[pj-news-ticker post_cat="breaking-news"]

खामोश सिस्टम : 108 सोती रही, सड़कें लहूलुहान होती रहीं: जब लाचार हुआ सरकारी तंत्र, तब मरहूम भंवरू खान के संस्कारो ने बचाई जिंदगियां


निष्पक्ष निर्भीक निरंतर
  • Download App from
  • google-playstore
  • apple-playstore
  • jm-qr-code
X
टॉप न्यूज़फतेहपुरराजस्थानराज्यसीकर

खामोश सिस्टम : 108 सोती रही, सड़कें लहूलुहान होती रहीं: जब लाचार हुआ सरकारी तंत्र, तब मरहूम भंवरू खान के संस्कारो ने बचाई जिंदगियां

​पद और पावर की चकाचौंध से दूर 'अवाम का सच्चा हमदर्द': संकट की घड़ी में सियासत के बड़े काफिले नहीं, मुबारिक खान की निस्वार्थ इंसानियत आई काम

जनमानस शेखावाटी सवांददाता : अनिल शेखीसर

​रोलसाबसर फतेहपुर : ​कहने को तो प्रदेश में आपातकालीन सेवाएं दिन-रात ‘दौड़’ रही हैं, लेकिन कड़वी ज़मीनी हकीकत यह है कि जब किसी बेबस परिवार की सांसें अटक रही हों, तो 108 एंबुलेंस की घंटी 20 मिनट तक सिर्फ बजती ही रह जाती है। रोलसाबसर में सच कैंटीन के सामने गुरुवार शाम हुआ भीषण हादसा न सिर्फ सड़कों पर यमदूत बनकर घूमते आवारा मवेशियों के खौफ की बानगी है, बल्कि उस लाचार स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी करारा तमाचा है जो कागजों में तो ‘हाजिर’ है, लेकिन अपनों की जिंदगी और मौत की जंग के वक्त ‘नदारद’।

108 सुस्त जिम्मेदार चुस्त?
प्राप्त जानकारी के अनुसार
​अस्पताल से लौट रहे एक मरीज के साथ हुए इस खौफनाक हादसे के बाद जब जिंदगी की डोर छूट रही थी, तब स्थानीय लोगों ने पत्रकार आबिद खान दाडून्दा को सूचना दी जिन्होंने लगातार 20 मिनट 108 पर कॉल घुमाए। पर जवाब में सिर्फ बेपरवाह खामोशी मिली। 20 मिनट तक एंबुलेंस सेवा का न जगना यह बताने के लिए काफी है कि सिस्टम की लापरवाही कितनी बड़ी हैं।

मसीहा बना मरहूम भंवरू खान का संस्कार
​जब सरकारी अमला संवेदनहीनता की नींद सो रहा था, तब इंसानियत का फर्ज जागा। घटना की भयानकता की सूचना मिलते ही रोलसाबसर के पूर्व विधायक मरहूम भंवरू खान के पुत्र पूर्व सरपंच मुबारिक खान देवदूत बनकर मौके पर पहुंचे। और अपनी निजी कार लेके सीधे धानुका अस्पताल की तरफ दौड़ पड़े। जिस से कई घरों के चिराग बुझने से बच गए।

स्थानीय लोगो को याद आए मरहूम भंवरू खान
​इस भावुक दृश्य को देखकर मौके पर मौजूद बुजुर्गों का गला भर आया और आंखें नम हो गईं। हर जुबां पर गर्व से एक ही बात थी- “शरीर ढल जाते हैं, लेकिन संस्कार कभी नहीं मरते।” लोगों को तीन बार विधायक रहे इस मिट्टी के सबसे चहेते जननायक मरहूम भंवरू खान साहब की याद आ गई। भंवरू खान साहब ने जिस सादगी, आत्मीयता और निस्वार्थ भाव से जीवनभर जनता के हर दुख-दर्द को अपना समझकर सीने से लगाया, आज वही अक्स, वही सेवा भाव उनके बेटे मुबारिक खान रोलसाबसर में साफ नजर आया।

भंवरू खान के बाद हाकम अली
​दिलचस्प और कड़वी बात यह है कि मरहूम भंवरू खान की सियासी विरासत को संभालते हुए उनके छोटे भाई हाकम अली खान आज दूसरी बार विधायक की कुर्सी पर आसीन हैं वहीं दूसरी तरफ, मुबारिक खान में हमेशा पद की चकाचौंध और राजनीति के दांव-पेचों से दूरी देखने को मिली हैं। इसका क्या कारण हैं। सामने नही आया हैं।

आमजन में चर्चा
हालांकि, क्षेत्र की जनता का दिल और उसकी पारखी नजरे कह रही हैं कि अब जनता के दिलों से यह मौन सवाल भी उठने लगा है कि क्या सादगी, निस्वार्थ जनसेवा और अवाम से सीधे जुड़ाव की यही कीमत होती है कि इंसान को व्यवस्था और सियासत के मुख्य कैनवास से खामोशी से दरकिनार कर दिया जाए?

​लेकिन जनता का गणित पद और पावर से नहीं, दिल के रिश्तों से चलता है। सत्ता के समीकरण चाहे जो भी रहें, अवाम बखूबी जानती है कि विपदा और संकट की घड़ी में बड़ी गाड़ियों का खोखला काफिला नहीं, बल्कि मुबारिक खान जैसा वही शख्स काम आता है जो अवाम के दर्द को अपना दर्द मानता है।

​यह दर्दनाक हादसा सरकार, प्रशासन और लाचार स्वास्थ्य विभाग के मुंह पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है-

  • ​आखिर आपातकालीन 108 सेवा कब तक सिर्फ एक शो-पीस और सफेद हाथी बनी रहेगी?
  • आवारा मवेशियों के कारण सड़कों पर रोज़ बहते इस बेकसूर खून की जिम्मेदारी किस अधिकारी की होगी?
  • क्या अवाम को हर विपदा में इलाज और सांसों के लिए किसी ‘मुबारिक खान’ के भरोसे ही रहना पड़ेगा?
  • ​सरकार और नीति-नियंताओं को यह अच्छी तरह समझ लेना होगा कि चुनाव सिर्फ नारों, वादों और घोषणाओं से जीते जा सकते हैं, लेकिन अवाम का दिल और दुआएं संकट के समय उसके साथ ढाल बनकर खड़े रहने वाले सच्चे हमदर्द ही जीतते हैं।

Related Articles