कॉकरोच मूवमेंट’: अपमान से स्वाभिमान तक की राजनीतिक दस्तक
कॉकरोच मूवमेंट': अपमान से स्वाभिमान तक की राजनीतिक दस्तक
दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर इतिहास का गवाह बना है। मानसून सत्र के पहले ही दिन राजधानी छावनी में तब्दील हो गई, बैरिकेड्स तन गए और लाठियां भांजी गईं। संसद की तरफ मार्च करते करीब एक लाख युवाओं के इस हुजूम को मीडिया का एक हिस्सा ‘कॉकरोच मूवमेंट’ कह रहा है। यह नाम किसी तारीफ से नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश की टिप्पणी से उपजे अपमान की कोख से निकला है, जिन्होंने कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं, सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और आरटीआई कार्यकर्ताओं के लिए इन शब्दों का इस्तेमाल किया था। युवाओं ने इस अपमान को ही अपनी ढाल बना लिया और इसे एक राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ल दे दी।
अगर कोई यह सोच रहा है कि यह आक्रोश महज एक अदद जुमले या तात्कालिक गुस्से का नतीजा है, तो वह कहानी का सिर्फ सतही हिस्सा देख रहा है। यह गुस्सा सिर्फ पेपर लीक की घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे पिछले एक दशक की वे नीतियां हैं, जिनके कारण देश में ‘स्थाई नौकरी’ नाम की व्यवस्था लगातार सिकुड़ती चली गई है। शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक का अनशन और उसके बाद छात्रों का यह स्वतःस्फूर्त मार्च देश के नीति-नियंताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
आंकड़ों का विरोधाभास और सच की तलाश
इस पूरे संकट को समझने के लिए हमें आंकड़ों के उस मकड़जाल को देखना होगा जो दो अलग-अलग तस्वीरें पेश करते हैं। एक तरफ सरकारी डेटा कहता है कि 15 से 29 वर्ष की उम्र के युवाओं में बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत है, जो शहरी इलाकों में 13 प्रतिशत को पार कर चुकी है। जुलाई 2022 में सरकार ने स्वयं संसद में स्वीकार किया था कि पिछले आठ वर्षों में सरकारी नौकरियों के लिए 22 करोड़ युवाओं ने आवेदन किया, जिनमें से मात्र 7 लाख को ही नौकरी मिल सकी। यानी सफलता की दर 0.3 प्रतिशत से भी कम रही।
इसके समानांतर, एक बड़े समाचार पत्र की पड़ताल बताती है कि राज्यों की परीक्षाओं में सिर्फ 1.04 लाख पदों के लिए हुए 41 पेपर लीक की घटनाओं ने डेढ़ करोड़ से ज्यादा छात्र-छात्राओं के भविष्य को अधर में लटका दिया। जिस मेरिट और पारदर्शिता के नाम पर परीक्षा प्रणालियां बनाई गई थीं, वे अब नियुक्तियों को टालने का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी हैं।
इसके विपरीत, सरकार का अपना पक्ष है। तत्कालीन श्रम मंत्री के अनुसार, मोदी सरकार के कार्यकाल में करीब 17.9 करोड़ रोजगार के नए अवसर सृजित हुए और बेरोजगारी दर में ऐतिहासिक गिरावट आई। लेकिन यहीं पर एक बड़ा तकनीकी पेंच आता है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। ‘रोजगार’ और ‘स्थाई व सम्मानजनक वेतन वाली नौकरी’ दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। आलोचकों और अर्थशास्त्रियों का डेटा रोजगार की संख्या पर नहीं, बल्कि उसकी ‘गुणवत्ता’ पर सवाल उठाता है।
नीतियों का बदला ढांचा: कॉन्ट्रैक्ट और कर्ज का मॉडल
