग्राम्य जीवन, पितृ-स्मरण, सेवा, स्त्री-सशक्तीकरण, वृद्धजन सम्मान और स्वस्थ जीवन-शैली जैसे विविध विषयों को त्रिपदीय संरचना में प्रस्तुत किया गया है।

इन कविताओं का मूल स्वर जीवन को सकारात्मक, संतुलित, संवेदनशील और सामाजिक रूप से उत्तरदायी बनाने का है। कवि ने बड़े सामाजिक प्रश्नों को कठिन दार्शनिक भाषा के स्थान पर लोकप्रचलित शब्दावली, सहज वाक्य-विन्यास, तुकात्मकता और पुनरावृत्ति के माध्यम से सामान्य पाठक तक पहुँचाने का प्रयास किया है। ‘त्रिपद’ की संरचना प्रत्येक पद में विचार की क्रमिक स्थापना, विस्तार और निष्कर्ष का अवसर प्रदान करती है। इस कारण रचनाएँ काव्यात्मक होने के साथ-साथ संदेशात्मक भी बनती हैं। शोध का निष्कर्ष है कि इन रचनाओं में लोकमंगल, पारिवारिक संस्कार, सामाजिक समरसता, पर्यावरणीय चेतना, नारी सम्मान तथा स्वस्थ जीवन के पक्ष में एक समन्वित मूल्य-दृष्टि विकसित होती है।

बीज शब्द : त्रिपद काव्य, डॉ. भरत मिश्र प्राची, लोकचेतना, जीवन-मूल्य, ग्राम्य संस्कृति, नारी सम्मान, वृद्धजन, स्वास्थ्य चेतना, सामाजिक सरोकार।

– 1. प्रस्तावना : हिंदी कवि

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