कुरान में स्पष्ट है कि अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है तंगी नहीं यह संदेश रमजान की इबादतों में भी झलकता हैं – मुफ्ती गुलशेर रज्जा अल- मिस्बाही
कुरान में स्पष्ट है कि अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है तंगी नहीं यह संदेश रमजान की इबादतों में भी झलकता हैं - मुफ्ती गुलशेर रज्जा अल- मिस्बाही
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय पर स्थित मदरसा सैयदना तौकीर उल- उलूम सैनिक बस्ती के प्रिंसिपल मुफ्ती गुलशेर रज्जा अल -मिस्बाही ने माहे रमजान की मुबारकबाद दी। ओर कहा माहे रमजान के बारे में पवित्र कुरान में कई महत्वपूर्ण और विशेष बातें बताई गई हैं। जो इस महीने को इस्लाम में सबसे पवित्र बनाती हैं। कुरान का अवतरणः कुरान की सूरह अल-बकरा (2:185) के अनुसार, रमज़ान वह महीना है जिसमें कुरान इंसानियत के मार्गदर्शन (हिदायत) के लिए उतारा गया । इसी महीने की एक विशेष रात, जिसे ‘लैलतुल कद्र’ कहा जाता है, में पहली बही (संदेश) नाजिल हुई थी ।
रोज़ा रखना अनिवार्यः कुरान में आदेश दिया गया है कि जो कोई भी इस महीने को पाए, वह रोज़ा (व्रत) रखे। यह इस्लाम के पांच प्रमुख स्तंभों में से एक है। तक़वा (परहेजगारी) का उद्देश्यः कुरान के अनुसार, रोज़े का मुख्य उद्देश्य इंसान के भीतर ‘तक़वा’ यानी ईश्वर-भय -चेतना और संयम पैदा करना है। यह केवल भूखे रहने का नाम नहीं, बल्कि अपनी बुराइयों और इच्छाओं पर नियंत्रण पाने का अभ्यास है।

बीमारों और मुसाफिरों को छूटः कुरान उदारता दिखाते हुए कहता है कि जो व्यक्ति बीमार हो या यात्रा पर हो, उसे उस समय रोज़ा न रखने की अनुमति है, लेकिन उसे बाद में उतने दिनों की गिनती पूरी करनी होगी।
अल्लाह की आसानीः कुरान में स्पष्ट है कि “अल्लाह तुम्हारे लिए आसानी चाहता है।, तंगी नहीं”। यह संदेश रमज़ान की इबादतों में भी झलकता है। माहे रमजान की अहमियत इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इसी माह में पवित्र कुरआन पूरा नाजिल हुआ। रमजान की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए, मुफ़्ती साहब ने बताया कि मानसिक रूप से स्वस्थ हर मुस्लिम मर्द और औरत के लिए रमजान का रोजा अनिवार्य किया गया है। उन्होंने कहा कि निर्धारित अवधि में केवल खाने पीने से परहेज का नाम रोजा नहीं है बल्कि ये जरूरी है कि शरीर के विभिन्न अंगों जैसे हाथ, पैर, दिल, आंख कान आदि को भी उन चीजों और कामों से बचाया जाए जिसकी मनाही अल्लाह ने की है।
कुरआन और हदीस का हवाला देते हुए कहा कि रोजा की हालत में चंद चीजों को छोड़ने की प्रैक्टिस और ट्रेनिंग दी जाती है ताकि सारी उम्र वो खुदा के हुक्म के अनुसार जीवन गुजारेगा और वो उन चीजों को छोड़ देगा जो उसके रब को नापसंद है। रोजा की हालत में खाना पीना छोड़ देना दरअसल इस बात का प्रमाण है कि बंदा अपने रब के फरमा बरदार है। वो हर उस चीज को छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है जिसे छोड़ने का आदेश अल्लाह ने दिया है। यहां तक कि निर्धारित अवधि में वो भूखा प्यासा रहने को भी तैयार हो जाता है। रोजा की पाबंदी के साथ-साथ कुरआन की तिलावत भी करें। और जहां तक हो सके तिलावत -ए -कुरान तर्जुमा से पढ़ें और सीखें कोशिश ये होनी चाहिए कि किसी से भी चीख चिल्ला कर बात न करें, न ही किसी से लड़ाई झगड़ा करें। पीठ पीछे दूसरे की बुराई न करें। रमजान के महीने में लोग अपनी मुट्ठी खोल दें। गरीब, बेसहारा, और जो जकात का हकदार है उसको जकात अदा करें। एक माह के रोजे रखना भी वैज्ञानिक दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
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