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मंड्रेला : इस वर्ष मंड्रेला में गणगौर का पर्व ऐतिहासिक बनने जा रहा है। करीब 36 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद मंड्रेला गढ़ (पाना कान सिंह जी) से गणगौर माता और इस्सर जी की भव्य व राजसी सवारी एक बार फिर निकाली जाएगी। गढ़, जिसे स्थानीय स्तर पर श्योलाल सिंह जी–जगत सिंह जी गढ़ के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा लिए गए इस निर्णय से पूरे शहर में उत्साह का माहौल है।
इस घोषणा के बाद मंड्रेला के नागरिकों में खुशी की लहर दौड़ गई है और लोग इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने के लिए तैयारियां कर रहे हैं। गणगौर राजस्थान का प्रमुख लोकपर्व है, जो देवी पार्वती (गणगौर माता) और भगवान इस्सर (भगवान शिव) की आराधना से जुड़ा हुआ है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के सौभाग्य, समृद्धि और पारिवारिक सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
मंड्रेला में वर्षों पहले यह सवारी परंपरागत रूप से बड़े धूमधाम से निकाली जाती थी, जो समय के साथ बंद हो गई थी। अब इसे फिर से शुरू करने का निर्णय क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इतिहास के अनुसार मंड्रेला जयपुर राज्य के प्रतिष्ठित ताजीमी ठिकानों में से एक रहा है और इसकी जड़ें झुंझुनूं राज परिवार से जुड़ी हुई हैं। मंड्रेला ठिकाने की स्थापना वर्ष 1751 में ठाकुर दौलत सिंह जी ने की थी। वे झुंझुनूं के राजकुमार जोरावर सिंह जी के तृतीय पुत्र और राजा शार्दुल सिंह शेखावत के पोते थे।
राजा शार्दुल सिंह शेखावत ने झुंझुनूं में हिन्दू शासन की पुनः स्थापना करते हुए जोरावरगढ़ किला, अखेगढ़ किला, जमवाई माता मंदिर, गोपीनाथ जी मंदिर और कल्याण जी मंदिर जैसी ऐतिहासिक धरोहरों का निर्माण करवाया था। ऐसे गौरवशाली इतिहास से जुड़ी गणगौर सवारी का वर्षों बाद पुनः आयोजन मंड्रेला की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊर्जा देगा।
गढ़ के सदस्यों का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं, संस्कृति और इतिहास से जोड़ना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस धरोहर को आगे बढ़ा सकें।
21 मार्च को निकलेगी ऐतिहासिक सवारी
मंड्रेला गढ़ से 21 मार्च को गणगौर माता और इस्सर जी की ऐतिहासिक व भव्य सवारी निकाली जाएगी। इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्य यंत्र, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक झांकियों के साथ पूरे शहर में उत्सव का माहौल रहेगा।
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