नगरश्री में साहित्य की सरिता बही, कवियों ने रचनाओं से बांधा समां
पं. कुंज बिहारी शर्मा स्मृति साहित्य गोष्ठी की 185वीं कड़ी में कविता, गजल और राजस्थानी गीतों ने जीता श्रोताओं का दिल
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : लोक संस्कृति शोध संस्थान नगरश्री, चूरू में रविवार को पं. कुंज बिहारी शर्मा स्मृति साहित्य गोष्ठी की 185वीं कड़ी आयोजित हुई। अंचल के जाने-माने शायर बनवारीलाल शर्मा ‘खामोश’ की अध्यक्षता तथा प्रो. डॉ. सुरेन्द्र डी. सोनी के विशिष्ट सान्निध्य में आयोजित गोष्ठी में कवियों और साहित्यकारों ने कविता, गजल और राजस्थानी गीतों की प्रस्तुतियों से साहित्यिक रंग जमाया। श्रोताओं ने रचनाओं का उत्साहपूर्वक आनंद लिया और तालियों से रचनाकारों का उत्साह बढ़ाया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंगल व्यास भारती ने मां सरस्वती की वंदना ‘दो वरदान मात शारदे…’ से किया। इसके बाद युवा कवयित्री वर्षा चहरिया ने ‘ये किसको देखे कहां जाएं आंखें हमारी…’ रचना प्रस्तुत की। पिंटू शर्मा भारतीय ने ‘किस्से मुकम्मल के हजारों मिल जाएंगे तुम्हें…’ और ‘सूखा हो बाग तो लोग आना छोड़ देते हैं…’ सुनाकर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की। सुधीन्द्र शर्मा ‘सुधी’ ने ‘तेरे चेहरे की झुर्रियां, तेरे माथे की सलवटें…’ के माध्यम से भावनाओं को अभिव्यक्त किया।
विनीता स्वामी ‘विनोद’ ने बेटी के जन्म पर आधारित कविता ‘एक दिन मेरे घर में नन्ही खुशी आई…’ सुनाकर घर में बेटी के आगमन की खुशियों को शब्द दिए। अनिल कुमार ने राजस्थानी गीत ‘लागै चोखी मावड़ी…’, ‘हिवड़ै री कोरां माथै परिवार बसै अंग-अंग में…’ और ‘हुई पीर पराई रोना क्या…’ प्रस्तुत कर लोक संस्कृति और संवेदनाओं को स्वर दिया।
दीपक ‘कामिल’ ने गजल ‘और कितना हारना है जीतने की चाह में…’ सुनाई। डॉ. श्यामसुन्दर शर्मा ने ‘किसी ने फिर सुना दर्द के फसाने को…’ गीत और ‘भोळी-भोळी तू ग्वालण की छोरी…’ राजस्थानी रचना प्रस्तुत की। भगवती पारीक ने ‘जल म्यां है बानै मारणो पड़सी…’, ‘जाण्यों जीवन को मोल नहीं…’ तथा ‘मायड़ जद बैरण होई ज्यावै…’ जैसी रचनाओं से श्रोताओं को भावविभोर किया।
मुकेश शर्मा ‘मनमोजी’ ने ‘तुम्हारा जिक्र आता है जब…’ गजल प्रस्तुत की, जबकि अब्दुल मन्नान ने ‘जहर मैंने भी पीया…’, ‘इश्क कमसिन है…’ और ‘खुदा की सब रहमत है…’ सुनाकर वाहवाही लूटी। राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफिर’ ने ‘कभी-कभी मेरे दिल में…’ प्रस्तुत कर गोष्ठी में समां बांध दिया।
विशिष्ट अतिथि प्रो. डॉ. सुरेन्द्र डी. सोनी ने ‘नभ के आंगन में जो सजा है चांद, कि कोई चरखा है…’, ‘सागर की असीम छाती पर…’ और ‘लपक कर चांद पकड़ने वाले…’ जैसी रचनाएं प्रस्तुत कर श्रोताओं की खूब दाद बटोरी।
गोष्ठी के अध्यक्ष बनवारीलाल शर्मा ‘खामोश’ ने अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद ‘मैंने मांगा चन्द्रमा दिन ढलने के बाद…’, ‘वो जो कोई किस्सा था…’ तथा राजस्थानी गीत ‘कठै है नीं कबाड़ बाबू, रोट्यां को जुगाड़ है बाबू…’ प्रस्तुत किए। उनकी रचनाओं पर श्रोताओं ने तालियों के साथ उत्साह जताया।
कार्यक्रम का संचालन एडवोकेट रमेश सोनी ने किया। गोष्ठी में कविता, गजल और राजस्थानी गीतों के माध्यम से साहित्य, लोक संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के विविध रंग देखने को मिले।
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