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100 साल जीकर क्या किया, ‘करोड़पति फकीर’ से सीखिए:स्कॉलरशिप और मदद से पढ़ाई कीं, अमेरिका में प्रोफेसर रहे; शिक्षा के लिए दान कर दी करोड़ों की कमाई


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100 साल जीकर क्या किया, ‘करोड़पति फकीर’ से सीखिए:स्कॉलरशिप और मदद से पढ़ाई कीं, अमेरिका में प्रोफेसर रहे; शिक्षा के लिए दान कर दी करोड़ों की कमाई

100 साल जीकर क्या किया, 'करोड़पति फकीर' से सीखिए:स्कॉलरशिप और मदद से पढ़ाई कीं, अमेरिका में प्रोफेसर रहे; शिक्षा के लिए दान कर दी करोड़ों की कमाई

झुंझुनूं : राजस्थान के ‘करोड़पति फकीर’… सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन यह सच है। कभी फीस, किताबों और रहने-खाने के पैसे तक नहीं थे। गरीबी और संघर्ष देखा। लोगों की मदद और स्कॉलरशिप से पढ़ाई पूरी की। अमेरिका तक पहुंचे, गणित के प्रोफेसर बने। अब तक कमाई के 12 करोड़ रुपए बेटियों की पढ़ाई पर दान कर दिए।

आप जब यह खबर पढ़ रहे हैं, तब डॉ. घासीराम 100 साल के हो चुके हैं। फिजूल खर्च को रुपए का अपमान मानने वाले पैंट फटने पर रफू करवाकर पहन लेते हैं।

पढ़िए… झुंझुनूं के करोड़पति फकीर की पूरी कहानी

डॉ. घासीराम वर्मा के जीवन लिखी किताब ‘करोड़पति फकीर’ पढ़ती हुई उनकी पत्नी रुक्मणी देवी।
डॉ. घासीराम वर्मा के जीवन लिखी किताब ‘करोड़पति फकीर’ पढ़ती हुई उनकी पत्नी रुक्मणी देवी।

गरीबी में बीता बचपन, दूसरों की मदद ने बदली जिंदगी

डॉ. घासीराम वर्मा का जन्म 1 अगस्त 1926 को किसान चौधरी लादुराम के घर गांव सिगड़ी में हुआ। बचपन आर्थिक तंगी में बीता। पढ़ाई के दौरान कई बार फीस भरने, किताबें खरीदने और रहने-खाने तक के पैसे नहीं होते थे। पिलानी में नवलगढ़ ठिकाने के हेमसिंह राठौड़ की सिफारिश पर उन्हें एक स्कूल में एडमिशन मिला। ढाई रुपए हर महीने की छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) भी मिली। 1957 में पीएचडी तक की पढ़ाई छात्रवृत्तियों, सहपाठियों, समाजसेवियों और भामाशाहों की मदद से पूरी हुई।

अमेरिका जाने का मौका मिला, लेकिन पैसों की कमी फिर रास्ते में आ गई

डॉ. वर्मा खुद बताते हैं – जनवरी 1958 में इंडियन साइंस कांग्रेस, कलकत्ता में उनकी मुलाकात अमेरिकी गणितज्ञ प्रो. के.ओ. फ्रेडरिक्स से हुई। प्रो. फ्रेडरिक्स ने उन्हें अमेरिका आने का निमंत्रण दिया और पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप का अवसर भी दिलाया।

लेकिन उस समय अमेरिका जाने लिए रुपए नहीं थे। मदद मांगने पर बिड़ला एजुकेशन ट्रस्ट, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, विधायक सुमित्रा सिंह और उनके शिष्य विजयकुमार अड़ूकिया सहित कई लोगों ने आर्थिक सहयोग किया। आखिरकार 1 सितंबर 1958 को वे अमेरिका रवाना हुए और यहीं से उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ।

झुंझुनूं में डॉ. घासीराम वर्मा के पास पहने के लिए 40 साल पुराना एक कोट है। एक पैंट-शर्ट की जोड़ी और लपेटने के लिए दो लूंगी है।
झुंझुनूं में डॉ. घासीराम वर्मा के पास पहने के लिए 40 साल पुराना एक कोट है। एक पैंट-शर्ट की जोड़ी और लपेटने के लिए दो लूंगी है।

प्रोफेसर बने, परिवार बसाया और कमाई का बड़ा हिस्सा समाज के नाम किया

अमेरिका पहुंचने के बाद डॉ. वर्मा रोडे आइलैंड यूनिवर्सिटी के गणित विभाग में प्रोफेसर बने। रिटायरमेंट के बाद भी वे प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में जुड़े हुए हैं। उन्हें हर महीने डेढ़ लाख रुपए से अधिक पेंशन मिलती है और अमेरिका में बिजनेस से इनकम होती है। आज भी हर साल 20 से 30 लाख रुपए दान करते हैं। तीन बेटे डॉक्टर-इंजिनियर हैं, जो अमेरिका में ही रहते हैं। साथ ही अमेरिका में बिजनेस को भी संभालते हैं।

डॉ. वर्मा बताते हैं – करीब पांच पहले तक अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाते रहे और शोधार्थियों का मार्गदर्शन करते रहे। 2020 में लास्ट टाइम अमेरिका गए थे। अप्रैल 2022 में पत्नी रुक्मणी देवी के साथ वापस गांव लौट आए, तब गांव में ही है। साल 2025 में पत्नी की नेचुरल डेथ हो गई थी। अब चाचा-ताऊ के बेटे-बहु ही गांव में देखभाल करते हैं। घर में एक केयर टेकर रखा हुआ है।

