चारा-पानी और दवाओं के अभाव में भटकता गौवंश, गौसेवकों में आक्रोश – चेतावनी: गौहित से भटके तो होगी कानूनी कार्रवाई
चारा-पानी और दवाओं के अभाव में भटकता गौवंश, गौसेवकों में आक्रोश - चेतावनी: गौहित से भटके तो होगी कानूनी कार्रवाई
झुंझुनूं : जिले सहित प्रदेशभर में गौशालाओं की बदहाल स्थिति और सड़कों पर बेसहारा घूमते गौवंश को लेकर गौसेवकों और आमजन में गहरा आक्रोश देखने को मिल रहा है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि एक ओर गौशालाओं को सरकारी अनुदान मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर भूख, प्यास और बीमारी से जूझता गौवंश सड़कों पर भटकने को मजबूर है।
गौसेवकों का आरोप है कि गौशालाओं का मूल उद्देश्य – बीमार, लाचार और निराश्रित गौवंश की सेवा – पूरी तरह से उपेक्षित हो गया है। चारा, पानी और दवाओं जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं में लापरवाही बरती जा रही है, जिससे गौवंश की स्थिति दिन-प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है।
गौसेवा के नाम पर अनियमितताओं का आरोप
स्थानीय गौसेवकों का कहना है कि कई स्थानों पर गौसेवा की बजाय अन्य गतिविधियों पर ध्यान दिया जा रहा है, जो न केवल अनुचित है बल्कि गौशालाओं के निर्धारित नियमों के भी विपरीत है।
गौसेवकों ने दी चेतावनी
गौसेवकों और आमजन ने प्रबंधन समितियों को सख्त शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि:
- गौशालाओं का उद्देश्य केवल गौसेवा है, इससे किसी भी प्रकार का विचलन स्वीकार नहीं किया जाएगा
- चारा, पानी और दवाओं की नियमित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए
- बीमार और बेसहारा गौवंश को तुरंत गौशालाओं में आश्रय दिया जाए
- अनियमितताओं की स्थिति में जिम्मेदारों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाएगी
कानूनी कार्रवाई की तैयारी
आक्रोशित गौसेवकों ने स्पष्ट किया है कि यदि शीघ्र सुधार नहीं हुआ, तो वे सीधे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। उनका कहना है कि गौशालाओं के नियमों का उल्लंघन किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों को कानून के दायरे में लाया जाएगा।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में प्रशासन की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं। गौसेवकों का कहना है कि जब हालात इतने गंभीर हैं, तो संबंधित विभाग अब तक सक्रिय क्यों नहीं हुआ।
सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग
यह मुद्दा केवल गौशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आस्था, सामाजिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह आक्रोश बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। गौसेवकों का कहना है कि गौशालाएं यदि गौसेवा का केंद्र नहीं बन सकीं, तो उनका अस्तित्व ही सवालों के घेरे में आ जाएगा।
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