करीब जो रहना हो, तो मुनासिब फासला रखना
परिवार, समय प्रबंधन और नीयत की ताकत पर विचार
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय से शौकत अली खान झारिया, रिटायर्ड एडिशनल कमिश्नर (सेल टैक्स) ने पारिवारिक रिश्तों और जीवन की व्यावहारिक समझ पर आधारित एक प्रेरक विचार साझा करते हुए कहा कि जब दो व्यक्ति या दो परिवार एक-दूसरे के करीब आते हैं, तो शुरुआत में केवल अच्छाइयां नजर आती हैं। समय के साथ कुछ खामियां दिखने लगती हैं और फिर वही खामियां रिश्तों में दूरी का कारण बन जाती हैं। ऐसे में रिश्तों को बचाने के लिए “मुनासिब फासला” और संतुलन बेहद जरूरी है।
उन्होंने बताया कि इस संतुलन को बनाए रखने का सबसे सरल तरीका है दिन की शुरुआत ईश्वर की याद और अनुशासित दिनचर्या से करना। सुबह फजर की नमाज अदा कर दिनचर्या शुरू की जाए और सबसे पहले परिवार को समय दिया जाए। स्कूल जाने वाले बच्चों को समय पर तैयार करना, पति के ड्यूटी पर जाने से पहले उन्हें अच्छे मूड में सहयोग देना-यह सब परिवार की नींव को मजबूत करता है।
उन्होंने कहा कि जब बच्चे स्कूल और पति ड्यूटी पर चले जाएं, तो घर की साफ-सफाई, कपड़े धोने और भोजन की तैयारी में व्यस्त रहना चाहिए। इससे न केवल समय का सदुपयोग होता है, बल्कि फालतू बातचीत और चुगली जैसी बुराइयों से भी बचाव होता है। परिवार को ईमानदारी से समय देने के बाद जो समय बचे, उसे आत्मिक सुधार और ईश्वर को राजी करने में लगाना चाहिए।
एक मां की दुआ ने बदली तक़दीर
इस विचार को मजबूती देने के लिए शौकत अली खान झारिया ने एक सच्ची घटना साझा की। उन्होंने बताया कि करीब 20 साल पहले उनकी एक दूर की बहन खातून ने उनसे कहा था कि वह पढ़ी-लिखी नहीं हैं, इसलिए बच्चों को पढ़ा नहीं सकतीं, लेकिन सुबह उन्हें तैयार करना, नाश्ता देना, कपड़े धोना, प्रेस करना और समय पर स्कूल भेजना ही उनकी जिम्मेदारी है। इसके साथ ही वह रोज सजदे में जाकर अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की दुआ करती थीं।
आज उसी मां की दुआ का असर है कि उनका एक बेटा डॉक्टर है, एक बेटी एक्साइज इंस्पेक्टर, दूसरी जज और सबसे बड़ा बेटा एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है। खातून आज भी विनम्रता से कहती हैं कि मेहनत उनके पति चौधरी सुलेमान खान (सुजानगढ़) और अल्लाह के करम की थी, उन्होंने तो केवल मां होने का फर्ज निभाया।
घर की ड्यूटी भी इबादत
शौकत अली खान झारिया ने कहा कि काश हर मां अपने घरेलू दायित्वों को इबादत की तरह निभाए। यदि महिलाएं स्वयं नौकरीपेशा हैं, तो परिवार का भी यह फर्ज बनता है कि घरेलू जिम्मेदारियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करे, ताकि संतुलन बना रहे।
उन्होंने इस सच्ची और प्रेरणादायक घटना को समाज के हित में साझा करने की अपील करते हुए कहा कि यदि यह कहानी किसी को प्रेरित करे, तो इसे अपने घरों में जरूर साझा करें, खासकर विदेशों में रहने वाले परिवारों के बीच।
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