[pj-news-ticker post_cat="breaking-news"]

आंगनबाड़ी स्क्रीनिंग में 553 बच्चे अति-कुपोषित पाए गए:खेतड़ी और उदयपुरवाटी में सबसे ज्यादा, ‘ट्रैकर सिस्टम’ से मिला डेटा


निष्पक्ष निर्भीक निरंतर
  • Download App from
  • google-playstore
  • apple-playstore
  • jm-qr-code
X
झुंझुनूंटॉप न्यूज़राजस्थानराज्य

आंगनबाड़ी स्क्रीनिंग में 553 बच्चे अति-कुपोषित पाए गए:खेतड़ी और उदयपुरवाटी में सबसे ज्यादा, ‘ट्रैकर सिस्टम’ से मिला डेटा

आंगनबाड़ी स्क्रीनिंग में 553 बच्चे अति-कुपोषित पाए गए:खेतड़ी और उदयपुरवाटी में सबसे ज्यादा, 'ट्रैकर सिस्टम' से मिला डेटा

झुंझुनूं : महिला एवं बाल विकास विभाग की नवीनतम रिपोर्ट ने एक बार फिर बच्चों की पोषण स्थिति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। सितंबर 2025 की स्क्रीनिंग रिपोर्ट के अनुसार जिले के 1,630 आंगनबाड़ी केंद्रों में पंजीकृत 66 हजार 729 बच्चों में से 553 बच्चे अति-कुपोषित (Severely Acute Malnourished) और 2,092 बच्चे कुपोषित (Moderately Malnourished) पाए गए हैं।

हालांकि, विभाग का कहना है कि अगस्त की रिपोर्ट की तुलना में स्थिति में कुछ सुधार हुआ है- उस समय अति-कुपोषित बच्चों की संख्या 602 और कुपोषित बच्चों की 2,137 थी। यानी सितंबर में 45 बच्चों की संख्या कम हुई है। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे छिपा यथार्थ यह है कि हजारों परिवार अब भी अपने बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं दे पा रहे हैं, और यह समस्या केवल आहार की नहीं, बल्कि जागरूकता, गरीबी और मातृ-स्वास्थ्य से जुड़ी जटिल कड़ी का परिणाम है।

आंगनबाड़ी स्क्रीनिंग में 553 बच्चे अति-कुपोषित पाए गए
आंगनबाड़ी स्क्रीनिंग में 553 बच्चे अति-कुपोषित पाए गए

खेतड़ी और उदयपुरवाटी में सबसे ज्यादा अति-कुपोषित बच्चे

जिले की ब्लॉकवार रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि कुपोषण की समस्या हर इलाके में है, पर कुछ ब्लॉकों में हालात और भी खराब हैं। सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार खेतड़ी ब्लॉक में सबसे अधिक 165 बच्चे अति-कुपोषित पाए गए हैं। इसके बाद बुहाना में 64, उदयपुरवाटी में 63, नवलगढ़ में 51, मंडावा व सिंघाना में 43-43, चिड़ावा में 30, अलसीसर में 27, पिलानी में 25, सूरजगढ़ में 22, और झुंझुनूं शहर में 20 बच्चे अति-कुपोषण की श्रेणी में हैं।

कुपोषित बच्चों की संख्या के लिहाज से उदयपुरवाटी ब्लॉक सबसे आगे है। यहां 521 बच्चे कुपोषित हैं। इसके बाद खेतड़ी में 390, नवलगढ़ में 258, चिड़ावा में 203, अलसीसर में 175, सिंघाना में 125, बुहाना में 119, मंडावा में 96, झुंझुनूं में 94, पिलानी में 56 और सूरजगढ़ में 55 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं।

ट्रैकर सिस्टम से मिली हर बच्चे की जानकारी

महिला एवं बाल विकास विभाग ने अगस्त से डिजिटल “ट्रैकर सिस्टम” लागू किया है, जिसके जरिए जिले के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर आने वाले बच्चों का वजन, लंबाई और स्वास्थ्य जांच की जाती है। यह डेटा ऑनलाइन सर्वर पर अपलोड किया जाता है, जिससे विभाग को हर महीने की रिपोर्ट स्वतः मिल जाती है।

खेतड़ी और उदयपुरवाटी में सबसे ज्यादा अति-कुपोषित बच्चे, 'ट्रैकर सिस्टम' से मिला डाटा
खेतड़ी और उदयपुरवाटी में सबसे ज्यादा अति-कुपोषित बच्चे, ‘ट्रैकर सिस्टम’ से मिला डाटा

