‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे से दिया चकमा,18-हजार फीट पर फहराया तिरंगा:जंग जीतकर लौटना सबसे बड़ी शादी; कारगिल युद्ध की कहानी सैनिकों की जुबानी
'अल्लाह-हू-अकबर' के नारे से दिया चकमा,18-हजार फीट पर फहराया तिरंगा:जंग जीतकर लौटना सबसे बड़ी शादी; कारगिल युद्ध की कहानी सैनिकों की जुबानी
झुंझुनूं : दुश्मन करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर पहाड़ों पर मजबूत स्थिति में बैठा था। भारतीय जवानों को नीचे से ऊपर की तरफ हमला करना था। जवानों के कंधों पर करीब 50-50 किलो का भारी सामान था। गोलियों का जखीरा भी सीमित था।
22 ग्रेनेडियर्स की मुस्लिम कंपनी ने ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हू-अकबर’ और रेजिमेंट के नारे ‘सर्वदा शक्तिशाली’ के साथ अचानक हमला किया। इससे पाकिस्तानी सेना पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना। भारतीय सेना ने इसका फायदा उठाया।
चार्ली कंपनी कमांडर मेजर अजीत सिंह (अब ब्रिगेडियर) के नेतृत्व में जवानों ने बैनेट फाइट और आर्टिलरी फायर के जरिए दुश्मन का मुकाबला किया। इसके बाद खालूबार रिज-5287 मीटर पर भारतीय सेना ने तिरंगा फहराया।
यह कहना है 22 ग्रेनेडियर्स के वेटरन रिटायर्ड ऑनरेरी कैप्टन टीपू सुलतान खान का। कारगिल विजय दिवस के 27 साल पूरे होने पर झुंझुनूं के टीपू सुलतान और रिटायर्ड नायब सूबेदार जंगशेर खां ने अनुभव साझा किए। कारगिल युद्ध में झुंझुनूं के 19 जवान शहीद हुए थे। हजारों फीट की ऊंचाई पर जवानों ने बेहद मुश्किल हालात में लड़ाई लड़ी। कई जगह तापमान बहुत कम था, जिससे वहां रहना और लड़ना जवानों के लिए बेहद मुश्किल था।

ससुराल मैसेज भेजा- सबसे बड़ी शादी युद्ध में सफल होकर लौटना
रिटायर्ड नायब सूबेदार जंगशेर खां ने बताया- जब मुझे कारगिल जाने का आदेश मिला, उसी समय मेरे साले की शादी तय थी। ससुराल से लगातार संदेश आ रहे थे कि मैं शादी की रस्मों में शामिल होने के लिए घर आ जाऊं। लेकिन मेरे लिए उस समय देश की रक्षा सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी। मैंने ससुराल में संदेश भेजकर कहा था कि मेरे लिए सबसे बड़ी शादी यही है कि युद्ध में सफल होकर लौटूं।
उन्होंने बताया- शायद वह खत आज भी मेरे ससुराल में मौजूद होगा। मैंने जवाब दिया था कि हमारे लिए सबसे बड़ी शादी यह है कि हम लड़ाई में सफल होकर आ जाएं, उसके बाद ही मैं आ सकता हूं। उससे पहले मैं नहीं आ सकता।

घर पर पहुंच गई शहादत की अफवाह
जंगशेर खां ने बताया कि जब मैं खालूबार की बर्फीली पहाड़ियों पर दुश्मन से लड़ रहा था, उस समय घर पर मेरी शहादत की झूठी खबर तक पहुंच गई थी। इससे परिवार की चिंता बढ़ गई थी। मैंने और मेरे साथियों ने जान की परवाह किए बिना दुश्मन से मुकाबला जारी रखा। जवानों ने मुश्किल परिस्थितियों में भी मोर्चा नहीं छोड़ा और दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर किया।
जब अपने ही जवानों के पास बोफोर्स से फायर करना पड़ा
धनूरी गांव के वेटरन रिटायर्ड ऑनरेरी कैप्टन टीपू सुलतान खान ने बताया कि मेरी यूनिट हैदराबाद से राजस्थान और फिर स्पेशल ट्रेन से महज तीन दिन में जम्मू और कारगिल के मोर्चे पर पहुंची थी। बुधखरबू से जवान पैदल यलडोर पहुंचे। इसके बाद द्रास, कारगिल और बटालिक सेक्टर की दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ाई शुरू की गई।
युद्ध के दौरान एक ऐसा समय भी आया, जब जवानों का गोला-बारूद कम होने लगा। दूसरी ओर दुश्मन लगातार काउंटर-अटैक कर रहा था। हालात इतने मुश्किल हो गए थे कि कंपनी कमांडर को SOS फायर का निर्देश देना पड़ा। इसका मतलब था कि बोफोर्स तोपों से अपने ही जवानों की स्थिति के आसपास फायर करना, ताकि दुश्मन को रोका जा सके।
टीपू सुलतान खान ने उस पल को याद करते हुए बताया कि 25 से 30 सेकंड का वह समय ऐसा था, जब सांसें थम जाती थीं। उस समय मां-बाप, यार-दोस्त और बचपन की गलियां आंखों के सामने घूमने लगती थीं। उन्होंने बताया कि बोफोर्स की मार से करीब ढाई किलोमीटर के दायरे में दुश्मन को भारी नुकसान हुआ। इसके बाद जवानों ने आमने-सामने की लड़ाई और बैनेट फाइट के जरिए दुश्मनों को पीछे खदेड़ दिया।

