क्या ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा होगा; चुनाव आयोग पर मचे घमासान के 5 किरदार, कैसे आरोप लगे और अब आगे क्या
क्या ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा होगा; चुनाव आयोग पर मचे घमासान के 5 किरदार, कैसे आरोप लगे और अब आगे क्या
ज्ञानेश कुमार… पिछले 2 दिनों में आपने ये नाम कई बार सुना होगा। CJP गद्दार बता रही, केजरीवाल ने गिरफ्तारी की मांग की और राहुल गांधी ने उनके किए को देशद्रोह बताया है। इस घमासान के पीछे इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट है, जिससे चुनाव आयोग के भीतर गड़बड़ियों के संकेत मिल रहे हैं।
आखिर चुनाव आयोग के भीतर ऐसा क्या हुआ, इस विवाद में ज्ञानेश कुमार समेत कौन-से 5 अहम किरदार हैं और अब आगे क्या होगा; आसान भाषा में पूरी कहानी…

जून 2025 में चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में सुधार के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) शुरू किया। सुधार के बाद आई पहली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से देशभर में 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए। विपक्ष आरोप लगाता रहा कि बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए आयोग ने मनमाने ढंग से वोट काटे हैं।
23 सितंबर 2026 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी पड़ताल के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR को लेकर बीते 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक आपत्तियां दर्ज करवाईं।
कई मौकों पर दोनों आयुक्तों को आयोग के नाम पर हुए फैसलों की जानकारी तक नहीं थी। रिपोर्ट के मुताबिक संधू ने कहा कि चुनाव आयोग ने उनके और जोशी की लिखित सलाह के खिलाफ ‘गैरकानूनी’ काम किया।
SIR प्रक्रिया में 5 गड़बड़ियां के आरोप लग रहे हैं…
1. फॉर्म-6 में गैरकानूनी तरीके से नया सवाल जोड़ा गया
- 18 साल से ऊपर के व्यक्ति को वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल करने के लिए फॉर्म-6 भरना होता है। इनमें कई जानकारियां देनी होती हैं। यह भी पूछा जाने लगा- ‘क्या वोटर के माता-पिता या दादा-दादी इससे पहले हुए SIR की वोटर लिस्ट में मौजूद थे?’
- फॉर्म भरने में इस सवाल का जवाब देना जरूरी था। मई में विवेक जोशी ने कहा था कि फॉर्म-6 को इस तरह बदला नहीं जा सकता। इसके लिए सरकार को नियम बदलना पड़ेगा। संधू ने भी उनकी इस बात पर सहमति जताई थी।
- 13 अगस्त को संधू ने आधिकारिक तौर पर कहा कि इस अनाधिकृत और गैरकानूनी तरीके से जोड़े गए सवाल को तुरंत हटाया जाना चाहिए, लेकिन 21 सितंबर तक ये सवाल मौजूद था।
2. चुनावी अधिकारियों का वोट लिस्ट में एक्सेस सीमित किया गया
- चुनावी इलाकों की लोकल वोटर लिस्ट वहां के इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर, ERO तैयार करते हैं। आम तौर पर SDM ही उस इलाके के ERO होते हैं।
- ये वोटर लिस्ट आयोग के सॉफ्टवेयर ECINet (इसकी जगह पहले ERONet था) पर होती है। अगस्त में संधू ने कहा कि राज्यों के कई इलेक्शन ऑफिसर्स ने बताया कि उन्हें ERONet पोर्टल तक पूरी एक्सेस नहीं मिल रही।
- संधू ने कहा कि चुनाव आयोग की IT डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि वो अधिकारियों को कानून से मिली काम करने की आजादी और उनकी एक्सेस को कम करें।
3. पश्चिम बंगाल में वोटर्स के खिलाफ 16.10 लाख ‘गुमनाम अपीलें’
- पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान 60 लाख वोटर्स के नाम में ‘लॉजिकल गड़बड़ी’, यानी उनकी डिटेल्स के मिलान में कमी थी।
- सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को इस पर फैसला करने का काम दिया। इनमें से 27 लाख वोटर्स के नाम बाद में चुनाव आयोग ने हटा दिए थे। फिर सुप्रीम कोर्ट ने इन वोटर्स की अपील सुनने का काम हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों के ट्रिब्यूनल को सौंपा।
- पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि ट्रिब्यूनल के पास 38 लाख अपीलें पेंडिंग थीं। इनमें से 22.21 लाख अपीलें उन वोटर्स की थीं, जो अपना नाम शामिल करना चाहते थे। वहीं 16.10 लाख अपीलें उन वोटर्स के खिलाफ थीं, जिनको न्यायिक अधिकारी पहले ही लिस्ट में शामिल कर चुके थे। यानी इन 16.10 लाख अपीलों में लिस्ट में शामिल लोगों के वोट काटने को कहा गया था।
- संधू ने कहा, ‘चुनाव आयोग उन वोटरों के खिलाफ अपील कर रहा था, जिन्हें खुद न्यायिक अधिकारियों ने लिस्ट में शामिल किया था।’
- दरअसल, चुनाव आयोग ने कोर्ट को ये नहीं बताया कि ये अपीलें किसने दायर की थीं।’

4. अपीलें दायर करने की इजाजत देने वाले का पता नहीं
- अपीलें दायर करने के लिए अथॉरिटी कौन है, ये कोर्ट को नहीं बताया गया। संधू के मुताबिक, उन्हें, जोशी और पश्चिम बंगाल के मौजूदा मुख्य चुनाव अधिकारी, CEO को भी अपील दायर करने की प्रकिया की कोई जानकारी नहीं दी गई थी।
- 25 मई 2026 को पश्चिम बंगाल के CEO मनोज अग्रवाल को हटाकर राज्य का मुख्य सचिव बना दिया गया था। उनकी इस नियुक्ति पर कई सवाल उठे थे। उनकी जगह नीलम मीना CEO बनाई गई थीं।
- संधू ने चुनाव आयोग के कुछ अधिकारियों को पत्र लिखकर पूछा था कि आयोग की तरफ से किसने ये अपीलें दायर कीं। उन्होंने लिखा था,’आयोग की तरफ से अपीलें दायर करने का अधिकार किसे था और इसकी इजाजत किसने दी थी?
5. सॉफ्टवेयर ने गोवा में योग्य वोटरों को भी हटा दिया
- 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिन वोटरों के मामले में ‘लॉजिकल गड़बड़ी’ है, उन्हें डॉक्यूमेंट जमा करने और फाइनल वोटर लिस्ट आने से पहले अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए।
- गोवा के EROs को ऐसे मामलों की सुनवाई और डॉक्यूमेंट के आधार पर 97 वोटर्स फाइनल वोटर लिस्ट में जोड़े जाने योग्य मिले, लेकिन सॉफ्टवेयर में नाम जोड़ने का कोई तरीका ही नहीं था।
- 11 से 17 फरवरी के बीच गोवा के चीफ इलेक्शन कमिश्नर के ऑफिस ने राज्य के प्रभारी और सीनियर डिप्टी चुनाव आयुक्त ज्ञानेश भारती को 8 बार लेटर लिखे और सॉफ्टवेयर में रोलबैक के ऑप्शन की मांग की।
- हर बार सीमा खन्ना को भी लेटर की कॉपी भेजी गई, लेकिन फाइनल वोटर लिस्ट आने तक इन लेटर्स का कोई जवाब ही नहीं आया और वो 97 वोटर्स इलेक्टोरल लिस्ट में शामिल नहीं हो पाए।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाय कुरैशी कहते हैं, ‘चुनाव आयोग तीन सदस्यीय वैधानिक संस्था है। ये मुख्य चुनाव आयुक्त का दूसरा नाम नहीं है। चुनाव आयोग को बताना चाहिए कि जो भी फैसले बहुमत से नहीं हुए, वो कैसे जारी हो जाए। फॉर्म 6 को फिर से नियमों के मुताबिक बनाना चाहिए। ECINet की स्वतंत्र ऑडिट होनी चाहिए। ये तय हो कि ERO संसद से मिली अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सकें।’

1. ज्ञानेश कुमार: मनमाने फैसले लेने के आरोप
आगरा के रहने वाले ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के IAS अधिकारी हैं। IIT कानपुर से बीटेक के बाद ज्ञानेश ने हार्वर्ड से एनवायरनमेंटल इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की। मई 2022 से 31 जनवरी 2024 तक वो सहकारिता मंत्रालय में सचिव थे।
15 मार्च 2024 को ज्ञानेश कुमार और संधू को चुनाव आयुक्त बनाया गया। 19 फरवरी 2025 को राजीव कुमार के रिटायरमेंट के बाद ज्ञानेश नए CEC बने।
17 अगस्त 2025 को राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ आरोप पर ज्ञानेश ने कहा था, ‘राहुल हलफनामा दें या देश से माफी मांगें, कोई तीसरा विकल्प नहीं है।’
ज्ञानेश संसदीय कार्य मंत्रालय के भी सचिव रहे। 2019 में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के दौरान ज्ञानेश गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव थे। जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक बदलाव की प्रक्रिया में ज्ञानेश की भूमिका थी।
राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ज्ञानेश की अगुवाई में बनी 3 सदस्यीय टीम ने राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट बनाने और सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन देने जैसे काम देखे। ट्रस्ट के 15 नामित सदस्यों में भी ज्ञानेश केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के बतौर शामिल हुए।
2007 से 2012 तक UPA सरकार के दौरान ज्ञानेश कुमार रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे। ज्ञानेश का कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है।
2. सुखबीर संधू: फैसलों पर आपत्तियां जताई
पंजाब से आने वाले सुखबीर सिंह संधू, 1988 बैच के उत्तराखंड कैडर के IAS ऑफिसर हैं। अमृतसर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से MBBS के बाद उन्होंने इतिहास में मास्टर्स और फिर लॉ किया था।
मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त बनने के पहले करीब एक महीने संधू लोकपाल के सेक्रेटरी और जुलाई 2021 से जनवरी 2024 तक उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे।
संधू 2019 से 2021 तक नेशनल हाईवे अथॉरिटी, NHAI के अध्यक्ष और इससे पहले उच्च शिक्षा विभाग में अतिरिक्त सचिव भी रहे थे। 2007 से 2014 तक संधू ने तीन पार्टियों के चार मुख्यमंत्रियों के प्रमुख सचिव के बतौर काम किया है।
शुरुआती सर्विस में हरिद्वार और नोएडा के कलेक्टर भी रहे। 2001 की जनगणना में भूमिका के लिए संधू को राष्ट्रपति मेडल मिला था।
संधू मसूरी में प्रशासनिक अधिकारियों के ट्रेनिंग सेंटर LBSNAA में रेगुलर स्पीकर रहे हैं। आयोग में 14 में से 7 आपत्तियां अकेले संधू ने दायर की हैं, जबकि 2 आपत्तियों में वह जोशी के साथ शामिल थे। 3. विवेक जोशी: फैसलों पर आपत्तियां जताई
विवेक जोशी 1989 बैच के हरियाणा कैडर के IAS ऑफिसर रहे हैं। जोशी ने 1987 में रुड़की यूनिवर्सिटी, (IIT रुड़की) से मेकैनिकल इंजीनियरिंग और फिर जेनेवा के ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट से इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में पीएचडी पूरी की।
19 फरवरी 2025 को जोशी चुनाव आयुक्त बने थे। इससे पहले हरियाणा के चीफ सेक्रेटरी, कपड़ा मंत्रालय, महिला और बाल विकास मंत्रालय और वित्त मंत्रालय में सचिव रहे।
जोशी हरियाणा के 4 जिलों में डिप्टी कमिश्नर और डिविजनल कमिश्नर रहे। रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक में बोर्ड मेंबर भी रहे हैं।
4. सीमा खन्ना: सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी से योग्य वोटर नहीं जुड़ सके
सीमा खन्ना 2025 में डेप्युटेशन, यानी अस्थायी तौर पर चुनाव आयोग में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, IT की डायरेक्टर जनरल, यानी महानिदेशक बनी थीं। उन्होंने इंजीनियरिंग में मास्टर्स के बाद IIT दिल्ली से इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी में डॉक्टरेट किया है।
अप्रैल 2020 से 2025 तक सीमा नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर, NIC में डिप्टी डायरेक्टर जनरल थीं।
22 जनवरी 2026 को आयोग ने ECINet लॉन्च किया था, जिसके तहत आयोग से जुड़े 40 से ज्यादा प्स एकसाथ आ गए थे। तब खन्ना ने कहा था कि इससे पारदर्शिता और भरोसा बढ़ेगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीमा खन्ना इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के सेक्टर में करीब 25 साल से काम कर रही हैं।
पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी ने फरवरी 2026 में कहा था कि रिटायर्ड IT ऑफिसर और बीजेपी की समर्थक सीमा खन्ना चुनाव आयोग के कार्यालय से वोट काटने का खेल कर रही हैं।
सीनियर पत्रकार प्रशांत टंडन कहते हैं, ‘असली खेल सीमा खन्ना द्वारा संचालित वोट काटने वाले ECINet सॉफ्टवेयर का है। सॉफ्टवेयर को लेकर इतनी गोपनीयता क्यों बरती जा रही है?’