जिले के 1,630 आंगनबाड़ी केंद्रों से एकत्रित आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई सितंबर रिपोर्ट बताती है कि पोषण सुधार की सरकारी कोशिशों के बावजूद लगभग 2,600 से अधिक बच्चे अभी भी जोखिम क्षेत्र में हैं।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बच्चों का वजन और ऊंचाई नापकर उन्हें चार श्रेणियों में वर्गीकृत करती हैं — सामान्य, मध्यम कुपोषित (MAM), अति-कुपोषित (SAM) और विशेष निगरानी श्रेणी। जिन बच्चों का वजन उम्र के अनुपात में बेहद कम पाया जाता है, उन्हें ‘अति-कुपोषित’ घोषित किया जाता है।

जागरूकता और पोषक आहार से मिला सुधार

महिला एवं बाल विकास विभाग के उप निदेशक विजेंद्र राठौड़ ने बताया कि लगातार प्रयासों से कुपोषण दर में गिरावट आई है। उन्होंने कहा, अगस्त में अति-कुपोषित बच्चों की संख्या 602 थी, जो सितंबर में घटकर 553 हो गई है। यह संकेत है कि विभागीय गतिविधियां और माताओं के बीच चलाए गए जागरूकता कार्यक्रम असर दिखा रहे हैं।”

उन्होंने बताया कि विभाग ने ‘पोषण सप्ताह’, ब्लॉक स्तरीय शिविरों और घर-घर संपर्क अभियानों के जरिए माताओं को बच्चों के आहार, स्तनपान और स्वच्छता के महत्व के बारे में समझाया। आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषक आहार वितरण और हेल्थ चेकअप शिविर नियमित रूप से कराए जा रहे हैं।

साथ ही, हर ब्लॉक में महिला पर्यवेक्षकों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे केंद्रों पर पोषक सामग्री की उपलब्धता और वितरण का निरीक्षण करें।

जागरूकता की कमी और मातृ-स्वास्थ्य सबसे बड़ी चुनौती

कुपोषण के पीछे केवल गरीबी ही नहीं, बल्कि मातृ-स्वास्थ्य की अनदेखी भी एक बड़ा कारण है। कई ग्रामीण इलाकों में गर्भवती महिलाएं नियमित जांच नहीं करवातीं, आयरन या फोलिक एसिड की गोलियां नहीं लेतीं, जिससे जन्म से पहले ही बच्चे कमजोर हो जाते हैं।

आंगनबाडियों पर हुई जांच के बाद आया सामने
आंगनबाडियों पर हुई जांच के बाद आया सामने

डॉ. राठौड़ के अनुसार, “अधिकांश माताएं यह नहीं जानतीं कि गर्भावस्था के दौरान पौष्टिक आहार, दवा और आराम बच्चे के स्वास्थ्य से सीधा जुड़ा होता है। जन्म के बाद शुरुआती छह महीने तक केवल स्तनपान कराने की सलाह दी जाती है, लेकिन कई परिवारों में दूध की कमी या अज्ञानता के चलते यह पालन नहीं किया जाता।”

हर महीने बनती है ब्लॉकवार रिपोर्ट, एनआरसी में इलाज

आंगनबाड़ी केंद्रों से मिलने वाले डेटा के आधार पर हर महीने विभाग ब्लॉकवार रिपोर्ट तैयार करता है। जिन बच्चों को ‘अति-कुपोषित’ श्रेणी में पाया जाता है, उन्हें विशेष निगरानी में रखा जाता है। ऐसे बच्चे या तो घर पर अतिरिक्त पोषक आहार पाकर सुधरते हैं या गंभीर स्थिति में उन्हें एनआरसी (Nutrition Rehabilitation Centre) भेजा जाता है, जहां चिकित्सकों की निगरानी में उनका वजन बढ़ाने की प्रक्रिया चलाई जाती है।

“कुपोषण की जड़ें गर्भ में ही शुरू हो जाती हैं”

बीडीके अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र भांभू कहते हैं कि कुपोषण की रोकथाम बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू होनी चाहिए।

गर्भावस्था में मां नियमित चैकअप करवाए, आयरन व कैल्शियम की दवा ले, संतुलित आहार खाए — तो बच्चे के स्वस्थ जन्म की संभावना बढ़ जाती है। कई मामलों में मां की कमजोरी या एनीमिया के कारण बच्चा जन्म से ही कम वजन का होता है। यही आगे चलकर कुपोषण का कारण बनता है।”

वे बताते हैं कि बच्चे के जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल स्तनपान और उसके बाद ठोस पौष्टिक आहार जरूरी है। दूध, दाल, हरी सब्जियां, फल और अनाज का संतुलित सेवन बच्चे को पर्याप्त ऊर्जा देता है।

Related Articles