वीरांगना बोलीं- सपने में आकर पूछते हैं मूर्ति कब लगेगी:कहा- लोग मुझे पागल कहते हैं; अधूरे स्मारक की दीवारों पर काई, ‘जय हिंद’ मिटने लगा
वीरांगना बोलीं- सपने में आकर पूछते हैं मूर्ति कब लगेगी:कहा- लोग मुझे पागल कहते हैं; अधूरे स्मारक की दीवारों पर काई, 'जय हिंद' मिटने लगा
झुंझुनूं : वीरांगना की आंखों से टपकते आंसू… मन में शहीद पति को सम्मान नहीं मिलने का दर्द। अधूरे स्मारक पर रोज जाती हैं। मिट्टी को छूती हैं। सीढ़ियां चढ़कर चबूतरे के पास बैठकर खामोशी से रोने लगती है। रोज एक ही बात और सवाल जैसे वे आज भी वहीं खड़े हों। स्मारक की दीवारों पर काई उग आई है और ‘जय हिंद’ भी उतरने लगा है।
झुंझुनूं की धरती जहां बच्चों को ‘फौजी बनो’ कहकर बड़ा किया जाता है। लेकिन तीन साल बाद भी शहीद राम सिंह की प्रतिमा के लिए दो गज जमीन का इंतजार है। वीरांगना और उनकी हिम्मत दोनों थक चुकी हैं। कहती हैं- रात में वो सपने में आते हैं… पूछते हैं- मेरी मूर्ति कब लगेगी? मैं चुप रह जाती हूं। सिर्फ रो सकती हूं, जवाब नहीं दे पाती। लोग मुझे पागल कहते हैं, लेकिन मेरे लिए ये मंदिर है, अब इसे अधूरा नहीं रहने दूंगीं।

उत्तराखंड में ड्यूटी के दौरान शहीद थे ASI रामसिंह
शहीद ASI राम सिंह कुमावत झुंझुनूं जिले के सूरजगढ़ उपखंड के काजड़ा पंचायत में स्थित कुम्हारों का बास (जिसे कुम्हार की ढाणी भी कहा जाता है) के रहने वाले थे। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के 8वीं बटालियन में तैनात थे। साल 1990 में उत्तराखंड में पोस्टेड हुए थे।
25 जून 2022 को सुबह करीब 5 बजे ड्यूटी के दौरान अचानक सांस लेने में तकलीफ होने से शहीद हो गए थे। ITBP ने इसे ‘लाइन ऑफ ड्यूटी’ में जान गंवाने के रूप में मान्यता दी थी। शहीद का दर्जा दिया गया था। 26 जून 2022 को अंतिम संस्कार किया गया था। शहीद के एक बेटा और दो बेटियां हैं।
तीन साल भी शहादत को नहीं मिला सम्मान
वीरांगना विनोद देवी कहती हैं- उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर आया था। तो पूरा इलाका ‘भारत माता की जय’ के नारों से गूंज उठा था। प्रशासन, सेना और ग्रामीणों ने उन्हें अंतिम विदाई दी थी। आज भी वो घटना मुझे याद है। अपने पति के ताबूत के पास बैठी थीं। भीड़ से लगातार आवाज आ रही थी – शहीद का यह बलिदान हमेशा याद रहेगा।
मैंने तभी मन में था कि अपने पति की याद में गांव में उनकी प्रतिमा लगवाऊंगी। यह मेरे लिए सिर्फ पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और सम्मान की बात है। शहादत को तीन साल हो गए, सपना आज भी अधूरा है।

अधूरा स्मारक, जो हर दिन वीरांगना के आंसुओं से भीगता है
वीरांगना विनोद देवी कहती हैं- साल 2022 में अपने निजी खर्च से शहीद स्मारक का निर्माण शुरू करवाया। ग्राम पंचायत की सार्वजनिक भूमि पर गांव के युवाओं की मदद से चबूतरा बनाया गया, दीवारें उठीं और शहीद की प्रतिमा के लिए स्थान भी तैयार हो गया।
लेकिन तभी गांव के कुछ लोगों ने शिकायत कर दी कि यह सरकारी जमीन है और यहां निर्माण नहीं हो सकता। शिकायत के बाद प्रशासन ने निर्माण रुकवा दिया। दीवारें अधूरी रह गईं, चबूतरे पर धूल जम गई। स्मारक की दीवारों पर लिखा ‘जय हिंद’ अब बारिश और धूप से धीरे-धीरे मिटने लगा है।
विनोद देवी कहती हैं- मुझे ऐसा लगता है जैसे वो वहीं खड़े हैं और मुझे देख रहे हैं। कई बार तो मैं उनसे बात भी करती हूं। मैं पूछती हूं – देखो, अब भी तुम्हारा स्मारक अधूरा है। रात में वो सपने में आते हैं। पूछते हैं – मेरी मूर्ति की स्थापना कब होगी? मैं चुप रह जाती हूं। सिर्फ रो सकती हूं, जवाब नहीं दे पाती।
सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाकर थक गई हिम्मत
विनोद देवी ने सूरजगढ़ तहसील से लेकर झुंझुनूं कलेक्टर कार्यालय तक सैकड़ों बार आवेदन दिए। हर आवेदन में एक ही पंक्ति होती है – शहीद राम सिंह के स्मारक निर्माण की अनुमति दी जाए। लेकिन हर बार फाइल किसी न किसी टेबल पर अटक जाती है। कोई कहता है जमीन विवादित है, तो कोई कहता है कि दूसरे विकल्प तलाशे जा रहे हैं। विनोद देवी ने कहा- मैं सरकारी सहायता नहीं मांग रही हूं। मुझे बस दो गज जगह चाहिए, ताकि अपने पति की प्रतिमा लगा सकूं। मैंने अपने पैसों से निर्माण शुरू करवाया था, लेकिन अब सब रुका पड़ा है।

