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कलम की आजादी लोकतंत्र की जान हैं, सच लिखना सबसे बड़ा धर्म – कुड़ी


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कलम की आजादी लोकतंत्र की जान हैं, सच लिखना सबसे बड़ा धर्म – कुड़ी

कलम की आजादी लोकतंत्र की जान हैं, सच लिखना सबसे बड़ा धर्म - कुड़ी

जनमानस शेखावाटी सवंददाता :  मनोहरपुर जाफर लोहानी

पाली : भामाशाह मोहन कुड़ी ने कहा कि 3 मई को पूरी दुनिया कलम को सलाम करती है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस। ये दिन याद दिलाता है कि जब तानाशाह स्याही से डरते हैं, तब समझ लो लोकतंत्र जिंदा है।

ये दिन क्यों है जरूरी

1993 में संयुक्त राष्ट्र ने ऐलान किया कि 3 मई को प्रेस की आजादी का दिन मनाया जाएगा। वजह थी 1991 का विंडहोक घोषणापत्र, जहां अफ्रीकी पत्रकारों ने कहा था: हमें सच बोलने का हक चाहिए, भीख नहीं। आज 33 साल बाद भी वो लड़ाई जारी है।

लहू से लिखे नाम

गौरी लंकेश को 7 गोलियां मारी गईं, क्योंकि वो सवाल पूछती थी। राजदेव रंजन को दिन दहाड़े भून दिया, क्योंकि उसने माफिया को बेनकाब किया। सुभाष महतो, ज्योतिर्मय डे, शुजात बुखारी। ये नाम नहीं, जिंदा मिसाल हैं। इन्होंने साबित किया कि पत्रकार की उम्र भले छोटी हो, उसकी खबर अमर होती है।

दलाल नहीं, पहरेदार बनो

गणेश शंकर विद्यार्थी ने दंगे में जान दी पर कलम नहीं बेची। कुलदीप नैयर ने इमरजेंसी में जेल काटी पर झुके नहीं। आज जब स्टूडियो में खबर नाचती है और विज्ञापन के पैसे से हेडलाइन तय होती है, तब याद रखो कि पत्रकारिता कुर्सी चाटने का नाम नहीं है। ये भूखे के पेट का सवाल है। ये मजदूर के पसीने का हिसाब है।

आज की चेतावनी

जो पत्रकार डर गया, वो मर गया, जो बिक गया, वो खबर नहीं, विज्ञापन है, जो चुप रहा, वो गुनहगार है, जो लड़ा, वही इतिहास है, कलम तलवार से तेज होती है, पर तभी जब स्याही में जमीर मिला हो। वरना वो सिर्फ लकड़ी का टुकड़ा है।

आज 3 मई है। आज शपथ लो कि जब तक एक भी गरीब की चीख दबेगी, एक भी भ्रष्टाचारी हंसेगा, तब तक ये कलम रुकेगी नहीं। क्योंकि अगर पत्रकार सो गया, तो लोकतंत्र मर जाएगा।

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