रहमतों और बरकतों का महीना रमजान है कुरान को तर्जुमा सहित पढे और पढ़ कर समझे – आरिफ खान अखाण
रहमतों और बरकतों का महीना रमजान है कुरान को तर्जुमा सहित पढे और पढ़ कर समझे - आरिफ खान अखाण
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय पर सामाजिक कार्यकर्ता आरिफ खान अखाण (एन आर आई)ने माहे रमजान की मुबारकबाद पेश की और कहा कि रमजान रहमतों और बरकतों का महीना है। रमज़ान के रोज़े रखना मुसलमानों पर फ़र्ज़ है। रोज़ेदारों के लिए जन्नत में दाख़िल होने का एक ख़ास दरवाज़ा है, जिसका नाम बाब-ए-रैयान है। इसी महीने में अल्लाह ने क़ुरआन मजीद इंसानों की हिदायत के लिए नाज़िल की। यह इतनी सरल भाषा में उपलब्ध है कि आज हर एक ज़ुबान में इसका तर्जुमा आसानी से किताबों और इस्लामिक ऐप के ज़रिये मिल जाता है। इस किताब को समझने के लिए किसी मौलवी, मुफ़्ती या आलिम की ज़रूरत नहीं है। कोई भी व्यक्ति इसे समझकर और सुनकर हिदायत हासिल कर सकता है।
ईमान में दाख़िल होने का मतलब ही बदलाव है। जातिवाद, भाषावाद और क्षेत्रवाद – सब समाप्त हो जाते हैं जब इंसान इसे सही तरह समझ लेता है।अफ़सोस की बात यह है कि बहुत से मुसलमानों ने इसे समझकर नहीं पढ़ा। यह किताब पूरी इंसानियत को हक़ीक़ी रास्ता दिखाने वाली है। यह साफ़ तौर पर बयान करती है कि इस दुनिया में इंसान को एक इम्तिहान (परीक्षा) के लिए भेजा गया है, जिसका नतीजा मौत के बाद मिलेगा। मुसलमानों को चाहिए कि इस रमज़ान में इस किताब को ज़रूर समझकर पढ़ें, ताकि उन्हें दुनिया और आख़िरत की सही समझ पैदा हो। इस महीने की आख़िरी दस रातों में एक रात लैलतुल क़द्र को तलाश करना है, जो हज़ार महीनों से बेहतर है।रमज़ान के महीने में जो अपनी मग़फ़िरत (माफी) न करवा सके, उसके लिए अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं।
अल्लाह हम सबको सही दीन समझने की तौफ़ीक़ नसीब फ़रमाए।इसी महीने में आख़िरी नबी हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अल्लाह ने क़ुरआन अता किया। इस महीने में सदक़ा ज़्यादा से ज़्यादा करना चाहिए। ग़रीबों, फ़क़ीरों और मिस्कीनों को ढूँढकर उन्हें उनका हक़ देना चाहिए। ज़कात हम अक्सर इसी महीने में निकालते हैं, तो हमें ज़कात के पैटर्न को भी बदलना चाहिए। सामूहिक ज़कात एक जगह इकट्ठी करके फिर सालभर उसे ज़रूरतमंदों तक पहुँचाते रहना चाहिए। इस्लाम का मतलब ही परिवर्तन है। अपने बाप-दादाओं के रीति-रिवाजों को छोड़कर रोल मॉडल हज़रत मोहम्मद साहब ने बता दिया कि ज़िंदगी कैसे जीनी है। उन्होंने करके दिखाया, चाहे वह सामाजिक व्यवस्था हो, सियासत हो या तौहीद।
यह उम्मत क़िस्मत वाली है कि अल्लाह ने इन्हें रोल मॉडल के रूप में हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा, लेकिन इस उम्मत की बदनसीबी यह है कि इसने अपने रोल मॉडल की ज़िंदगी को नहीं पढ़ा। अगला रमज़ान हमें नसीब हो या न हो, आज से ही क़ुरआन का तर्जुमा और नबी की ज़िंदगी पढ़कर अपनी ज़िंदगी को बदलें।
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