बालमुकुंद ओझा : स्नेह, सादगी और मार्गदर्शन के प्रतीक – डॉ. लीलाधर दोचानिया
बालमुकुंद ओझा : स्नेह, सादगी और मार्गदर्शन के प्रतीक - डॉ. लीलाधर दोचानिया
किसी व्यक्ति की महानता उसके पद से नहीं, बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि पद से हटने के बाद भी वह लोगों के दिलों में कितना सम्मान बनाए रखता है। राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में संयुक्त निदेशक के पद से फरवरी 2013 में सेवानिवृत्त हुए श्री बालमुकुंद ओझा ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जो सेवानिवृत्ति के बाद भी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। हाल ही में वे लंदन की छह माह की यात्रा पूरी कर जयपुर लौटे हैं और फिर से अपने आत्मीय जनों के बीच सक्रिय हैं।
बालमुकुंद ओझा की लेखन यात्रा विधिवत रूप से वर्ष 1969 में शुरू हुई। चूरू में विद्यालय की हस्तलिखित पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी मिलने के साथ ही उनके भीतर लेखन के प्रति रुचि जागृत हुई। इसी वर्ष उन्हें समाचार उद्घोषक की जिम्मेदारी भी मिली। यही वह दौर था, जब समाचार पत्र पढ़ने और समाचारों को समझने की रुचि विकसित हुई। बारहवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते पत्रकारिता के प्रति उनका आकर्षण गहरा हो चुका था।
उन्होंने बीकानेर से प्रकाशित साप्ताहिक ‘सप्ताहांत’, जोधपुर से प्रकाशित साप्ताहिक ‘कंट्रोलर’ और देहरादून से प्रकाशित दैनिक ‘जनता एक्सप्रेस’ सहित विभिन्न समाचार पत्रों में समाचार भेजना शुरू किया। कॉलेज जीवन में प्रवेश करते ही वर्ष 1972 में राजस्थान पत्रिका ने उन्हें चूरू में अपना संवाददाता नियुक्त किया। वर्ष 1974 में जनसंपर्क विभाग से उन्हें राजस्थान पत्रिका के अधिस्वीकृत पत्रकार का दर्जा मिला।
इसी दौरान उनकी लेखनी साहित्य की विभिन्न विधाओं में भी सक्रिय रही। ‘सारिका’, ‘कादम्बिनी’, ‘सरिता’, ‘मुक्ता’ और ‘अरुण’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख, कहानियां और कविताएं प्रकाशित हुईं। वर्ष 1979 में उन्हें राजस्थान सरकार के जनसंपर्क विभाग में सहायक जनसंपर्क अधिकारी के पद पर नियुक्ति मिली। इसके बाद बीकानेर, कोटा, चूरू, सीकर, झुंझुनूं, धौलपुर और झालावाड़ सहित विभिन्न स्थानों पर सेवाएं देते हुए वे जयपुर पहुंचे और संयुक्त निदेशक के पद से फरवरी 2013 में राजकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए।
अपने लंबे सेवाकाल में उन्होंने हजारों समाचार और लेख लिखे, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। उनकी साहित्यिक पूंजी में ‘लोकतंत्र का पोस्टमार्टम’ नामक पुस्तक के साथ एक लघुकथा संग्रह भी शामिल है।
मेरे जीवन में एक मार्गदर्शक
मेरे जीवन के ऐसे व्यक्तित्व के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह अवसर है, जिनका मेरे व्यक्तित्व और लेखन पर गहरा प्रभाव रहा है। श्री ओझा से मेरा परिचय केवल एक विभागीय अधिकारी के रूप में नहीं रहा। चूरू से लेकर जयपुर तक उनके साथ 35 वर्ष से अधिक समय तक कार्य करने का अवसर मिला। इस लंबे साथ में मैंने उनसे कार्यालयीन कार्यप्रणाली के साथ-साथ व्यवहार, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी और इंसानियत का व्यावहारिक पाठ सीखा।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कभी अपने अधीनस्थों को पराया नहीं समझा। उन्होंने हमेशा परिवार के सदस्य की तरह स्नेह, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन दिया। उनके व्यक्तित्व में अद्भुत सादगी और आत्मीयता है। उनके साथ बैठने पर कभी यह एहसास नहीं होता कि आप किसी वरिष्ठ अधिकारी के सामने बैठे हैं, बल्कि ऐसा लगता है जैसे परिवार के किसी अनुभवी सदस्य से संवाद कर रहे हों।
वे सरल, सहज, नेक और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे। वे मेरे अधिकारी रहे, मार्गदर्शक रहे, गुरु रहे और सबसे बढ़कर परिवार के एक सदस्य की तरह मेरे साथ स्नेह का रिश्ता निभाते रहे।
साहित्यिक यात्रा में संबल
मेरी साहित्यिक यात्रा में भी श्री ओझा का योगदान अविस्मरणीय रहा है। मेरे कविता संग्रह ‘ज़िंदगी मुस्कुराती रहे’ के विमोचन के समय वे जयपुर में थे। उन्होंने न केवल मुझे आशीर्वाद दिया, बल्कि पुस्तक को देश-प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्रों तक पहुंचाने और उसकी समीक्षा प्रकाशित करवाने में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
मेरी दूसरी पुस्तक ‘मिट्टी की कीमत’ कहानी संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई। उसके विमोचन के समय श्री ओझा लंदन में थे। हजारों किलोमीटर की दूरी के बावजूद उनका सहयोग उतना ही आत्मीय और निकट रहा। उन्होंने लंदन से भी पुस्तक के समाचार को विभिन्न माध्यमों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास किए। यह महज किसी पुस्तक का प्रचार नहीं था, बल्कि मेरे लेखन पर उनके विश्वास और मेरे प्रति उनकी आत्मीयता का प्रमाण था।
निश्चित रूप से मेरी दोनों पुस्तकों की यात्रा में उनका योगदान एक मजबूत स्तंभ की तरह रहा है। कहते हैं कि कुछ लोग जीवन में आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन कुछ लोग जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। श्री बालमुकुंद ओझा मेरे लिए उन्हीं चुनिंदा लोगों में से एक हैं। उन्होंने मुझे केवल काम करना नहीं सिखाया, बल्कि काम को ईमानदारी, निष्ठा और आत्मीयता के साथ करना सिखाया। उनका स्नेह, मार्गदर्शन और सरल व्यक्तित्व मेरे लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
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