असली और नकली कायमखानी की बहस से ऊपर उठकर समाज में भाईचारे और सुधार की जरूरत : आबिद खान गुड्डू
दहेजमुक्त विवाह, सामाजिक सद्भाव और पूर्वजों की विरासत पर रखे विचार; सोशल मीडिया पर अपनों की आलोचना और अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल पर जताई चिंता
कुछ साल पहले मैं भी कौम की बातें किया करता था। जब से मुझे अपने बारे में समझ आने लगी, तब से यही बताया गया कि मैं कायमखानी समाज से हूं, जो बहादुरी, देशप्रेम और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान रखता है। मैं भी समाज में जागरूकता और चेतना लाने की बातें करता था।
मुस्लिम होने के नाते मैंने हर समाज को अपना समझा। मेरे नबी की शिक्षाओं से प्रेरित होकर केवल मुस्लिम समाज ही नहीं, बल्कि दूसरे समुदायों के लोगों के साथ भी प्रेम और भाईचारे के पक्ष में खड़ा रहा। आज मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे परिचितों में हर समाज के ऐसे लोग हैं, जिन्होंने जरूरत के समय मदद करने से कभी इनकार नहीं किया।

समाज में जागरूकता की बातें करने का असर मेरे निजी जीवन में भी दिखाई दिया। मैंने अपनी शादी दहेजमुक्त और अनावश्यक रस्मों से दूर रहकर की। रीत-रिवाज के नाम पर ससुराल पक्ष से किसी भी तरह का धन नहीं लिया। अपने इस फैसले से मैं आज भी संतुष्ट हूं और इसे जीवन के अच्छे निर्णयों में से एक मानता हूं।
कायमखानी समाज से जुड़ा होने के नाते मैं आज भी अपने पूर्वजों की राजपूती संस्कृति और विरासत का सम्मान करता हूं। मेरा मानना है कि इंसान की पहचान उसके विचारों, व्यवहार और कर्मों से होनी चाहिए, न कि केवल उसकी पूजा-पद्धति से।
लेकिन समय के साथ जब सोशल मीडिया और सामाजिक जीवन में परिचितों का दायरा बढ़ा तो कई नई बातें देखने-सुनने को मिलीं। पता चला कि समाज के भीतर ही असली और नकली कायमखानी जैसी बहसें चल रही हैं। जबकि दोनों समूहों के पूर्वजों को राजपूत बताया जाता है। मेरे विचार से इस तरह के अनावश्यक वर्गीकरण और विवाद समाज के लिए नुकसानदायक हैं।
मैंने समाज सुधार से जुड़ी मुहिमों और समूहों में लोगों के साथ मिलकर काम किया, लेकिन कभी किसी की सार्वजनिक आलोचना करने का रास्ता नहीं चुना। मेरा मानना है कि अपनों की आलोचना करने के बजाय उन्हें समझाना चाहिए। बच्चे कोरे कागज की तरह होते हैं। उन्हें अच्छे-बुरे का अंतर डांट-फटकार से नहीं, बल्कि प्यार और समझाइश से सिखाया जा सकता है।
वीडियो बनाकर समाजहित की बातें करना अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन अगली ही वीडियो में अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करना उन बातों के उद्देश्य पर सवाल खड़े करता है। समाज के लिए काम करने का दावा करने वालों को अपने शब्दों और व्यवहार में भी उसी भावना को बनाए रखना चाहिए।
सोशल मीडिया की दुनिया शेयर, लाइक और टिप्पणी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अपनी बात रखना हर किसी का अधिकार है, लेकिन बिना पुख्ता पुष्टि के किसी बात को सच साबित करने की जिद उचित नहीं है। विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन्हें रखने का तरीका मर्यादित होना चाहिए।
मेरी कोशिश आगे भी समाज के प्रति सकारात्मक सोच के साथ काम करने की रहेगी। मैं समाज में समाहित किसी भी व्यक्ति को सोशल मीडिया पर गाली देने या सार्वजनिक रूप से अपमानित करने में विश्वास नहीं रखता। समाज को आगे बढ़ाना है तो आपसी सम्मान, भाईचारे, शिक्षा और सुधार को प्राथमिकता देनी होगी।
— आबिद खान गुड्डू
देश
विदेश
प्रदेश
संपादकीय
वीडियो
आर्टिकल
व्यंजन
स्वास्थ्य
बॉलीवुड
G.K
खेल
बिजनेस
गैजेट्स
पर्यटन
राजनीति
मौसम
ऑटो-वर्ल्ड
करियर/शिक्षा
लाइफस्टाइल
धर्म/ज्योतिष
सरकारी योजना
फेक न्यूज एक्सपोज़
मनोरंजन
क्राइम
चुनाव
ट्रेंडिंग
Covid-19




Total views : 2496951


