10 साल की मॉबलिंचिंग का दस्तावेज: दिल्ली में लॉन्च हुई “Mob Lynching in India” किताब
10 साल की मॉबलिंचिंग का दस्तावेज: दिल्ली में लॉन्च हुई “Mob Lynching in India” किताब
नई दिल्ली : एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) द्वारा “भारत में मॉब लिंचिंग: एक रिकॉर्ड – 2014-2024” (Mob Lynching in India: A Record —2014–2024) पुस्तक का विमोचन किया गया। इस पुस्तक का संकलन और संपादन डॉ. ज़फरुल-इस्लाम खान ने किया है। विमोचन कार्यक्रम, मंगलवार 22 सितम्बर 2026 को दोपहर 3:00 बजे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में आयोजित हुआ।
यह पुस्तक भारत में 2014 से 2024 तक के दस वर्षों के दौरान हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं का दस्तावेजीकरण करती है। इसमें इस अवधि के दौरान हुई घटनाओं के रिकॉर्ड को एकत्र कर देश में हुई मॉब हिंसा के एक प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक विमोचन के अवसर पर शिक्षाविद, वकील, शोधकर्ता और नागरिक समाज के लोगों ने पुस्तक और इसमें दर्ज घटनाओं पर चर्चा की।
कार्यक्रम में वक्ताओं के तौर पर प्रो. अपूर्वानंद, हर्ष मंदर, सैयदा हमीद, शाहीन नज़र, डॉ. ज़फरुल-इस्लाम खान और मलिक मोहतसिम खान शामिल रहे। चर्चा का संचालन प्रशांत टंडन ने किया।
यह पुस्तक डॉ. ज़फरुल-इस्लाम खान द्वारा संकलित और संपादित है और फारोस द्वारा प्रकाशित की गई है।
इस अवसर पर प्रो. अपूर्वानंद ने कहा, “मॉब लिंचिंग करने वालों के दो उद्देश्य हैं। एक मुसलमानों में डर फैलाना और दूसरा बड़ी संख्या में लोगों को अपराधी बनाना ताकि हिंदुत्व की राजनीति को जिंदा रहने की जगह मिल सके।”
पूर्व IAS हर्ष मंदर ने कहा कि, “यह पुस्तक उस दौर का सबूत है जिससे हम गुजर रहे हैं। लिंचिंग जैसी घटनाओं ने पिछले 12 वर्षों में देश को बहुत बदल दिया है। लिंचिंग एक प्रदर्शनकारी हिंसा है। यह नफरत के साथ हत्या का एक नाटकीय प्रदर्शन है। यह समाज को दिखाने के लिए किया जाता है कि अपराधियों को जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा।”
सैयदा हमीद ने अपने दादा के शब्दों को याद करते हुए कहा कि, “तुम अगर चाहते हो मुल्क की खैर, न किसी हम-वतन को समझो गैर, हों मुसलमान इसमें या हिंदू, बौद्ध मज़हब हो या कि हो ब्रह्मू, सबको मीठी निगाह से देखो, समझो आँखों की पुतलियाँ सबको।”
उन्होंने वास्तविक पत्रकारिता के महत्व पर भी जोर दिया और मौजूद पत्रकारों का धन्यवाद करते हुए कहा कि आज के दौर में वही सच्चे पत्रकार हैं जो दुनिया को हकीकत दिखाते हैं।
शाहीन नज़र ने कहा कि, “दस्तावेजीकरण जरूरी है ताकि हम ऐसी घटनाओं को न भूलें। समय बदलेगा और दस्तावेजीकरण हमें ऐसे समय को न भूलने में मदद करेगा। मैं इन घटनाओं और इस दौर के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार मानता हूँ। एक लोकतांत्रिक समाज में ऐसी चीजें होते देखना शर्मनाक है। न्याय के बिना कोई भी समाज जीवित नहीं रह सकता। मौजूदा हालात और पत्रकारों के गिरते स्तर को देखकर कई बार खुद को पत्रकार कहने में शर्म आती है। एक समाज के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस किताब को गंभीरता से लें और दोषियों को जवाबदेह ठहराएं।”
डॉ. ज़फरुल-इस्लाम खान ने कहा कि, “इस किताब को संकलित करने में 6-7 साल लगे। दस्तावेजीकरण की कमी के कारण लोग कई बड़ी घटनाओं को भूल जाते हैं। लिंचिंग समाज के लिए नई नहीं है, लेकिन लिंचिंग को कभी भी इस तरह सामान्य नहीं बनाया गया जिस तरह आज इसे सामान्य बना दिया गया है।”
JIH उपाध्यक्ष मलिक मोहतसिम खान ने कहा कि “लिंचिंग जैसे मुद्दों से क्या सबक मिलता है? यह दिखाता है कि समाज को सुधारने के नाम पर लिंचिंग करने वाले लोगों के लिए मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं है।”
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