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बसंत पंचमी


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Janmanasshekhawati

बसंत पंचमी

बसंत पंचमी

धरती के ग्लोब में अंकित सरसों के खेत,
ओस सी बूंदे मुसलसल टपका रही घनघोर हेत,
हरी-पीली ओढ़नी पहन महक रही रेत।

बंजर छाती हुई हरी, खिल गए फूल,
बारिश से गिर गई धूल, मिट गए धरा के शूल।

गरीब के घर जीवन ने ली हैं अंगड़ाई,
सब्जियाँ हूई सस्ती, वाह बसंत ऋतु आई,
पीले-पीले फूलों की ओढ़ रजाई,
धरती पर चहुँओर हरियाली छाई।

हर शाख पर पुष्पित नव अंकुर,
हर गली मोहल्ले में खेल रहे नन्हें कुक्कुर।

यौवन से प्रच्छन्न दुल्हन सी सजी प्रकृति,
धरती का हर कोना बना सुंदर आकृति।

झीलों में कमल के गट्टे सर्द हवा को गले लगाते,
मधुर कल-कल की आवाज जैसे वीणा बजाती सरस्वती माते।

वीणा वाणी से वातावरण हुआ ज्ञानमय,
सज गई बगिया, सब आनन्दमय-प्रेममय।

बच्चे ला रहे बस्ते में भरकर प्रकति के रंग,
कोरे पेज पर बिखेर, चली नन्हीं उंगलियाँ इनके निराले ढ़ंग,
सजीव चित्रांकन, ये जीवटता; वाह! गुरुजन हो गए दंग।

बसंत ऋतु का ये पावन दिन पंचमी,
सौंधी महक, मौसम हो गया शबनमी।

हमें ज्ञान दो, हे मॉं वीणावादिनी,
हम करें खूब मेहनत, ऐसा वर दो हंसवाहिनी।

प्रकति की मानिंद सुंदर हो हमारा भविष्य,
हम बनें गुणवान, सुशिक्षित मनुष्य।।

-कर्मवीर ‘बुडाना’
सृजन तिथि- 23 जनवरी 2026

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