माहे रमजान के पहले जुम्मे पर मस्जिदों में रही रौनक सभी ने रोजे रखें और जुम्मे की नमाज अदा की
जुम्मा सभी दिनों का सरदार कहलाता है और इस दिन में बहुत बरकतें होती हैं - मौलाना नसरुल्लाह अतारी
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय पर दावत-ए-इस्लामी मरकज फैजाने- इस्के -रसूल मस्जिद में इमाम मौलाना नसरुल्लाह अतारी ने जुम्मा की तकरीर में माहे रमजान की मुबारकबाद पेश करते हुए कहा माहे रमजान का चांद दिखने के साथ ही रोजेदारों ने रोजे रखे ।बाजार में भी रौनक बढ़ने लगी इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार साल का नौवां महीना रमजान का होता है इस मुकद्दद माहे रमजान को रहमत और बरकत, इबादत वाला महीना कहा जाता है इस्लाम में जुम्मा (शुक्रवार) को सभी दिनों का सरदार माना गया है, और जब यह पवित्र रमजान महीने में आता है, तो इसकी अहमियत और बरकत कई गुना बढ़ जाती है।
माहे रमजान में जुम्मे की मुख्य अहमियत है:सवाब की अधिकताः रमजान में हर नेक काम का सवाब (पुण्य) 70 गुना या उससे भी अधिक मिलता है। चूँकि जुम्मा पहले से ही एक मुकद्दस दिन है, इसलिए इस दिन की इबादत, नमाज़ और दान-पुण्य का फल अत्यधिक बढ़ जाता है। गुनाहों की माफीः हदीस के अनुसार, एक जुम्मे से दूसरे जुम्मे तक के बीच के छोटे गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। रमजान के जुम्मे में सच्चे दिल से की गई तौबा और इबादत अल्लाह की रहमत और मगफिरत (क्षमा) का जरिया बनती है।

दुआओं की कबूलियतः जुम्मे के दिन एक ऐसी घड़ी (वक्त) आती है जिसमें मांगी गई हर जायज दुआ कबूल होती है। रमजान के रोजे के साथ इस खास वक्त में दुआ करना बेहद फजीलत वाला माना जाता है। सामुदायिक एकताः जुम्मे की नमाज़ के लिए मुसलमान बड़ी संख्या में मस्जिदों में जमा होते हैं, जिससे आपसी भाईचारा, एकता और सहानुभूति की भावना मजबूत होती है।
जुमातुल विदा (अलविदा जुम्मा): रमजान के आखिरी जुम्मे को ‘अलविदा जुम्मा’ कहा जाता है। यह दिन रमजान के जाने का अहसास कराता है और मुसलमान इस दिन विशेष प्रार्थनाएँ करते हैं ताकि वे इस पाक महीने की बरकतों को समेट सकें। जुम्मे के दिन के कुछ विशेष कार्यःहोते है। गुस्ल (स्नान) करना और साफ-सुथरे कपड़े पहनना। सूरह कहफ की तिलावत करना। नबी करीम (स.अ.व.) पर अधिक से अधिक दरूद शरीफ भेजना।गरीबों और जरूरतमंदों की मदद (सदका) करना।
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