झाझड़ के मोहिनी सती दादी मंदिर में दो दिवसीय मेला:गांव के मुख्य चौक में 1972 में ग्रामीणों के सहयोग से बना था मंदिर, सफेदा की बीमारी ठीक होने की मान्यता
झाझड़ के मोहिनी सती दादी मंदिर में दो दिवसीय मेला:गांव के मुख्य चौक में 1972 में ग्रामीणों के सहयोग से बना था मंदिर, सफेदा की बीमारी ठीक होने की मान्यता
नवलगढ़ : नवलगढ़ के झाझड़ स्थित श्री मोहिनी सती दादी मंदिर में दो दिवसीय मेले का शुभारंभ हो गया है। गांव के मुख्य चौक में आयोजित होने वाला यह मेला पिछले 54 वर्षों से ग्रामीणों के सहयोग से लगातार आयोजित किया जा रहा है। मेले को लेकर ग्रामीणों और श्रद्धालुओं में उत्साह का माहौल है।
1972 में ग्रामीणों के सहयोग से बना मंदिर
मंदिर कमेटी के व्यवस्थापक जगदीश जोशी ने बताया कि श्री मोहिनी सती दादी मंदिर का निर्माण वर्ष 1972 में पूरे गांव के सहयोग से कराया गया था। इसके बाद से ही मंदिर में धार्मिक आयोजन और वार्षिक मेले की परंपरा निरंतर चली आ रही है।
गांव में चोरी की घटनाओं से जुड़ी है मान्यता
मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार पुराने समय में जब गांव में चोरी की घटनाएं होती थीं, तब मां मोहिनी सती दादी आवाज देकर ग्रामीणों को जागृत करती थीं। ग्रामीण इस घटना को माता की कृपा और गांव की रक्षा से जोड़कर देखते हैं।
बाढ़ के पानी के मंदिर तक पहुंचने की मान्यता
ग्रामीणों के अनुसार करीब 50 वर्ष पहले झाझड़ गांव में लोहार्गल की ओर से नदी का पानी पहुंच गया था। इस दौरान पानी मोहिनी सती दादी मंदिर में स्थापित प्रतिमा तक पहुंच गया। इस घटना को भी ग्रामीण माता की शक्ति और आस्था से जोड़कर देखते हैं।
सफेदा की बीमारी ठीक होने की भी मान्यता
एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार सूरजगढ़ के सेठ रामावतार सौंथलिया की पत्नी सफेदा यानी कोढ़ की बीमारी से पीड़ित थीं। बताया जाता है कि उन्हें सपने में मोहिनी सती दादी के दर्शन हुए और माता ने उन्हें झाझड़ आने का संदेश दिया।
इसके बाद सेठ रामावतार सौंथलिया के परिवार ने माता से बीमारी ठीक होने की प्रार्थना की। बीमारी ठीक होने के बाद परिवार झाझड़ पहुंचा और मंदिर में माता के दर्शन कर पूजा-अर्चना की। ग्रामीण इस घटना को भी मंदिर की आस्था से जोड़कर बताते हैं।
जमीन सौदे में लाभ की कहानी भी जुड़ी
झाझड़ निवासी स्वर्गीय सुरेश परसरामपुरिया, जो कोलकाता में रहते थे, के परिवार से जुड़ी एक और घटना भी मंदिर की मान्यताओं में शामिल है। परिवार के अनुसार करीब 40 वर्ष पहले जमीन के एक सौदे में उनकी पूरी पूंजी लग गई थी, लेकिन सौदा लंबे समय तक पूरा नहीं हो पा रहा था।
इस संबंध में उन्होंने कोलकाता निवासी सुंडाराम परसरामपुरिया से चर्चा की। उन्होंने माता पर विश्वास रखते हुए सौदे में माता को याद करने की बात कही। परिवार के अनुसार इसके बाद माता को याद किया गया और तीन दिन बाद जमीन का सौदा मुनाफे में पूरा हो गया। सुरेश परसरामपुरिया बाद में लंबे समय तक मंदिर कमेटी के अध्यक्ष भी रहे।
कोलकाता में कारोबार करने वाले लोग संभाल रहे ट्रस्ट
वर्तमान में मंदिर ट्रस्ट में किशन परसरामपुरिया, पुरुषोत्तम परसरामपुरिया, नवीन गोयनका, महेश अग्रवाल, मनीष सौंथलिया, संतोष सौंथलिया और नारायण परसरामपुरिया सेवाएं दे रहे हैं। ट्रस्ट से जुड़े सभी सदस्यों का कोलकाता में कारोबार है और वे मंदिर की व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं।
आस्था और परंपरा का केंद्र बना मेला
पांच दशक से अधिक समय से आयोजित हो रहा यह मेला झाझड़ की धार्मिक और सामाजिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। मेले के दौरान श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर मोहिनी सती दादी के दर्शन करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
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