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नवाब जबरूदीन खाँ उर्फ राव जबर चन्द चौहान ( सन् 1458 से 1496)


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नवाब जबरूदीन खाँ उर्फ राव जबर चन्द चौहान ( सन् 1458 से 1496)

नवाब जबरूदीन खाँ उर्फ राव जबर चन्द चौहान ( सन् 1458 से 1496)

मोटाराव चौहान के तीसरे पुत्र जबरदीनखां को मुस्लिम धर्म स्वीकार करने के पश्चात् फिरोजशाह तुगलक के जमाने में चरखी दादरी की जागीर दी गई। जरदीनखां बड़े बहादुर व्यक्ति हुए। उन्होंने अपने भाई कायमखां के साथ बहुत-से युद्धों में भाग लिया। जब तक कायमखां जिन्दा रहे, वे अपनी जागीर में बने रहे। कायमखां के इन्तकाल के बाद जब उनके भतीजे मोहम्मदखां व ताजखां अपने भाइयों के साथ नागौर तथा जैसलमेर की ओर चले गये, तब जबरदीनखां भी चरख दादरी की जागीर छोड़ कर अपने भतीजों के पास नागौर चले गये और उनके साथ रहे। राणा मोकल के साथ हुए युद्ध में जबरदीन खाँ ने बड़ी बहादुरी दिखाई। कुछ समय पश्चात् अपने भतीजों से आपसी मनमुटाव होने पर जबरदीनखां अपने लश्कर के साथ उनसे अलग होकर वर्तमान शेखावाटी क्षेत्र की ओर आ गये। इस समय इस क्षेत्र पर जोड़ चौहानों को शासन था। कुछ सालों तक इनका मुकाबला जहाँ-तहाँ इस क्षेत्र में इनसे होता रहा। अन्त में जबरदीनखां ने काटली नदी के पास पहाड़ी के दामन में अपना पड़ाव किया। यहाँ भी जोड़ चौहानों का राज्य था। उनके साथ जबरदीनखां की कई छोटी-मोटी लड़ाइयाँ हुई। अन्त में जोड़ चौहान इस क्षेत्र से हट गये। जबरदीनखां इस क्षेत्र के गाँवों में लूटमार किया करते थे।
इसी समय मण्डाला नामक गाँव में सेठ पाहुराम तथा भोलाराम ने किसी बात पर नाराज होकर ग्राम मण्डाला को त्याग कर अपने सहयोगी साथियों के साथ किसी अन्य स्थल के लिए प्रस्थान किया। उनकी भेंट जबरदीनखां से हुई, जो एक शक्तिशाली योद्धा थे। सेठों ने उनके समक्ष कोई नया गाँव बसाने का प्रस्ताव किया। धन तो सेठ लगा रहे थे तथा शक्ति जबरदीनखां की थी। इस प्रकार दोनों की ही पूर्ति हो रही थी। अतः जबरदीनखां ने यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया। हरे कैर की लकड़ी का खूँटा रोपकर कैर के वृक्ष के नाम पर ही केढ गाँव बसाने का मुहुर्त किया गया।
यह कैर की लकड़ी बैसाख शुक्ला 12 बृहस्पतिवार संवत् 1515 में रोपी गई।’ इसी केढ गाँव के नाम पर यहाँ के सेठ केडिया कहलाते हैं। केढ काटली नदी के पश्चिम तट पर बसा है। काटली नदी के तट पर एक छोटी पहाड़ी पर एक किले का निर्माण करवाया गया। नवाब जबरदीनखां के समय में केढ एक मुख्य नगर तथा जबवानों की राजधानी था। यह झुन्झुनूं से 29 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व दिशा में आबाद है। केढ आज छोटा-सा कस्बा मात्र है। मगर किसी समय यह नगर बड़ा समृद्धशाली था। केढ के प्राचीन भवन, किला, मकबरा, बावड़ी तथा सेठों की पुरानी हवेलियाँ आज भी इसकी समृद्धता की तस्वीर अंकित करती हैं।
नवाब जबरदीनखां के इन्तकाल के बाद उनके बड़े पुत्र फिरोजखां केढ की गद्दी पर नवाब हुए, मगर उनके राज्य के विवरणों का ब्यौरा मालूम नहीं होता।
फिरोजखां के इन्तकाल के बाद उनके बड़े पुत्र दाऊदखां ई. 1496 में केढ के नवाब हुए। उन्होंने अपने राज्य की सीमा का विस्तार भी किया। उन्हें केढ तथा नरहड़ का नवाब बताया गया है। नवाब दाऊदखां के इन्तकाल के बाद केढ की गद्दी पर मोहनखां आसीन हुए। ई. 1513 में उनके दो पुत्र हुए। बड़ा मुजफ्फरखां और छोटा जलालखां। मुजफ्फरखां बड़े पुत्र होने के नाते केढ की गद्दी पर बैठे तथा जलालखां को नरहड़ दिया गया। नवाब जलालखां भी बड़े बहादुर व्यक्ति थे। उन्होंने बादशाही सेवा में रह कर बहादुरी के कार्य किये थे। अतः बादशाह अकबर के जमाने में उन्हें माही-मरातिब का सम्मान तथा मनसबदारी दी गयी।