रोजगार की गुणवत्ता में आई इस गिरावट को दो बड़े उदाहरणों से समझा जा सकता है। पहला उदाहरण रक्षा क्षेत्र की ‘अग्निपथ योजना’ है। सरकार का तर्क है कि इससे सेना युवा और तकनीकी रूप से सक्षम होगी। रक्षा विशेषज्ञों का एक तबका भी मानता है कि बढ़ता हुआ पेंशन बिल सेना के आधुनिकीकरण (हथियार और रिसर्च) के आड़े आ रहा था, इसलिए पर्सनल कॉस्ट घटाना अनिवार्य था। यह तर्क व्यावहारिक हो सकता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि 4 साल के कॉन्ट्रैक्ट पर आने वाले 75 प्रतिशत अग्निवीरों को कोई सामाजिक या वित्तीय सुरक्षा (पेंशन) नहीं मिलेगी। यही कॉन्ट्रैक्ट मॉडल अब बीएसएनएल, रेलवे और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में ‘थर्ड पार्टी वेंडर्स’ के जरिए धड़ल्ले से लागू किया जा रहा है।
दूसरा उदाहरण उच्च शिक्षा का है। 2017 में गठित ‘हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी’ का काम केंद्रीय विश्वविद्यालयों को इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सीधे ग्रांट (अनुदान) देने के बजाय लोन (कर्ज) देना है। नीतिगत तर्क यह था कि इससे संस्थान जवाबदेह बनेंगे, लेकिन इसका सीधा और क्रूर असर यह हुआ कि कर्ज चुकाने के लिए विश्वविद्यालयों ने भारी फीस वृद्धि की, जिसका बोझ अंततः आम छात्र की जेब पर पड़ा।
नतीजा यह है कि आज का युवा एक दोहरे चक्रव्यूह में फंसा है एक तरफ पढ़ाई महंगी हो रही है और दूसरी तरफ भविष्य की नौकरियां बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के अस्थाई बनाई जा रही हैं।
इतिहास का आईना और 60 साल पुराना पैटर्न
आज की परिस्थितियों की तुलना अगर हम इतिहास से करें, तो एक दिलचस्प पैटर्न उभरता है। ठीक 60 साल पहले, 7 नवंबर 1966 को इंदिरा गांधी सरकार के दौरान लगभग सवा लाख लोगों की भीड़ ने गौ-हत्या पर प्रतिबंध की मांग को लेकर संसद को घेरा था। उस आंदोलन की अगुवाई तत्कालीन जनसंघ, आरएसएस और आर्य समाज जैसे संगठन कर रहे थे। उस हिंसक प्रदर्शन के बाद तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा को इस्तीफा देना पड़ा था और अगले ही साल 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था।
बेशक, 1966 का मुद्दा धार्मिक था और 2026 का यह आंदोलन विशुद्ध रूप से आर्थिक और प्रशासनिक है। दोनों की प्रकृति अलग है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी दिल्ली की सड़कों पर जन-आक्रोश का ऐसा सैलाब उमड़ा है, उसका सीधा राजनीतिक असर अगले चुनावों पर पड़ा है। सड़कों से उठी आवाजें संसद की दीवारों को लांघकर अंदर पहुंचे बिना नहीं रुकतीं।
ताकत और बैरिकेड्स की दूरी
11 जून 2026 को नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत के 70 करोड़ युवा देश की सबसे बड़ी ताकत हैं और इस ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ को ‘डेवलपमेंट डिविडेंड’ में बदलना होगा। लेकिन इसके ठीक 39 दिन बाद, 20 जुलाई को वही ‘ताकत’ जब अपनी जायज मांगों को लेकर सड़क पर उतरी, तो उसे पुलिस के बैरिकेड्स और लाठियों का सामना करना पड़ा।
यह आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा प्रणाली या पेपर लीक के खिलाफ नहीं है; यह उस व्यवस्था के खिलाफ युवाओं का एक सामूहिक घोषणापत्र है जो स्थाई नौकरी को कॉन्ट्रैक्ट में, ग्रांट को लोन में और सामाजिक सुरक्षा को बजटीय घाटे के नाम पर खत्म कर रही है। सत्ता में बैठे लोगों को तय करना होगा कि वे इतिहास से सबक सीखेंगे या हर साठ साल में देश के युवाओं को सड़क पर आकर यह सबक दोहराना पड़ेगा। यह सुलगता हुआ आक्रोश मौजूदा हुक्मरानों के लिए निश्चित रूप से एक गंभीर खतरे की घंटी है।
देश
विदेश
प्रदेश
संपादकीय
वीडियो
आर्टिकल
व्यंजन
स्वास्थ्य
बॉलीवुड
G.K
खेल
बिजनेस
गैजेट्स
पर्यटन
राजनीति
मौसम
ऑटो-वर्ल्ड
करियर/शिक्षा
लाइफस्टाइल
धर्म/ज्योतिष
सरकारी योजना
फेक न्यूज एक्सपोज़
मनोरंजन
क्राइम
चुनाव
ट्रेंडिंग
Covid-19







Total views : 2269228


