विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) Equity Rules 2026: यह हंगामा क्यों है बरपा?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) Equity Rules 2026: यह हंगामा क्यों है बरपा?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) Equity Rules 2026: अगर आप कॉलेज में पढ़ते हैं या आपके घर में कोई हायर एजुकेशन ले रहा है, तो पिछले कुछ दिनों से आपने UGC Equity Regulations 2026 का नाम जरूर सुना होगा. सोशल मीडिया से लेकर चाय की टपरी तक, हर जगह बस इसी बात की चर्चा है कि आखिर UGC ने ऐसा क्या नियम बना दिया जिससे इतना हंगामा खड़ा हो गया है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं आखिर क्या है पूरा मामला…
दअरसल Equity Rules 2026: उच्च शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए इक्विटी नियम अब देशभर में बहस और टकराव की वजह बनते जा रहे हैं। 13 जनवरी से लागू ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026’ को जहां शैक्षणिक सुधार की दिशा में अहम कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जनरल कैटेगरी के छात्रों के बीच इसे लेकर गहरी नाराजगी उभरकर सामने आ रही है। छात्रों का एक वर्ग आशंका जता रहा है कि यह नियम कहीं योग्यता, अवसर और निष्पक्षता के सिद्धांतों को प्रभावित न कर दे।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की ओर से उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026’ को लागू किया गया है। यह रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू हो गया है। देश की अगड़ी जातियों के लोग इस रेगुलेशन का विरोध कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में भी इस रेगुलेशन को लागू किया गया है। इसे अब तक शैक्षणिक रूप से महत्वपूर्ण कदम के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह कानून युवाओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करेगा आईए जानते और समझते हैं आखिर क्या है यह UGC Act 2026 और आखिर क्यों हो रहा है इसका विरोध।
UGC Act क्या है नया कानून?:
दरअसल, यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने 15 जनवरी 2026 से पूरे देश में नए नियम लागू किए हैं इनका सीधा सा मकसद है कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में भेदभाव (Discrimination) को खत्म करना UGC चाहता है कि किसी भी छात्र के साथ उसकी जाति, जेंडर या बैकग्राउंड की वजह से बुरा बर्ताव न हो।
ये नए नियम 2012 के पुराने नियमों की जगह लेंगे UGC का कहना है कि पुराने कायदे अब आउटडेटेड हो गए थे, इसलिए उन्हें और ज्यादा सख्त और साफ बनाया गया है ताकि हर छात्र को बराबर का सम्मान मिल सके।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू कर दिए हैं। यह रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रभावी हो गया है। हालांकि, इसके लागू होते ही देश के विभिन्न हिस्सों में अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों और समूहों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। नए रेगुलेशन की सबसे अहम विशेषता यह है कि अब अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है। नए कानून के तहत अब उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकेंगे। अब तक जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों और प्रकोष्ठ मुख्य रूप से एससी-एसटी समुदाय तक सीमित थे। नए रेगुलेशन के बाद प्रत्येक संस्थान में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित करना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही यूनिवर्सिटी स्तर पर एक समानता समिति गठित की जाएगी। इसमें ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल करना जरूरी होगा। यह समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी और उसे यूजीसी को भेजना अनिवार्य होगा।
क्यों हो रहा है विरोध? :–
यूजीसी के रेगुलेशन के लागू होने के बाद सामाजिक न्याय की पक्षधर शक्तियों के बीच अगड़ी जातियों में असंतोष को लेकर सवाल उठ रहा है। विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि इस नियम का दुरुपयोग हो सकता है। इसके जरिए अगड़ी जातियों के छात्रों और शिक्षकों को झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर विरोध के लिए ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ का गठन किया है। इस रेगुलेशन के खिलाफ बड़े स्तर पर आंदोलन किया जा सके। सोशल मीडिया पर भी अगड़ी जातियों से जुड़े कई इंफ्लुएंसर, यूट्यूबर और कार्यकर्ता इसके विरोध में अभियान चला रहे हैं। इसके बाद बहस तेज हो गई है। अब सवर्ण जाति के लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। UGC के इन नियमों को लेकर बवाल इतना बढ़ता जा रहा है कि सवर्ण जातियों ने आंदोलन करने तक की धमकी दे डाली है। इतना ही नहीं, इन नियमों के विरोध में बरेली के एसडीएम अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया है। और तो और, बीजेपी में भी इसे लेकर विरोध बढ़ता जा रहा है। खबर है कि बीजेपी के भी कई सवर्ण नेता इस्तीफा दे रहे हैं। जब से ये नियम आए हैं, तब से ही सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक पर… इसे लेकर बहस हो रही है। सवर्णों की मांग है कि इन नियमों को वापस लिया जाए। जबकि, दूसरा पक्ष दलील दे रहा है कि जब आप जातिगत भेदभाव नहीं करते हैं तो डर क्यों रहे हैं?
दअरसल बवाल की दो बड़ी वजह है। सबसे बड़ी वजह इसका नियम 3(C) है। इसी नियम की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई है। नियम 3 (C) कहता है कि जाति आधारित भेदभाव अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के खिलाफ होने वाले जाति या जनजाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को माना जाएगा। यहीं से असली बवाल खड़ा होता है। आमतौर पर अब तक जनरल और ओबीसी को बराबर रखा जाता था। लेकिन अब ओबीसी को भी एससी और एसटी के साथ रखा गया है। दावा किया जा रहा है कि अब तक तो लड़ाई जनरल बनाम एससी-एसटी की होती थी लेकिन नए नियमों से जनरल बनाम एससी-एसटी और ओबीसी की लड़ाई शुरू हो गई है। और ओबीसी के शामिल होने पर बवाल क्यों? तो इसकी वजह ये है कि ओबीसी में मुस्लिम जातियों को भी शामिल किया जाता है। सोशल मीडिया पर कई लोग यही दावा कर रहे हैं कि ओबीसी में मुस्लिम जातियां शामिल हैं और अब वो जब चाहें तब किसी भी बात पर शिकायत कर सकते हैं। बहरहाल, UGC कह रही है कि इससे जातिगत भेदभाव रोकने में मदद मिलेगी। सवर्ण इसका विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उन्हें फंसाया जा सकता है।
सरकार क्या नियमों का वापस लेगी?
क्या सरकार इन नियमों को वापस ले सकती है या इनमें संशोधन कर सकती है। एक ईमेल अभियान के माध्यम से यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय से इन नियमों को वापस लेने का आग्रह किया जा रहा है। यूजीसी अध्यक्ष विनीत जोशी की ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इस बारे में किसी के साथ भेदभाव नहीं होने की बात कही है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नियम या कानून का दुरुपयोग रोकना जरूरी है। सरकार के पास नियमों में संशोधन या उन्हें वापस लेने का पूरा अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत स्वतंत्रता, समानता का अधिकार है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार का अगला कदम क्या होगा। – डॉ राकेश वशिष्ठ,वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादकीय लेखक
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