1982 में छात्राओं की परेशानी देख दान की शुरुआत का फैसला किया

डॉ. वर्मा खुद बताते हैं – उस दौर में मिली हर छोटी मदद मेरे लिए काफी बड़ी थी। मन में ठान लिया था कि जब भी सक्षम होंगे, जरूरतमंदों की मदद जरूर करेंगे।

साल 1982 में अमेरिका से झुंझुनूं आए तो तेज धूप में दूर-दूर से पढ़ने आने वाली ग्रामीण छात्राओं की परेशानी देखी। खुद के संकट वाले दिन याद आए गए। उसी समय छात्रावास बनाने का फैसला किया। यहीं से उनकी दान करने की यात्रा शुरू हुई।

बाद में उनकी पहल से पहली बार 1984 में झुंझुनूं में महर्षि दयानंद स्कूल और बालिका छात्रावास (हॉस्टल) बना। जहां आज 300 से अधिक छात्राएं रहकर पढ़ाई करती हैं। इसी सोच से महिला साइंस कॉलेज भी स्थापित हुआ। इसके बाद उन्होंने कन्या शिक्षा को अपने जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य बना लिया।

डॉ. घासीराम वर्मा कहते हैं कि जो दूसरों की मदद करता है, भगवान उसे और देने की ताकत देता है।
डॉ. घासीराम वर्मा कहते हैं कि जो दूसरों की मदद करता है, भगवान उसे और देने की ताकत देता है।

कमाई, पेंशन और निवेश की आय समाज को समर्पित कर दी

डॉ. घासीराम वर्मा अब तक महिला शिक्षा और समाजसेवा के लिए 12 करोड़ रुपए से अधिक दान कर चुके हैं। यह पूरी राशि उन्होंने अपनी नौकरी की कमाई, पेंशन और निवेश से मिली आय से दी है। उनका सहयोग सिर्फ झुंझुनूं या शेखावाटी तक सीमित नहीं रहा।

उन्होंने राजस्थान के कई जिलों और देशभर में हॉस्टल, स्कूल, कॉलेज, एनजीओ (स्वयं संस्थाओं) और समाजोपयोगी भवनों के निर्माण में आर्थिक सहयोग दिया। इसके साथ ही महापुरुषों पर पुस्तकें प्रकाशित करवाईं और साहित्यिक संस्थाओं को भी सहयोग दिया।

सादगी ऐसी कि फटी पैंट रफू करवाई, बाल कटवाने भी भारत आते थे

समाजसेवी विजय गोपाल बताते हैं – करोड़पति होने के बावजूद डॉ. वर्मा बेहद सादा जीवन जीते हैं। झुंझुनूं में वे सामान्य से घर में रहते हैं और सामाजिक व शैक्षिक गतिविधियों में एक्टिव रहते हैं।

एक बार डॉ. वर्मा ने मुझे सिर्फ इसलिए बुलाया क्योंकि उनकी पैंट फट गई थी और उसे रफू करवाना था। एक बार डॉ. वर्मा अमेरिका लौटे तो मैं मिलने पहुंचा था। उनके बाल बड़े हुए तो। मुझे शायद बड़े बाल रखना शुरू कर दिया। पूछने पर कहा कि अमेरिका में बाल कटवाने पर तीन-चार हजार रुपए खर्च हो जाते हैं।

तीन महीने में भारत आने पर आकर करीब 50 रुपए में बाल कटवाते हैं और बची हुई रकम किसी जरूरतमंद छात्रा की फीस या किताबों पर खर्च कर देते हैं। फिजूलखर्ची और दिखावे पर पैसा खर्च करना लक्ष्मी का अपमान है।

100 साल की उम्र में भी शिक्षा का संदेश दे रहे

1 अगस्त को 100 वर्ष पूरे करने जा रहे डॉ. घासीराम वर्मा आज भी विद्यार्थियों के बीच जाकर पढ़ाई का महत्व बताते हैं, कक्षाएं लेते हैं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

उनके जीवन पर अब तक सात किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। इसमें ‘करोड़पति फकीर’, ‘बेदाग चदरिया’, समय से संवाद, ‘अतीत की झलक: डॉ. घासीराम वर्मा’ और ‘स्केलिंग द हाइट्स’ प्रमुख हैं।

खुद दान करते हैं, दूसरों को भी समाजसेवा के लिए प्रेरित करते हैं

डॉ. घासीराम वर्मा का कहना है – लोगों को सिर्फ कमाने की नहीं, बल्कि देने की भी आदत डालनी चाहिए। जो दूसरों की मदद करता है, भगवान उसे और देने की ताकत देता है। अमेरिका और दूसरे देशों में रहने वाले भारतीयों, अपने शिष्यों और प्रवासियों को लगातार पत्र लिखकर और व्यक्तिगत रूप से मिलकर समाजसेवा के लिए प्रेरित करते हैं। कई शिष्य आज फ्रांस, जापान, इंग्लैंड और अमेरिका में रहते हैं और उनकी प्रेरणा से शिक्षा व समाजसेवा के लिए दान कर रहे हैं।

डॉ. वर्मा का मानना है कि जिस तरह उन्हें छात्रवृत्तियों और दानदाताओं की मदद से आगे बढ़ने का अवसर मिला, उसी तरह समाज के सक्षम लोगों को भी जरूरतमंद बच्चों, खासकर बेटियों की शिक्षा में सहयोग करना चाहिए।

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