‘सरकार सिर्फ भाषण देती है, सम्मान नहीं’
शहीद राम सिंह के भाई बाबूलाल ने कहा- जब भाई शहीद हुए थे, तब पूरे प्रशासन ने सम्मान दिया। मंच सजा, फूल बरसाए गए, बड़े अधिकारी आए। लेकिन अब जब उसी शहीद की पत्नी को दो गज जमीन चाहिए, तो सबकी नजरें झुक जाती हैं। हमने कलेक्टर को कई बार लिखा, लेकिन हर बार जवाब मिला – मामला विचाराधीन है। तीन साल हो गए, अब और क्या विचार करना है?
‘शुरू में सब साथ थे, फिर राजनीति ने रास्ता बदल दिया’
भतीजे चौथमल ने बताया- बुआ ने अपने हाथों से नींव डलवाई थी। पूरा गांव मदद कर रहा था, लेकिन कुछ लोगों को शायद यह मंजूर नहीं था कि शहीद का नाम ऊंचा हो। उन्होंने शिकायतें करवा दीं। अब गांव में दो गुट बन गए हैं। एक वीरांगना के साथ खड़ा है, और दूसरा ‘नियम-कानून’ की दुहाई देकर चुप्पी साधे हुए है। ये वही गांव है जहां आज भी लोग बच्चे को फौज में भेजने पर गर्व करते हैं, लेकिन शहीद की पत्नी को सम्मान देने में हिचकते हैं।
लोग मुझे पागल कहते हैं
हर सुबह विनोद देवी उसी अधूरे स्मारक पर जाती हैं। वहां बैठकर कुछ देर चुप रहती हैं। कभी मिट्टी को सहलाती हैं, कभी अपने पल्लू से दीवार पर जमी धूल पोंछती हैं। वह कहती हैं- कभी-कभी लोग मुझे पागल कहते हैं कि रोज यहां क्यों आती हूं। पर यही जगह अब मेरा मंदिर है। यहीं मेरी उम्मीद दबी है। जब तक सांस है, मैं उनके नाम से यह स्मारक बनवाऊंगी। अगर प्रशासन नहीं सुनता, तो मैं अपनी जमीन बेचकर बनवाऊंगी, लेकिन इसे अधूरा नहीं छोड़ूंगी।
शहीद के पुत्र संजीव की व्यथा
शहीद राम सिंह के बेटे संजीव कुमार अब जवान हो चुके हैं और कॉलेज में पढ़ते हैं। वह कहते हैं- जब मैं छोटा था, तो लोग कहते थे तुम शहीद के बेटे हो, गर्व करो। लेकिन अब जब मां को सम्मान के लिए दर-दर भटकते देखता हूं, तो शर्म आती है।
संजीव की आंखें भर आती हैं। वह कहते हैं- मैं खुद फौज में जाना चाहता था, लेकिन अब समझ आ गया कि यहां शहादत के बाद सम्मान नहीं, संघर्ष मिलता है।
गांव की महिलाएं – हम रोज उनके साथ रोती हैं
गांव की महिलाएं बताती हैं कि विनोद देवी रोज शाम को दीया लेकर स्मारक पर जाती हैं। वहां बैठकर वह अपने पति से बातें करती हैं। कई बार वह खुद से कहती हैं – ‘अब आ जाओ, तुम्हारी प्रतिमा लग गई…’ और फिर अचानक रोने लगती हैं।
सूरजगढ़ SDM दीपक चंदन ने बताया-शहीद की प्रतिमा लगाने का मामला पता नहीं है। पदभार संभाले हुए अभी कम समय हुआ है। इस संबंध में कोई शिकायत पेंडिंग है तो जल्द निस्तारण किया जाएगा।
कलेक्टर डॉ. अरुण गर्ग ने कहा-मामला अभी उनके संज्ञान में नहीं है। यदि कार्यालय में कोई फाइल लंबित है तो उसे दिखवाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह शहीद से जुड़ा मामला है, इसलिए यदि किसी प्रकार की समस्या आ रही है तो उसका जल्द से जल्द समाधान किया जाएगा।
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