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माहे रमजान में 10 दिन तक बैठे एतकाफ पर हैदर अली खान एवं मोहम्मद फिरजान


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माहे रमजान में 10 दिन तक बैठे एतकाफ पर हैदर अली खान एवं मोहम्मद फिरजान

‌ मस्जिद अल हाशमी में एकांत में की इबादत

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान

चूरू : जिला मुख्यालय पर‌ वार्ड संख्या 4 बादशाह कॉलोनी में मस्जिद अल -हाशमी ‌मे ‌ माहे रमजान के तीसरे अशरे में एतकाफ ‌ (एकांत में बैठकर अल्लाह की इबादत करना) पर बैठे दो बच्चे जिनकी उम्र लगभग 15 वर्ष ‌ हैदर अली खान उर्फ लक्की पुत्र मोहम्मद अली खान रुकन खानी और मोहम्मद फिरजान पुत्र मोहम्मद रफीक माजुका ‌ बादशाह कॉलोनी दोनों बच्चे 10 दिन के लिए एतकाफ पर ‌ मस्जिद में एकांत में बैठकर अल्लाह की इबादत का सर्फ हासिल किया। बड़े बूढ़े बुजुर्गों द्वारा और हदीस में भी आया है की रमजान के महीने में तीसरे अशरे पर 10 दिन तक एतकाफ पर बैठने से मोहल्ले, शहर कि आफते टल जाती हैं । ‌

ईद का चांद देखते ही बाद नमाज मगरिब के दोनों बच्चों को फूल मालाएं पहनाकर जुलूस के रूप में घर तक सभी नमाजी विदा कर के आते हैं। और ‌ मस्जिद के इमाम मौलाना कुर्बान अली ने दुवाएं की ‌ और कहा कि इस्लाम में एतिकाफ़ (मस्जिद में इबादत की नीयत से ठहरना) एक निहायत ही अज़ीम इबादत है, जिसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बड़ी पाबंदी से अदा फरमाया है। हदीस की रोशनी में इसके कुछ मुख्य फायदे और फज़ीलतें निम्नलिखित हैं: दो हज और दो उमरा का सवाबः एक हदीस (अल-कश्फुल गुम्मा) के अनुसार, जो व्यक्ति रमज़ान के आखिरी दस दिनों में एतिकाफ़ करता है, उसे दो हज और दो उमरा के बराबर सवाब मिलता है। शबे-क़द्र (लैलतुल क़द्र) की तलाशः एतिकाफ़ का सबसे बड़ा मक़सद ‘लैलतुल क़द्र’ को पाना है, जो हज़ार महीनों की इबादत से बेहतर है। हदीस के मुताबिक, नबी करीम (स.) ने इसी रात की तलाश के लिए रमज़ान के आखिरी अशरे (10 दिन) का एतिकाफ़ फ़रमाया।

गुनाहों से हिफाज़त और नेकियों में इज़ाफा: रसूलुल्लाह (स.) का इरशाद है कि एतिकाफ़ करने वाला (मोतकिफ) गुनाहों से महफूज रहता है और उसके खाते में उतनी ही नेकियाँ लिखी जाती हैं जितनी उन लोगों के लिए जो बाहर रहकर नेक काम (जैसे बीमार की इयादत या जनाज़े में शिरकत) कर रहे होते हैं। जहन्नम की आग से दूरीः तबरानी की एक रिवायत के मुताबिक, जो शख्स अल्लाह की रज़ा के लिए एक दिन का भी एतिकाफ़ करता है, अल्लाह उसके और जहन्नम के बीच तीन खंदकों (खाइयों) का फासला कर देता है, जिनमें से हर खंदक ज़मीन और आसमान की दूरी के बराबर होती है। दुनियादारी से दूरी और रूहानी सुकूनः एतिकाफ़ इंसान को दुनिया की भागदौड़ से दूर कर अल्लाह के करीब लाता है। यह वक़्त आत्म-चिंतन , सब्र, और अपने नफ़्स (मन) पर काबू पाने का बेहतरीन ज़रिया है। एतिकाफ़ के दौरान इंसान अल्लाह का मेहमान होता है और उसका सोना, जागना, यहाँ तक कि खामोश रहना भी इबादत में शुमार होता है।

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