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घांघू में शीतला अष्टमी पर्व हर्षोल्लास से मनाया:श्रद्धालुओं ने बासी भोजन का भोग लगाकर मांगी सुख-समृद्धि


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घांघू में शीतला अष्टमी पर्व हर्षोल्लास से मनाया:श्रद्धालुओं ने बासी भोजन का भोग लगाकर मांगी सुख-समृद्धि

घांघू में शीतला अष्टमी पर्व हर्षोल्लास से मनाया:श्रद्धालुओं ने बासी भोजन का भोग लगाकर मांगी सुख-समृद्धि

घांघू : घांघू गांव में बुधवार को शीतला अष्टमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। लोक परंपरा में इसे बासीड़ा त्योहार के रूप में जाना जाता है, जिसमें शीतला माता को ठंडे और बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। इस पर्व के लिए एक दिन पहले रात में माता को भोग लगाने के लिए पकवान तैयार किए जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से राबड़ी, मीठा बाजरा, चावल, बाजरे की रोटी, सांगरी की सब्जी, मोठ और बाजरे के बिरिया (अंकुरित अनाज) शामिल होते हैं। आजकल आधुनिक मिठाइयाँ भी भोग में शामिल की जाती हैं।

बुधवार सुबह से ही घांघू के वार्ड नंबर चार स्थित शीतला माता मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने माता के दर्शन किए। महिलाएं मिट्टी के कुंडों में भोग लेकर मंगल गीत गाते हुए मंदिर पहुंचीं। श्रद्धालुओं ने, जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक थी, शीतला माता को एक दिन पहले बनाए गए भोजन का भोग लगाया। उन्होंने सुख-समृद्धि, निरोगता और अच्छी फसल की कामना की।

मान्यता के अनुसार, बच्चों को बीमारियों से बचाने और आँखों को स्वस्थ रखने के लिए शीतला माता मंदिर के जल से उनकी आँखें और मुँह धोए गए। यह भी माना जाता है कि इससे बच्चों को ‘निकाले’ जैसी बीमारियां नहीं होतीं।

गांव की ऋतु शर्मा और छोटू देवी भाम्बू ने बताया कि शीतला माता एकमात्र ऐसी देवी हैं जो ठंडे और बासी भोजन से प्रसन्न होती हैं। उन्होंने विशेष रूप से मोठ-बाजरे के आटे की बासी राबड़ी और बाजरे की रोटी को माता का प्रिय भोग बताया। मोठ और बाजरे के बिरिया को स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि बासीड़ा के बाद गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है, और गर्मी में राबड़ी का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है, जो लू और तापघात से बचाता है।

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