TMC के पूर्व सांसद साकेत गोखले ने 17 अप्रैल 2026 को RTI डालकर ECINet सॉफ्टवेयर के बारे में जानकारियां मांगी थी। जो जानकारी मांगी गई, उसे वाणिज्यिक रूप से गोपनीय, ट्रेड सीक्रेट बताकर इनकार कर दिया गया।
5. टीवी सोमनाथन: चुनाव आयुक्तों ने इन्हें भी चिट्ठियां लिखीं
सिविल सर्विसेज में सबसे ताकतवर पद कैबिनेट सचिव है। 30 अगस्त 2024 को देश के 33वें कैबिनेट सचिव बने सोमनाथन तमिलनाडु कैडर के 1987 बैच के IAS ऑफिसर हैं। सोमनाथन ने CA और इकोनॉमिक्स में पीएचडी की है।
सोमनाथन अप्रैल 2021 से अगस्त 2024 तक वित्त सचिव और दिसंबर 2019 से वित्त विभाग के एक्सपेंडिचर सेक्रेटरी रहे। जुलाई 2017 में GST पॉलिसी को लागू करने में सोमनाथन की भूमिका है।
2011 से 2015 तक टीवी सोमनाथन वाशिंगटन में विश्व बैंक के डायरेक्टर भी रहे हैं। 2007 में तमिलनाडु में चेन्नई मेट्रो के पहले MD और 2007 में तमिलनाडु सीएम एम. करुणानिधि के सेक्रेटरी रहे।
सोमनाथन का कार्यकाल 30 अगस्त 2026 को खत्म होना था, लेकिन उन्हें एक साल का एक्सटेंशन मिला है।

2023 में कानून में बदलाव के बाद अब चुनाव आयुक्तों पर उनकी ऑफिशियल ड्यूटी के दौरान किए गए किसी भी काम या कही गई बात के लिए कोई क्रिमिनल केस नहीं चलाया जा सकता है। ऐसे में आगे 2 संभावनाएं बन रही हैं…
- मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद में महाभियोग लाकर ही पद से हटाया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक विपक्ष जल्द ही महाभियोग का नोटिस दे सकता है। हालांकि ये लंबी प्रक्रिया है। अप्रैल 2026 में भी ऐसा नोटिस दिया गया था, लेकिन तब लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति दोनों ने इसे स्वीकार नहीं किया था।
- ज्ञानेश कुमार के खिलाफ वकील ब्रजेश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं, ‘अगर फॉर्म-6 का नियम बदलने में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो सुप्रीम कोर्ट मामले का खुद संज्ञान लेकर सुनवाई कर सकता है। हालांकि इसका कोई सबूत सार्वजनिक नहीं है कि फॉर्म-6 में बदलाव केवल संसद से ही हो सकता है।’
हालांकि चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके सारे फैसले कानून और संस्था की परंपराओं के मुताबिक हैं। फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से हुए।
बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘ये लोकतंत्र का प्रतीक है। अगर आयुक्तों के बीच विचारों का आदान-प्रदान न होता, तो विपक्ष आरोप लगाता कि ये सरकार के ‘यस मैन’ हैं।
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