इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस्लाम अपनाने वाली दो महिलाओं की रिहाई और 25 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस्लाम अपनाने वाली दो महिलाओं की रिहाई और 25 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया
नई दिल्ली: धर्मांतरण के संवेदनशील मुद्दे पर एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो वयस्क महिलाओं को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है। दोनों महिलाओं ने अदालत में व्यक्तिगत रूप से बताया कि उन्होंने स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया है।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और उनके पिता को उन्हें गैरकानूनी तरीके से बंधक बनाने का संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया और महिलाओं को 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश भी दिया। धर्मांतरण और इस्लाम अपनाने वालों को गैरकानूनी तरीके से बंधक बनाने के मामले में यह एक दुर्लभ आदेश है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश धर्मांतरण विरोधी कानून, 2021 को जिस तरीके से लागू करने की कोशिश की गई, उसकी कड़ी आलोचना की।
यह आदेश जस्टिस संदीप जैन ने अंशु भाटिया उर्फ अमीना भाटिया (35) और दिया भाटिया उर्फ ज़ोया भाटिया (20) की ओर से 6 अगस्त को दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। अंशु उर्फ अमीना भाटिया 35 साल की, अविवाहित और उच्च शिक्षित हैं। उन्होंने जूलॉजी में M.Sc और M.Phil के साथ B.Ed की डिग्री भी ली है। वह एक इंटर कॉलेज में भी रह चुकी हैं। दिया उर्फ ज़ोया भाटिया 12वीं पास हैं और 20 साल की हैं।
दोनों महिलाओं ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने क्रमशः 2020 और 2021 में “मानसिक शांति, आध्यात्मिक संतुष्टि और आंतरिक सुकून” के लिए अपनी मर्जी से इस्लाम अपनाया था। उन्होंने किसी भी तरह के दबाव, धोखे, प्रलोभन या लालच से इनकार किया।
कैमरे के सामने बंद कमरे में बातचीत के दौरान महिलाओं ने कहा कि उनके पिता – अनिल कुमार भाटिया – उनके फैसले के खिलाफ थे। उन्होंने उन्हें घर में जबरन बंधक बना रखा था, शारीरिक रोक-टोक की, धमकाया और मानसिक उत्पीड़न किया। इसका उद्देश्य उन्हें उस धर्म को छोड़ने और हिंदू धर्म में वापस आने के लिए मजबूर करना था जिसे उन्होंने स्वेच्छा से अपनाया था।
उन्होंने कहा कि उन्हें घर से बाहर जाने की आजादी नहीं थी और माता-पिता के घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी। उनके अनुसार, वे अपने पिता की गैरकानूनी और जबरन कैद में तब तक रहीं जब तक उन्हें कोर्ट के आदेश पर अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया।
उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी मर्जी से जीवन जीने की इजाजत नहीं दी गई, जबकि वयस्क महिलाओं के रूप में उन्हें संविधान के तहत अपनी पसंद का धर्म चुनने और उसका पालन करने का अधिकार है।
महिलाओं ने बताया कि उनके पिता ने उनके पासपोर्ट, शैक्षिक प्रमाणपत्र, पहचान पत्र, बैंक पासबुक, चेक बुक, धर्मांतरण से संबंधित दस्तावेज और अन्य निजी सामान भी रोक रखे थे।
उत्तर प्रदेश सरकार ने याचिका का विरोध किया। सरकार ने कहा कि पिता द्वारा दर्ज FIR में जबरन और धोखे से धर्मांतरण का आरोप है और जांच के दौरान भारतीय न्याय संहिता और UP धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2021 की धाराएं भी जोड़ी गई हैं। राज्य ने आगे कहा कि कथित धर्मांतरण एक बड़ी संगठित साजिश का हिस्सा हो सकता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, एकता, अखंडता और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करता है।
हालांकि कोर्ट को इन आरोपों के समर्थन में कोई सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के बयान “स्वतःस्फूर्त, सुसंगत और स्पष्ट” थे और उनमें दबाव या अनुचित प्रभाव का कोई संकेत नहीं था।
कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा वाला तर्क खारिज किया
पीठ ने सरकार के तर्कों को मजबूती से खारिज करते हुए कहा कि कोर्ट के सामने ऐसा कोई सबूत नहीं रखा गया जिससे साबित हो कि दो वयस्क महिलाओं का स्वेच्छा से धर्म चुनना देश की संप्रभुता, अखंडता या सुरक्षा के लिए खतरा है। जज ने कहा कि व्यापक आरोप और काल्पनिक आशंकाएं संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकारों पर भारी नहीं पड़ सकतीं।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि दोनों महिलाएं स्वेच्छा से कोर्ट आईं, उन्होंने सुसंगत और स्पष्ट बयान दिए और उनमें डर, दबाव या अनुचित प्रभाव का कोई लक्षण नहीं था।
महत्वपूर्ण संवैधानिक टिप्पणियां
