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प्रशासन की आड़ में पत्रकारों पर प्रहार के विरोध में धरने का तीसरा दिन


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प्रशासन की आड़ में पत्रकारों पर प्रहार के विरोध में धरने का तीसरा दिन

लोकतंत्र के 'चौथे खंभे' पर प्रहार या सिर्फ एक रेस्टोरेंट पर वार? जयपुर की सड़कों पर गूंजता पत्रकारों का स्वाभिमान!

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान

जयपुर/चूरू : कहते हैं कि लोकतंत्र में ‘कलम’ सबसे ताकतवर होती है, लेकिन आजकल लगता है कि ‘सिस्टम’ ने कलम की स्याही सुखाने का नया तरीका ढूंढ लिया है। मामला सिर्फ एक रिसाॅर्ट या रेस्टोरेंट पर हुई कार्रवाई का नहीं है। अगर आप इसे केवल ईंट-पत्थर फर्नीचर की टूट-फूट समझ रहे हैं, तो शायद आप सत्ता के उस ‘सांकेतिक संदेश’ को नहीं पढ़ पा रहे हैं, जो वह खुल कर दे रहा है। भारत का सबसे पुराना पत्रकार संगठन IFWJ (Indian Federation of Working Journalists), जो 1950 से पत्रकारों के हक की लड़ाई लड़ रहा है। जब देश आजाद हुआ था, तब से यह संस्था पत्रकारों की आवाज बनी हुई है। लेकिन आज क्या देखा जा रहा है? इस संस्था के मुखिया की आजीविका को निशाना बनाया जा रहा है।

यह कोई साधारण प्रशासनिक कार्यवाही नहीं, बल्कि एक ‘साइकोलॉजिकल वॉर’ (मनोवैज्ञानिक युद्ध) है। संदेश साफ है: “जब हम तुम्हारे मुखिया को नहीं छोड़ रहे, तो तुम अन्य पत्रकारों की क्या बिसात?”ब्यूरोक्रेसी का ‘नया शौक’: सच बोलने वालों की नकेल कसना वाह री अफसरशाही! जनता की समस्याओं पर फाइलें महीनों तक धूल फांकती हैं, लेकिन जब किसी पत्रकार की आवाज को दबाना हो, तो सरकारी मशीनरी ‘सुपरसोनिक स्पीड’ से दौड़ने लगती है।सत्य लिखोगे? तो जांच का सामना करो। सवाल पूछोगे? तो प्रताड़ना के लिए तैयार रहो।हक की बात करोगे? तो आपके वजूद पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएंगे।

आज सरकारी तंत्र का उपयोग लोकसेवा के लिए कम और ‘प्रतिशोध’ के लिए ज्यादा होता दिख रहा है। यह किसी एक पत्रकार के खिलाफ हमला नहीं है, यह उस हर इंसान के खिलाफ है जो अन्याय को देखने के बाद चुप नहीं बैठता।आज उनकी बारी, कल आपकी! साथियों, अगर आज हम चुप रहे, तो कल यह मत पूछना कि “मेरा नंबर क्यों आया?” आज अगर एक मुखर आवाज को दबाने में ये कामयाब हो गए, तो कल एक-एक करके हर उस जुबान पर ताला जड़ दिया जाएगा जो सच बोलने का साहस रखती है। अन्याय की उम्र तभी तक लंबी होती है, जब तक सहने वाले एकजुट नहीं होते। चाहे आप रिपोर्टर हों, एंकर हों, फोटोग्राफर हों या एडिटर—हम सब एक ही हैं। हमारी पहचान किसी संस्थान का अस्थाई ‘पद’ नहीं, हमारी पहचान और ‘धर्म’ है, ‘सत्य’। आह्वान: जयपुर चलो, वजूद बचाओ!

जयपुर में चल रहा अनिश्चितकालीन धरना केवल एक प्रदर्शन नहीं है; यह पत्रकारों के ‘आत्मसम्मान’ की अग्निपरीक्षा है। अगर आप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यवस्था की इस प्रताड़ना का शिकार हुए हैं, तो घर से निकलिए। अगर हम आज हाथ से हाथ मिलाकर खड़े नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी कि जब हमारी लड़ाई लड़ने वाले की आवाज दबाई जा रही थी, तब ‘कलम के दुसरे सिपाही’ कहां सो रहे थे? याद रखिए, यदि हम आज नहीं उठे, तो आगे कोई भी ‘प्रतिरोध’ करने के लायक नहीं बचेगा। हमें अपने तन-मन-धन से इस संघर्ष को सफल बनाना होगा।

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