सरदारशहर में चंग धमाल परंपरा का समापन:बसंत पंचमी से शुरू हुआ फागोत्सव गणगौर तक चला
सरदारशहर में चंग धमाल परंपरा का समापन:बसंत पंचमी से शुरू हुआ फागोत्सव गणगौर तक चला
सरदारशहर : सरदारशहर में बसंत पंचमी से शुरू हुआ फागोत्सव गणगौर पर्व की रात्रि को संपन्न हो गया। तहसील क्षेत्र में हर वर्ष की तरह इस बार भी बसंत पंचमी के दिन से चंग की थाप पर धमाल गाने की परंपरा शुरू हुई थी। परंपरा के अनुसार, बसंत पंचमी से होलिका दहन तक प्रतिदिन चंग बजाए जाते हैं और धमाल गाए जाते हैं। धुलण्डी के दिन चंग बजाने का सिलसिला रुक जाता है, लेकिन गणगौर की रात्रि को एक बार फिर चंग बजाकर धमाल गाए जाते हैं।
बीरबल सैनी ने बताया कि राजस्थान में एक कहावत है, “तीज त्यौहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर।” इसका अर्थ है कि राजस्थान में त्यौहार आखा तीज से शुरू होते हैं और गणगौर के बाद आखा तीज तक कोई बड़ा त्यौहार नहीं मनाया जाता। गणगौर के दिन देर रात तक चंग की थाप पर धमाल गाए जाते हैं और पुरुष इस पर्व का जमकर लुत्फ उठाते हैं।

इसी कड़ी में सोमवार रात सरदारशहर में जगह-जगह चंग की थाप पर धमाल गाते हुए रसिये दिखाई दिए, जो मंगलवार अलसुबह तक जारी रहा। सरदारशहर के वार्ड 18 में न्यू पान पैलेस चंग मंडली ने भी गणगौर पर्व के साथ ही चंग बजाने की परंपरा का समापन किया।
बीरबल सैनी ने आगे बताया कि राजस्थान में आमतौर पर होलिका दहन तक चंग बजाए जाते हैं, लेकिन सरदारशहर में वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार गणगौर की रात्रि को चंग बजाने की परंपरा आज भी निभाई जाती है। उन्होंने कहा कि सभी गणगौर के दिन का बड़े उत्साह के साथ इंतजार करते हैं और गणगौर की रात्रि को सुबह तक चंग बजाकर धमाल गाते हैं।
इस अवसर पर माणकचंद सैनी, महावीर प्रसाद गढ़वाल, सुरेंद्र कुमार पापटान, लालचंद जांगिड़, प्रकाश सोनी और पाबुसिंह सहित कई लोग उपस्थित रहे।
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