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मिट्टी के बर्तन बनाने वाले उद्योगों पर छाया संकट, सरकारी मदद मिले तो हो पुनर्जीवित


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मिट्टी के बर्तन बनाने वाले उद्योगों पर छाया संकट, सरकारी मदद मिले तो हो पुनर्जीवित

मिट्टी की मटकियों की खपत घटी और सुराही ने खोई अपनी पहचान, गर्मी में शीतलता का अहसास कराने वाले मिट्टी के मटकों का चलन हुआ कम

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद आरिफ चंदेल

झुंझुनूं : प्राचीन काल से लेकर आज तक मिट्टी के मटकों और बर्तनों की अपनी अलग ही पहचान और महत्व रहा है मगर आज इस फैशन और आधुनिकता की दौड़ में मिट्टी के मटकों और बर्तनों का चलन बहुत कम हो गया है। लोग मिट्टी के मटको को छोड़कर वाटर कूलर, फ्रिज और बोतल बंद चिल्ड पानी का उपयोग करने लगे हैं जिसका सीधा प्रतिकूल प्रभाव आमजन के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लोगों में दिनोंदिन दांतों और गले की बीमारियां बढ़ रही है। मिट्टी के मटकों का पानी आज भी शीतलता प्रदान करने वाला और पौष्टिक माना जाता है। हमारे समाज के बुजुर्ग लोग आज भी अपने घरों में मिट्टी के मटकों का पानी पीना ज्यादा पसंद करते हैं। उनका कहना है कि मटकों का पानी स्वास्थ्यवर्धक होता है और मिट्टी की संगत में आने से उसमें मिट्टी की सोंधी सुगंध आती है जो प्राकृतिक और ठंडा होने के बावजूद भी इसका शरीर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

बाजारों से लुप्त हो गई मिट्टी से बनी “सुराही”

आधुनिकता और फैशन की इस चकाचौंध में लोगों ने आज मिट्टी के मटकों की उपयोगिता को भूला दिया है जिसके चलते आज मिट्टी की मटकियों की खपत घट गई है और मिट्टी की सुराही ने अपनी पहचान खो दी है। आज के युवा मिट्टी से बनी सुराही को पहचानते तक नहीं जबकि आज से लगभग 20 वर्ष पहले लगभग हर घर में मिट्टी से बनी सुराही आसानी से मिल जाती थी। लोग मिट्टी की सुराही में रखें ठंडे पानी को बहुत शौक से पीते थे। सुराही पीने के पानी को ठंडा रखने के लिए मिट्टी का बनाया हुआ एक ऐसा घड़ा होता है जिसकी गर्दन संकरी एवं लंबी होती है और जिसके नीचे का भाग लोटे की तरह गोल और ऊपर का भाग लंबे नल की तरह होता है। मिट्टी के घड़ों का चलन कम होने के साथ-साथ मिट्टी से बनी सुराही भी बाजारों से लगभग लुप्त हो गई है। मांग नहीं होने से कुंभकार भी मिट्टी की सुराही बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।

मटके बनाने वाले उद्योगों पर छाया संकट, सरकार मदद करे तो बने बात

प्रचंड गर्मी के मौसम में शीतलता का एहसास कराने वाले मिट्टी के घड़ों का प्रचलन कम होने से ग्रामीण क्षेत्रों में मटके बनाने वाले कारीगर और उद्योगों पर आर्थिक संकट छा गया है। मटकों की मांग कम होने से कुंभकारों के लिए अपने बच्चों का पेट पालना भी मुश्किल हो गया है। गांव में मेहनत के अनुसार मिट्टी के मटकों की कीमत नहीं मिलने से कुंभकार भी मटके बनाने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। जिले के इस्लामपुर कस्बे के सोमवीर कुमावत ने बताया कि जब से बाजारों में वाटर कूलर, फ्रिज और बोतल बंद पानी की मांग बड़ी है वैसे-वैसे मिट्टी के मटकों और घड़ों की मांग कम होने लगी है जिससे घर चलाना भी मुश्किल हो गया है। उन्होंने बताया कि पहले इस्लामपुर कस्बे में लगभग 15 से 20 घरों में कुंभकार मिट्टी के मटकों का निर्माण करते थे मगर आज मटकों की मांग कम होने से मात्र दो से तीन घरों में ही मिट्टी के मटकों का निर्माण किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि मिट्टी के मटके बनाने वाले कारीगरों को सरकार की ओर से कोई विशेष सुविधा नहीं मिल रही है जिसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में मटके बनाने वाले कुंभकार अपने बुजुर्गों से विरासत में मिले अपने पुश्तैनी काम को धीरे-धीरे छोड़ते जा रहे हैं। कुंभकारों का कहना है कि अगर सरकार की तरफ से कोई सहयोग मिले तो ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के मटके बनाने वाले उद्योग फिर से पुनर्जीवित हो सकते हैं।

मिट्टी के मटकों का पानी मनुष्य के बॉडी टेंपरेचर के अनुकूल और प्राकृतिक ठंडा होता है जिसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है जबकि फ्रिज का ठंडा पानी बॉडी टेंपरेचर के अनुकूल नहीं होने से शरीर में कई तरह की बीमारियां फैलने का अंदेशा रहता है। मटके का पानी जितना स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है फ्रिज ओर बोतल बंद पानी उतना पोष्टिक नहीं होता है। – डॉ. पारस लाखलाण, सीनियर स्पेशलिस्ट, राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इस्लामपुर

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