बादशाह अकबर द्वारा दिये गये सम्मान के उन फरमानों के कागजात आज भी उनके वंश के लोगों के पास सुरक्षित हैं। यह फरमान बड़े साईज पर 13 लाईनों में लिखे हैं। ये फारसी भाषा में लिखे गये हैं। इनसे साफ जाहिर होता है कि बादशाह इनके कार्यों से बहुत खुश था। लिखा है कि जिन-जिन लड़ाइयों में आपने बड़े काम अन्जाम दिये हैं, उनका ईनाम आपको मिल चुका है और आगे भी मिलता रहेगा। यानी खलत समरीर घोड़ा, माही-मरातिब आफताब गिरी और भी कुछ है। अंतिम पंक्ति में फैजी 7 शहरे रजब 1005 हिजरी लिखा है। दूसरे पत्र में भी यही तहरीर लिखी है तथा अन्त में फैजी दहुम रबीउल अव्वल 1007 हिजरी लिखा है। इसी प्रकार तीसरा पत्र जिलहजा हिजरी 1011 का लिखा हुआ है। इन पत्रों से साफ जाहिर होता है कि केढ के जबवानी नवाब बड़े बहादुर तथा ऊँचे मरतबे के हुए।
सौजन्य से :- महबूब अली खाँ एलमाण
उनका निधन होना 1496 में लिखा गया है जो सही प्रतीत नहीं होता।
कप्तान लियाकत खाँ ने कुछ इस प्रकार लिखा है
राजा मोटेराय चौहान (ददरेवा) के तीसरे पुत्र राणा जब्बर से जुबेरूद्दीन खां जिन्होंने लगभग अपने भाई कायमखां के साथ ही इस्लाम धर्म स्वीकार किया था। फिरोजशाह तुगलक के जमाने में उन्हें चरखी दादरी जागीर दी गई। जुबेरूद्दीन खां ने अपने भाई कायमखां के साथ कई युद्धों में भाग लिया। वह अपने भाईयों की तरह एक वीर पुरुष था। कायमखां के समय तक आप चरखी दादरी पर काबिज रहे। सन् 1419 ईस्वी में उनके इन्तेकाल या नवाबी छोड़ने के बाद अपने भतीजों के साथ जैसलमेर और फिर नागौर (खाटू) चले आये। उन्हीं के साथ-साथ फिर से हिसार आने के बाद चरखी दादरी जागीर पर काबिज हुये। हिसार छोड़कर जब सब भाईबन्धु आज के शेखावाटी क्षेत्र की तरफ आये उस वक्त जुबेरूद्दीन खां अपने भतीजों से अलग होकर काटली नदी के पश्चिमी मुहाने पर पहाड़ी के दामन में अपने लश्कर का पड़ाव किया। उस वक्त इस क्षेत्र पर जोड़ चौहानों का शासन था। उनके साथ व स्थानीय लोगों से छुट-पुट झड़पों के बाद जुबेरूद्दीन खां उर्फ जब्बरद्दीन खां इस क्षेत्र में स्थापित हो गये।
इस बाबत एक घटना के मुताबिक मण्डाला नामक गाँव में सेठ पाहुराम तथा भोलाराम किसी बात से नाराज होकर अपने गाँव को छोड़कर सहयोगियों के साथ किसी अन्य स्थान के लिए प्रस्थान किया। उस वक्त इनकी भेंट जुबेरूद्दीन खां से हुई। सेठों ने बातचीत के बाद उनके सामने एक नया गाँव बसाने का प्रस्ताव रखा। सेठ लोग संसाधन उपलब्ध करवा रहे थे, उन्हें संरक्षण तथा सुरक्षा जुबेरूद्दीन खां द्वारा प्रदान की जानी थी। सेठों के इस प्रस्ताव को जुबेरूद्दीन खां ने सहर्ष स्वीकार करते हुये, एक कैर की लकड़ी रोपकर (खूंटा) कैर के नाम से ही कैड नामक गाँव बसाया। इसकी बैसाख शुक्ल 12 बृहस्पतिवार पर संवत् 1515 सन् 1458 ईस्वी को स्थापना की गई। (केडिया जाति का इतिहास हरमुखराम छावसरिया)। जुबेरूद्दीन खां द्वारा कैड पर अधिकार करना विक्रम संवत 1515 सन् 1458 ईस्वी लिखा है। किन्तु इतिहासकारों की मान्यता है कि अधिकार करने के बजाय कैड उनका खुद का बसाया हुआ है।
कैड गाँव के सेठ केडिया कहलाते हैं। यहीं पर एक छोटी सी पहाड़ी के ऊपर नवाब जुबेरूद्दीन खां ने एक किले (गढ़) का निर्माण करवाया। झुंझुनूं से 29 किलोमीटर दूर कैड जुबेरूद्दीन खां की राजधानी का मुख्य नगर स्थापित हुआ। कैड में प्राचीन भवन, किला, मकबरा, कुएं, बावड़ी तथा सेठ साहूकारों की हवेलियाँ बनी हुई हैं। कैड के जबवान नवाबों की बहादुरी के चर्चे ना सिर्फ झुंझुनूंवाटी, नरहड़वाटी बल्कि हैदराबाद दक्षिण तक रहे हैं। फतेहपुर व झुंझुनूं की तरह कैड भी कायमखानियों का उस दौर में एक स्वतंत्र राज्य था। नवाब जबरदीन खाँ के इन्तकाल ( 14 61 ) में हुआ।
(लियाकत खाँ धनूरी)
इसमें जबरूदीन खाँ का निधन 1461 में होना लिखा है लेकिन सही प्रतीत यह भी नहीं होता नवाब कायम खाँ का निधन 1419 में होने के बाद इसमें 42 साल बाद इनका निधन होना उचित नहीं बैठता क्योंकि कायम खाँ की जब मृत्यु हुई तब वो 95 वर्ष की आयु के थे। 130 वर्ष तक जीना मेरे हिसाब से सही नहीं है।
अल्लादीन खाँ गौराण बीकानेर

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