सैनिक के पास होता है सिर्फ 25-30 सेकंड का समय
कैप्टन टीपू सुलतान खान ने SOS फायर के बारे में कहा कि जब कोई सैनिक दुश्मन के बहुत करीब पहुंच जाता है और उसके पास लड़ने के लिए गोला-बारूद नहीं बचता तो वह दुश्मन के हाथों में नहीं पड़ना चाहता। ऐसी स्थिति में वह वायरलेस के जरिए कम से कम 45 किलोमीटर दूर मौजूद अपनी फोर्स से SOS फायर मांगता है।
उन्होंने बताया कि SOS फायर की अलग-अलग तरह की प्रक्रिया होती है। दिन में धुआं छोड़कर और रात में रोशनी के जरिए सैनिक अपनी लोकेशन बताते हैं। इसके बाद उसी जगह पर तोपों से फायर किया जाता है।
यह गोला इतना भयानक होता है कि आसपास करीब ढाई किलोमीटर के इलाके में कुछ भी बचना मुश्किल होता है। जिस सैनिक ने SOS फायर मांगा होता है, वह कोशिश करता है कि किसी चट्टान या ऐसी जगह छुप जाए, जहां गोले का सीधा असर न पहुंचे।
SOS फायर मांगने के बाद सैनिक के पास सिर्फ 25 से 30 सेकंड का समय होता है। इसके बाद गोला गिरता है और आसपास का इलाका तबाह हो जाता है।
कैप्टन टीपू सुलतान खान के अनुसार, उस समय सैनिक के मन में यही भाव रहता है कि ‘SOS मेरे जिस्म के बजाय मेरी आत्मा की रक्षा करना।’

देशभर से जवानों के लिए भेजी राखी-चिट्ठियां
कारगिल युद्ध के दौरान देशभर के लोगों ने जवानों का हौसला बढ़ाया। बहनों ने जवानों के लिए राखियां भेजीं। लोगों ने चिट्ठियां और खाने का सामान भी भेजा। कैप्टन टीपू सुलतान खान ने बताया कि जब चोटी पर तिरंगा लहराता हुआ दिखाई दिया तो ऐसा लगा कि अब तक किया गया हर संघर्ष सफल हो गया।
चाचा ने पत्र में लिखा- ‘घबराना मत बेटे, मुझे भी बुला लेना’
कैप्टन टीपू सुलतान खान ने बताया कि जब मैं सीमा पर जा रहा था, तब मेरे चाचा इकबाल ने मुझे एक पत्र भेजा था। पत्र में लिखा था- “अजीज टीपू सुलतान, प्यार भरा सलाम। तुम सीमा पर युद्ध में जा रहे हो, बड़ी खुशी हुई। घबराना मत बेटे, मुझे भी बुला लेना। ऐसा अवसर खुशनसीबों को ही मिलता है। वतन की हिफाजत में कोई कमी मत रखना।”
उन्होंने बताया- चाचा ने पत्र में आगे लिखा था कि वे भी युद्ध में जाना चाहते हैं। उन्होंने मुझसे कहा था कि अपने कर्नल को बता देना कि तुम्हारा चाचा भी युद्ध में आना चाहता है और दोनों चाचा-भतीजा मिलकर दुश्मन से लड़ेंगे। पत्र के आखिर में उन्होंने उम्मीद जताई थी कि टीपू सुलतान की हर गोली अपने निशाने पर लगेगी।
सैनिक बोले- युद्ध में जाति और भाषा नहीं, सिर्फ भारत था
कारगिल युद्ध में हिस्सा लेने वाले इन सैनिकों का कहना है कि आज भी उन दिनों की याद आती है तो आंखें नम हो जाती हैं। उन्हें गर्व है कि देश की ऐतिहासिक जीत में उनका भी योगदान रहा। युद्ध ने उन्हें सिखाया कि मोर्चे पर न कोई जाति थी और न कोई भाषा। वहां सिर्फ भारत था और देश की रक्षा का संकल्प था।
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