इस फैसले में कई अहम संवैधानिक बातें कही गई हैं जिनका असर भविष्य के धर्मांतरण से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत अंतःकरण की स्वतंत्रता में अपना धर्म अपनाने, त्यागने या बदलने का अधिकार शामिल है। माता-पिता का अधिकार वहीं खत्म हो जाता है जहां एक वयस्क व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता शुरू होती है। धार्मिक धर्मांतरण की वैधता और किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने की वैधता दो अलग-अलग सवाल हैं। UP धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2021 के तहत तय प्रक्रिया का कथित रूप से पालन न होना भी वयस्क महिलाओं को उनकी मर्जी के खिलाफ बंधक बनाने का आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि संवैधानिक अधिकार “माता-पिता के अधिकार, सामाजिक नैतिकता या बहुसंख्यक भावना” से दब नहीं सकते। एक वयस्क महिला को ऐसे व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता जिसकी धार्मिक पहचान परिवार के नियंत्रण में हो।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
अपने तर्क को मजबूत करने के लिए पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें शफीन जहां बनाम अशोकन के.एम. (2018), सोनी गेरी बनाम जेरी डगलस (2018) और राजेंद्र बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) शामिल हैं। इन फैसलों में धर्म, विवाह, निवास और व्यक्तिगत संबंधों के मामलों में वयस्क व्यक्तियों की स्वायत्तता को मान्यता दी गई है। इसका मतलब है कि जजों को धर्म, निवास और व्यक्तिगत संबंधों जैसे मामलों में वयस्क की पसंद की स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी, भले ही माता-पिता उसका विरोध करें या समाज उसे नापसंद करे।
कानूनी जानकारों ने इस फैसले को हाल के वर्षों में सबसे मजबूत न्यायिक टिप्पणियों में से एक बताया कि धर्मांतरण विरोधी कानूनों का इस्तेमाल वयस्क नागरिकों की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए वैध अधिकार के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता। आदेश में बार-बार कहा गया कि संवैधानिक अधिकार “माता-पिता के अधिकार, सामाजिक नैतिकता या बहुसंख्यक भावना” से दब नहीं सकते।
25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश
अपने सार्वजनिक कानून अधिकार का असाधारण इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पिता और उत्तर प्रदेश राज्य महिलाओं की स्वतंत्रता के असंवैधानिक हन के लिए संयुक्त और अलग-अलग रूप से जिम्मेदार हैं। कोर्ट ने 8 हफ्ते के अंदर दोनों महिलाओं को बराबर-बराबर 25 लाख रुपये देने का निर्देश दिया। साथ ही राज्य सरकार को राशि देने के बाद 50% राशि पिता से और बाकी 50% किसी दोषी सरकारी कर्मचारी से वसूलने की इजाजत भी दी, जो महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाया जाए।
फैसले में इस मामले को “संवैधानिक अधिकारों का असाधारण रूप से गंभीर और घोर उल्लंघन” बताया गया। कोर्ट ने कहा कि महिलाओं को सिर्फ इसलिए सालों तक उनकी आजादी से वंचित रखा गया क्योंकि उन्होंने अपने परिवार से अलग धर्म अपनाने का चुनाव किया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की लंबी कैद “संवैधानिक लोकतंत्र की नींव पर ही चोट” करती है।
महिलाओं को धर्म और निवास चुनने की स्वतंत्रता घोषित
याचिका स्वीकार करते हुए पीठ ने घोषणा की कि अंशु भाटिया और दिया भाटिया अपने पिता, राज्य या किसी अन्य व्यक्ति के हस्तक्षेप के बिना अपनी पसंद की जगह और किसी के साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं। कोर्ट ने पिता को 7 दिन के अंदर उनके सभी मूल दस्तावेज लौटाने का आदेश भी दिया और पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि उनके शांतिपूर्ण जीवन और स्वतंत्रता में कोई हस्तक्षेप न हो और जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षा भी दी जाए।
धर्मांतरण कानून पर दुर्लभ फैसला
इस फैसले को धर्मांतरण विवादों पर एक दुर्लभ और संभावित रूप से प्रभावशाली फैसला माना जा रहा है, खासकर क्योंकि इसमें तीन असामान्य बातें एक साथ हैं:
एक: इसमें धर्म की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा माना गया है। इससे एक वयस्क महिला के धर्म बदलने के अधिकार की पुष्टि होती है।
दो: इसमें कहा गया कि धर्मांतरण विरोधी कार्रवाई का इस्तेमाल परिवार के सदस्यों द्वारा गैरकानूनी हिरासत को जायज ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता। यह एक न्यायिक फैसला है कि माता-पिता द्वारा कैद करना गैरकानूनी हिरासत है।
तीन: इसमें राज्य और एक निजी व्यक्ति दोनों पर वयस्क महिलाओं की स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 के तहत भारी संवैधानिक मुआवजा लगाया गया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां सिर्फ गैरकानूनी हिरासत के मुद्दे तक सीमित हैं। इससे कथित धर्मांतरण से जुड़ी लंबित आपराधिक जांच के गुण-दोष पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जिसका फैसला सक्षम अदालत कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से करेगी।
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