चूरू की राजनैतिक मे वंश वाद हावी- टिकट वितरण और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा
चुरू जिले में वंशवाद का खुलकर आग़ाज़ कौन बनेगा जिला प्रमुख
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : चुरू जिले की राजनीति में वंशवाद और परिवारवाद एक प्रमुख चुनावी और सामाजिक मुद्दा बन गया है। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषको और सोशल मीडिया पर अक्सर यह है आरोप लगाया जाता है कि जिले के बड़े राजनीतिक घराने से जुड़े परिवार इस अवस्था में उलझे हुए हैं चुनाव में अक्सर बड़े नेताओं के बेटों या पुत्र - बधु को आगे बढ़ने पर आम कार्यकर्ताओं द्वारा सवाल उठाए जाते हैं। आलोचकों का मानना है कि राजनीतिक दल चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस द्वारा टिकटों के वितरण में वारिशों को प्राथमिकता दी जाती है। इससे जमीनी स्तर पर मेहनत करने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं के अवसर सीमित हो जाते हैं और लोकतांत्रिक परिक्रिया प्रभावित होती है।
1. राजेंद्र सिंह राठौड़ पूर्व केबिनेट मंत्री चूरू/तारानगर
पार्टी – भाजपा
- पराक्रम सिंह राठौड़ पुत्र, कनिका सिंह राठौड़ पुत्रवधु (दोनों को जिला परिषद की टिकट)
2. मकबूल मंडेलिया पूर्व जिलाध्यक्ष कांग्रेस, पूर्व विधायक, चूरू
पार्टी – कांग्रेस :
- रफीक मंडेलिया पुत्र (प्रदेश उपाध्यक्ष कांग्रेस, दो बार सांसद, दो बार विधायक की टिकट, हार
- इरशाद मंडेलिया, पौत्र (पिता रफीक मंडेलिया उसे चूरू का विधायक देखना चाहते हैं)
3. नरेंद्र बुडानिया, दो बार सांसद, तीन बार विधायक)
पार्टी – कांग्रेस
- कनक बुडानिया, पत्नी जिला परिषद से टिकट
4. स्वर्गीय भंवरलाल शर्मा पूर्व केबिनेट मंत्री सरदारशहर
पार्टी – पहले भाजपा, अब कांग्रेस
- अनिल शर्मा पुत्र (दो बार सरदारशहर से विधायक)
- केसरी शर्मा, पुत्र (जिला परिषद चूरू से टिकट)
- श्यामलाल शर्मा, भाई (निर्दलीय प्रत्याशी BDC)
5. स्वर्गीय भंवरलाल मेघवाल, पूर्व केबिनेट मंत्री सुजानगढ़
- बनारसी मेघवाल – पुत्री, (जिला प्रमुख चूरू)
- पत्नी – (प्रधान पंचायत समिति, सुजानगढ़) 3. मनोज मेघवाल पुत्र (दो बार विधायक, सुजानगढ़)
6. स्वर्गीय दीपचंद कस्वां (पूर्व विधायक, सादुलपुर)
पार्टी – पहले बीजेपी अब कांग्रेस
- राम सिंह कस्वां पुत्र (विधायक सादुलपुर, चार बार सांसद, चूरू)
- कमला कस्वां पुत्रवधु (विधायक सादुलपुर, जिला प्रमुख चूरू)
- राहुल कस्वां पौत्र (तीसरी बार सांसद, चूरू)
राजनीति में सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि चुनाव कौन जीत सकता है, बल्कि यह भी है कि चुनाव लड़ने का अवसर किसे मिलता है। किसी पार्टी की ताक़त उसके बड़े नेताओं, उनके भाषणों या चुनावी रणनीतियों से ही नहीं बनती। उसकी असली नींव वे कार्यकर्ता होते हैं जो वर्षों तक गाँवों की गलियों में पार्टी का झंडा उठाते हैं, बूथ सँभालते हैं, जनता के सुख-दुःख में खड़े रहते हैं और चुनाव के समय अपने निजी काम छोड़कर पार्टी के उम्मीदवार को जिताने में जुट जाते हैं।
लेकिन जब टिकट वितरण की बारी आती है, तब एक असहज सवाल सामने खड़ा हो जाता है? क्या पार्टी के लिए मेहनत करने वाले कार्यकर्ता केवल दूसरों को जिताने के लिए हैं? क्या उन्हें स्वयं चुनाव लड़ने का अवसर मिलना चाहिए?
राजस्थान की जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत की राजनीति में परिवारों की राजनीतिक भागीदारी को लेकर उठते सवाल इसी व्यापक बहस का हिस्सा हैं। जब एक ही राजनीतिक परिवार के अनेक सदस्यों को टिकट मिलता है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या चयन का आधार योग्यता, जनसेवा और संगठनात्मक अनुभव है, या राजनीतिक रिश्तेदारी भी इसमें निर्णायक भूमिका निभाती है।
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