बाबा श्याम का ‘मूंड’ रूपी पत्थर होने से कहलाया ‘मूंडरू’:महाभारत काल से कस्बे का जुड़ा इतिहास, बाबा श्याम के शीश की होती है पूजा
बाबा श्याम का 'मूंड' रूपी पत्थर होने से कहलाया 'मूंडरू':महाभारत काल से कस्बे का जुड़ा इतिहास, बाबा श्याम के शीश की होती है पूजा
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : नैना शेखावत
मूंडरू : मूंडरू कस्बा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का प्रमुख केंद्र है। इसका इतिहास महाभारतकालीन युग से जुड़ा है। पौराणिक धर्मग्रंथों और प्राचीन साहित्यों में इसे धर्म नगरी ‘छोटी काशी’ के नाम से जाना जाता है। यहां बाबा श्याम का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। राज्य राजमार्ग 37 पर स्थित मूंडरू कस्बे में एक ओर जहां आम्रवृक्षों की अनुपम छटा है, वहीं दूसरी ओर इतिहास को बयां करने वाले मंदिर और एशिया महाद्वीप की एक पत्थर की पहाड़ी भी मौजूद है।
इतिहासकारों के अनुसार महाभारतकालीन गौरव गाथाओं से जुड़े इस कस्बे को संवत 1616 के करीब ठाकुर हरदयरामजी ने बसाया था। कस्बे का नाम ‘मूंडरू’ पड़ने के पीछे कई ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक, बाबा श्याम का ‘मूंड’ (शीश) रूपी पत्थर यहां विद्यमान होने के कारण इसका नाम मूंडरू पड़ा।
अंगूठी के समान मूंडरू का आकार
एक अन्य मत के अनुसार यह पहाड़ी चारों ओर से नदी प्रवाह से घिरी होने के कारण ‘मूंदरी’ (अंगूठी) के समान दिखाई देती थी, जिससे इसका प्राचीन नाम ‘मूंदरी’ था, जो बाद में ‘मूंडरू’ बन गया। मूंडरू कस्बे के पूर्व में सीतारामजी का मंदिर, पश्चिम में डाबर का बालाजी मंदिर, दक्षिण में कोलवा बालाजी मंदिर और उत्तर में डूंगरी बालाजी के प्राचीन मंदिर स्थित हैं। ये मंदिर कस्बे के सुरक्षा प्रहरी के रूप में प्रतीत होते हैं।
कस्बे में 51 मंदिर स्थित
कस्बे में बिहारीजी का मंदिर, नृसिंह मंदिर, जानकीनाथजी के मंदिर सहित कुल 51 मंदिर हैं, इसीलिए मूंडरू को ‘छोटी काशी’ कहा जाता है। संध्याकाल में आरती के समय यहां के मंदिरों की घंटा, झालर और शंखों की ध्वनि से पूरा कस्बा भक्तिमय रस में डूब जाता है।
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