डिजिटल तबाही का खौफनाक सच : फतेहपुर की रातों में बढ़ता ऑनलाइन गेमिंग का जाल, मोबाइल स्क्रीन में सिमटता युवाओं का भविष्य
आधी रात तक सड़कों और गलियों में मोबाइल पर व्यस्त दिखे किशोर-युवा, अभिभावकों की निगरानी और पुलिस गश्त पर उठे सवाल
जनमानस शेखावाटी संवाददाता : आबिद खान दाड़ून्दा
फतेहपुर : कभी जिन मोहल्लों की गलियों में बच्चों की हंसी, पढ़ाई और भविष्य के सपनों की चर्चा सुनाई देती थी, उन्हीं गलियों में अब देर रात तक मोबाइल स्क्रीन पर ऑनलाइन गेम खेलते किशोर और युवा नजर आ रहे हैं। जनमानस शेखावाटी की टीम ने फतेहपुर के विभिन्न इलाकों में देर रात पड़ताल की, जहां कई स्थानों पर किशोर और युवा मोबाइल फोन पर ऑनलाइन गेमिंग में व्यस्त दिखाई दिए।
सड़कों के किनारे खड़ी बाइकों पर बैठे युवक घंटों मोबाइल स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहे। कई जगह समूह में बैठे युवा गेम खेलते दिखाई दिए। देर रात तक चलने वाली इस गतिविधि ने अभिभावकों की निगरानी, युवाओं की दिनचर्या और पुलिस की रात्रि गश्त को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
विदेश में पिता, घर पर मोबाइल की दुनिया
फतेहपुर के कई परिवारों में रोजगार के लिए पिता विदेशों में रहते हैं। ऐसे परिवारों में बच्चों की देखभाल और निगरानी की जिम्मेदारी मुख्य रूप से घर पर मौजूद अभिभावकों पर होती है। पड़ताल के दौरान सामने आए कुछ मामलों में विदेश में रह रहे पिता बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को लेकर चिंतित नजर आए, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि बच्चे देर रात तक मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग में कितना समय बिता रहे हैं। हालांकि, यह कहना कि ऐसे युवाओं में 80 प्रतिशत से अधिक के पिता विदेश में हैं, व्यापक आंकड़ों के बिना प्रमाणित नहीं किया जा सकता। यह स्थिति फतेहपुर में आगे विस्तृत सर्वे और आंकड़ों के जरिए जांच का विषय हो सकती है।

गेमिंग का बढ़ता समय चिंता का विषय
ऑनलाइन गेमिंग मनोरंजन का एक माध्यम हो सकता है, लेकिन जब यह पढ़ाई, नींद, शारीरिक गतिविधियों और सामाजिक जीवन को प्रभावित करने लगे तो स्थिति चिंता का विषय बन जाती है। देर रात तक मोबाइल स्क्रीन पर समय बिताने से नींद प्रभावित होने, शारीरिक गतिविधि कम होने और पढ़ाई पर असर पड़ने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों और किशोरों के स्क्रीन समय पर अभिभावकों की निगरानी जरूरी है। खासकर रात के समय मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर घर में स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए।
अभिभावकों की भूमिका सबसे अहम
बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बच्चों को डांटने या पूरी तरह मोबाइल छीनने के बजाय अभिभावकों को उनके साथ संवाद स्थापित कर गेमिंग की आदत, ऑनलाइन गतिविधियों और उनके दोस्तों के बारे में समझना चाहिए। विदेश में काम कर रहे माता-पिता के लिए यह चुनौती और बड़ी हो सकती है। ऐसे में नियमित वीडियो कॉल के साथ बच्चों की पढ़ाई, दिनचर्या और संगति पर भी ध्यान देना जरूरी है।
रात की गश्त को लेकर उठे सवाल
पड़ताल के दौरान देर रात तक सार्वजनिक स्थानों और गलियों में युवाओं के जमावड़े ने पुलिस की रात्रि गश्त को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय स्तर पर पुलिस को ऐसे स्थानों पर नियमित गश्त बढ़ाने के साथ नाबालिगों के देर रात अनावश्यक रूप से घूमने और यातायात नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई करनी चाहिए। खासकर नाबालिगों के वाहन चलाने के मामलों में अभिभावकों को भी जागरूक करने की जरूरत है। पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई का उद्देश्य केवल युवाओं को रोकना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित माहौल और सही दिशा देना भी होना चाहिए।

गेमिंग के साथ सट्टेबाजी का पहलू हो तो मामला और गंभीर
ऑनलाइन गेमिंग और ऑनलाइन सट्टेबाजी को एक ही चीज मानना उचित नहीं है। लेकिन यदि किसी स्थान पर गेमिंग की आड़ में पैसे के लेन-देन, सट्टेबाजी या अवैध ऑनलाइन गतिविधियों की पुष्टि होती है तो यह गंभीर मामला है और इसकी जांच पुलिस तथा साइबर विशेषज्ञों द्वारा की जानी चाहिए। ऐसे मामलों में केवल अनुमान या अफवाह के आधार पर किसी व्यक्ति अथवा प्रतिष्ठान को दोषी ठहराने के बजाय पुलिस जांच और प्रमाण के आधार पर कार्रवाई जरूरी है।
फतेहपुर के सामने बड़ा सवाल
मुद्दा सिर्फ मोबाइल गेम का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हमारे बच्चे अपने खाली समय का कितना हिस्सा स्क्रीन पर बिता रहे हैं? क्या अभिभावकों को उनकी ऑनलाइन दुनिया की जानकारी है? क्या देर रात तक सड़कों पर रहने वाले किशोरों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है? और क्या पुलिस की रात्रि गश्त उन स्थानों तक पहुंच रही है जहां किशोरों के समूह देर रात तक जमा रहते हैं? फतेहपुर में यह विषय केवल पुलिस कार्रवाई से हल होने वाला नहीं है। इसके लिए परिवार, स्कूल, समाज, प्रशासन और पुलिस-सभी को मिलकर काम करना होगा।
जनमानस शेखावाटी की अपील
विदेश में रहकर परिवार के लिए मेहनत कर रहे माता-पिता हों या घर पर बच्चों की देखभाल कर रहे अभिभावक—बच्चों के साथ संवाद बनाए रखना जरूरी है। मोबाइल और इंटरनेट को पूरी तरह दुश्मन मानने के बजाय उसके सुरक्षित और सीमित इस्तेमाल की आदत विकसित करनी होगी। समय रहते बच्चों की दिनचर्या, संगति और ऑनलाइन गतिविधियों पर ध्यान दिया गया तो मोबाइल उनकी कमजोरी नहीं, उनके ज्ञान और भविष्य का साधन बन सकता है।
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