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रोजे का मकसद इंसान के भीतर खुदा का डर संयम और परहेजदारी पैदा करना है- मौलाना याकूब खान बीकानेरी


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रोजे का मकसद इंसान के भीतर खुदा का डर संयम और परहेजदारी पैदा करना है- मौलाना याकूब खान बीकानेरी

रोजे का मकसद इंसान के भीतर खुदा का डर संयम और परहेजदारी पैदा करना है- मौलाना याकूब खान बीकानेरी

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान

चूरू : जिला मुख्यालय पर स्थित ‌‌ सर्किट हाउस के पीछे ‌ बिलाल मस्ज़िद के इमाम ‌ मौलाना याकूब खान बीकानेरी ने ‌ माहे रमजान की मुबारक बाद देते हुए कहा की इस्लाम धर्म में रमज़ान के दौरान रोज़े (उपवास) रखने का मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिक शुद्धता और आत्म-अनुशासन प्राप्त करना है। कुरान के अनुसार, रोज़ा हर मुसलमान पर फर्ज (अनिवार्य) किया गया था। इसके पीछे के प्रमुख कारण तक़वा (परहेजगारी): रोज़े का सबसे बड़ा मकसद इंसान के भीतर खुदा का डर, संयम और परहेजगारी पैदा करना है, ताकि वह बुरे कामों से बच सके।

समानता का अनुभवः भूख और प्यास सहने से अमीरों को गरीबों के दर्द और उनकी मुश्किलों का अहसास होता है। ओर आध्यात्मिक जुड़ावः यह केवल खाने-पीने का त्याग नहीं, बल्कि अल्लाह की इबादत, सब्र (धैर्य) और अपने व्यवहार को पाक रखने का एक माध्यम है।

गुनाहों की माफ़ीः मान्यता है कि रमज़ान का महीना गुनाहों को जलाकर खत्म कर देता है और आत्मा को‌ शुद्ध करता है। रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का नौवां और सबसे पवित्र महीना माना जाता है। मान्यता है कि इसी महीने की एक रात, जिसे लैलातुल क़द्र कहते हैं, पैगंबर मुहम्मद पर पवित्र कुरान का पहला अवतरण हुआ था।

इस पूरे महीने मुसलमान सूर्योदय (सहरी) से सूर्यास्त (इफ्तार) तक रोज़ा रखते हैं, जिसमें अन्न और जल का त्याग किया जाता है। यह केवल भूखा रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्म-संयम, अनुशासन और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता सिखाता है का समय है। रमज़ान के दौरान इबादत, तरावीह की नमाज़ और दान-पुण्य (ज़कात) का विशेष महत्व है, ताकि गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद की जा सके। महीने के अंत में चाँद दिखने पर ईद-उल-फितर का त्यौहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह सच है कि रोजा (उपवास) केवल उम्मत-ए-मुहम्मदिया (मुसलमानों) पर ही नहीं, बल्कि पिछली तमाम कौमों और नबियों की उम्मतों पर भी फर्ज था।

कुरान की सूरह अल-बकरा (आयत 183) में अल्लाह फरमाता है: “ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़े फर्ज किए गए, जैसे तुम से पहले लोगों पर फर्ज किए गए थे, ताकि तुम परहेजगार बन जाओ।” इतिहास और धार्मिक ग्रंथों से पता चलता है कि रोज़ों का तरीका और समय अलग-अलग रहा है।

हजरत आदम (अलै.): रिवायतों के अनुसार, हजरत आदम हर महीने की 13, 14 और 15 तारीख को रोज़ा रखते थे, जिन्हें ‘अय्याम-ए-बीज़’ कहा जाता है।

हजरत मूसा (अलै.): यहूदी धर्म में भी रोज़े का महत्व है। हजरत मूसा ने कोह-ए-तूर पर 40 दिन का रोज़ा रखा था। आज भी यहूदी ‘यौम-ए-किप्पुर’ के रूप में रोज़ा रखते हैं।

हजरत ईसा (अलै.): इंजील के अनुसार, हजरत ईसा (ईसाई धर्म) में 40 दिन और 40 रात इबादत और रोज़ा रखा था।

हजरत दाऊद (अलै.): आप एक दिन रोज़ा रखते और एक दिन छोड़ देते थे। अल्लाह को यह तरीका बहुत पसंद था। पर रोज़े का मकसदः हर दौर में रोज़े का मुख्य उद्देश्य ‘तकवा’ (परहेजगारी) पैदा करना रहा है। यह इंसान को अपनी नफ्स (इच्छाओं) पर काबू पाना सिखाता है और अल्लाह की इबादत के लिए रूह को पाक करता है। हालांकि पिछली उम्मतों के रोज़ों की संख्या और नियम आज के इस्लाम से थोड़े अलग थे, लेकिन इबादत की यह रूह हमेशा से चली आ रही है।

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