दिल्ली में उलेमा और मदरसों से पास हुए छात्रों के अखिल भारतीय पांच दिवसीय सम्मेलन का आरंभ
वर्तमान समय के संदर्भ में मज़बूत इल्मी व फ़िक्री नेतृत्व तैयार करने पर ज़ोर
नई दिल्ली : जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के ‘शोबा-ए-उलेमा व मसाजिद’ के तत्वावधान में उलेमा और मदरसों से फ़ारिग़ हुए छात्रों के अखिल भारतीय पांच दिवसीय सम्मेलन का बुधवार को आरंभ हुआ, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से अलग-अलग मसलकों के उलेमा ने हिस्सा लिया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अमीर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि वर्तमान दौर में उम्मत-ए-मुस्लिमा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई चुनौतियों का सामना है। इतिहास गवाह है कि बड़ी चुनौतियां क़ौमों के लिए निर्णायक मोड़ साबित होती हैं। ऐसे अवसरों पर सही रास्ते का चुनाव तरक़्क़ी और बुलंदी की राह बनाता है।
उन्होंने कहा कि इस चरण में उलेमा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे उम्मत की ख़ामियों और ग़लतियों की इस्लाह, सही मार्गदर्शन और नई समस्याओं के समाधान की तलाश में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि उलेमा अपने अंदर इल्मी, फ़िक्री और तहक़ीक़ी स्वभाव पैदा करें, नए सवालों के जवाब खोजें और फ़िक़्ह के साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से भी परिचित हों।
सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि पश्चिमी दुनिया द्वारा प्रस्तुत व्यवस्था की हमारे बुज़ुर्ग लंबे समय से आलोचना करते रहे हैं। आज यूरोपीय देशों में भी वैकल्पिक व्यवस्था की ज़रूरत पर चर्चा हो रही है। ऐसे में उलेमा की ज़िम्मेदारी है कि वे इस्लामी शिक्षाओं के प्रकाश में एक व्यावहारिक वैकल्पिक व्यवस्था प्रस्तुत करें और उसकी रूपरेखा स्पष्ट करें। उन्होंने उम्मत के अंदर प्राथमिकताओं की चेतना जगाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि वर्तमान हालात में उम्मत के लिए अस्तित्व का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए मसलकी मतभेदों को पीछे रखकर सामूहिक रूप से इस्लाह और निर्माण के कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
अमीर-ए-जमात ने कहा कि उलेमा का नेतृत्व केवल मस्जिदों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें जीवन के सभी क्षेत्रों में मार्गदर्शन और नेतृत्व का कर्तव्य निभाना चाहिए। उनकी यह भी ज़िम्मेदारी है कि वे उम्मत को मानसिक भय और निराशा से सुरक्षित रखें, क्योंकि लगातार भय इंसान के शरीर को तो जीवित रखता है, लेकिन उसकी आत्मा और हौसले को कमज़ोर कर देता है। उलेमा को केवल समस्याएं बताने के बजाय उनके समाधान प्रस्तुत करने पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि उलेमा को दावत-ए-दीन के काम को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करना चाहिए और इस्लाम का संदेश ग़ैर-मुस्लिमों तक भी पहुंचाना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए टकराव के बजाय संवाद, आपसी बातचीत और समझ-बूझ का माहौल बनाना समय की महत्वपूर्ण ज़रूरत है।
डॉ. रज़ीउल इस्लाम नदवी, राष्ट्रीय सचिव जमात-ए-इस्लामी हिंद ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि विभिन्न मसलकों के उलेमा इस सम्मेलन में वर्तमान चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने, धार्मिक आवश्यकताओं को समझने और उनके समाधान खोजने के लिए एकत्र हुए हैं। उन्होंने कहा कि आज के दौर में उलेमा के लिए ज़रूरी है कि वे अपने समय की फ़िक्री, सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों से परिचित हों और बदलते हालात को समझें। साथ ही मसलकी मतभेदों के बावजूद आपसी सहयोग और साझा कार्य की भावना को बढ़ावा दें। उन्होंने आगे बताया कि सम्मेलन में 7 संवाद सत्र रखे गए हैं, ताकि विभिन्न विषयों के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया जा सके।
जमीयत अहले हदीस के अमीर मौलाना असग़र अली इमाम महदी सलफ़ी ने अपने भाषण में कहा कि आज हर पल नई चुनौतियों और संघर्ष का सामना है, जिनका मुक़ाबला ईमान और नेक अमल के ज़रिए किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हालात को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें अपना जायज़ा लेना चाहिए, जिसका सर्वोत्तम उदाहरण सहाबा-ए-किराम के दौर में मिलता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक प्रो. मोहसिन उस्मानी ने कहा कि वर्तमान हालात का हल अल्लाह तआला की मदद में है। अल्लाह की मदद तभी प्राप्त हो सकती है जब हम अपने जीवन को सृष्टि के उद्देश्य, यानी अल्लाह की इबादत के अनुसार ढालें।
जोधपुर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अख़्तर अल-वासे ने कहा कि हमें अक़ीदा और अक़ीदत के अंतर को समझना चाहिए। हमारा अक़ीदा क़ुरआन और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं पर आधारित है। नबी लोगों को हक़ की दावत देने आए थे, न कि मुसलमानों को काफ़िर ठहराने के लिए। उन्होंने कहा कि कुछ हलकों में तकफ़ीर की प्रवृत्ति पाई जाती है, जिसे समाप्त होना चाहिए। मतभेद के बावजूद दूसरों की अक़ीदत का सम्मान ज़रूरी है। उन्होंने आगे कहा कि अतीत में उम्मत को इससे भी अधिक कठिन हालात का सामना करना पड़ा है, लेकिन बाद में हालात बदले और सफलता मिली। इसलिए निराश होने के बजाय आशा और हौसले के साथ काम करना चाहिए।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना फ़ज़लुर्रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि नबियों को भी अपनी दावत के रास्ते में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपनी क़ौम तक उसकी भाषा में संदेश पहुंचाया। आज उलेमा को भी इसी तरीक़े-ए-दावत को अपनाना चाहिए।
सम्मेलन के दूसरे सत्र में जमात-ए-इस्लामी हिंद के नायब अमीर प्रो. सलीम इंजीनियर ने ‘दीन की राह में रुकावटें और उनका हल’ विषय पर बात की। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. क़ासिम रसूल इलियास ने राजनीतिक कमज़ोरी को समाप्त करने पर, जबकि ‘एपीसीआर’ के सचिव मुहम्मद वासिक़ नदीम ख़ान ने मस्जिदों और मदरसों के सामने आने वाली चुनौतियों पर विचार व्यक्त किए। अंत में सम्मेलन के आयोजक मौलाना मुहम्मद असअद फ़लाही ने प्रतिभागियों के सामने आवश्यक निर्देश पढ़कर सुनाए।
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