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सुप्रीम कोर्ट बोला- शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में न लें:मेट्रो-इंटरनेट बहाल करें; CJP प्रदर्शन में 45 मेट्रो स्टेशन बंद और 7000 लोग कस्टडी में लिए थे


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सुप्रीम कोर्ट बोला- शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में न लें:मेट्रो-इंटरनेट बहाल करें; CJP प्रदर्शन में 45 मेट्रो स्टेशन बंद और 7000 लोग कस्टडी में लिए थे

सुप्रीम कोर्ट बोला- शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में न लें:मेट्रो-इंटरनेट बहाल करें; CJP प्रदर्शन में 45 मेट्रो स्टेशन बंद और 7000 लोग कस्टडी में लिए थे

नई दिल्ली : दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान मेट्रो-ट्रेन सेवाएं बंद करने, इंटरनेट बाधित करने और लोगों को हिरासत में लेने से जुड़ी याचिकाओं पर रविवार को सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच ने सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए। इंटरनेट बाधित नहीं होना चाहिए और लोगों की आवाजाही नहीं रोकी जानी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया था कि प्रदर्शन के कारण दिल्ली मेट्रो और यहां आने वाली ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक न लगाई जाए। इसके बावजूद शनिवार को कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ। इस पर कोर्ट ने दिल्ली के अधिकारियों को नोटिस जारी कर मंगलवार तक जवाब मांगा।

इससे पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट ने CJP लीडर अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को रविवार सुबह करीब 10 बजे रिहा करने का आदेश दिया। तीनों 23 घंटे पुलिस कस्टडी में रहे।

दरअसल, कॉकरोच जनता पार्टी और लेफ्ट ने 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR के विरोध में प्रदर्शन बुलाया था। दिल्ली पुलिस ने इसकी इजाजत नहीं दी थी। इस दौरान पुलिस ने शहर में बैरिकेडिंग की थी। 45 मेट्रो स्टेशन बंद थे और 7 हजार से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया था।

2 याचिकाएं दाखिल की गई थीं

सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर 2 याचिकाएं दाखिल की गई थीं। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने इस पर सुनवाई की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष रखा।

वहीं, एडवोकेट कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी, संजय हेगड़े, शोएब आलम और शादान फरासत ने याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखा।

सुनवाई की 9 बड़ी बातें:

1. कपिल सिब्बल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शनकारियों को तय जगह तक पहुंचने से रोका गया। जस्टिस बागची ने कहा कि प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन उसका इस्तेमाल कानून के दायरे में होना चाहिए।

2. शोएब आलम ने कहा कि लोगों को प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस बागची ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोगों को पूरी तरह रोक दिया जाए।

3. वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि याचिका केवल कुछ नेताओं या सांसदों की हिरासत तक सीमित नहीं है। यह दिल्ली में कथित तौर पर हिरासत में लिए गए करीब 7,000 लोगों और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी है। मामला संविधान के संरक्षण से जुड़ा है।

4. शोएब आलम ने आरोप लगाया कि लोगों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने के लिए दिल्ली के बाहर से आने वालों को भी हिरासत में लिया गया। कुछ लोगों के घरों पर छापे मारे गए। कई लोगों को 24 घंटे से कम समय में छोड़ दिया गया, लेकिन इस तरह हिरासत में लेने के औचित्य पर सवाल है। ये याचिकाकर्ताओं के आरोप थे।

5. वकीलों ने आरोप लगाया कि कुछ पुलिसकर्मी बिना नेम बैज के थे और प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया गया। जस्टिस बागची ने कहा कि कानून के तहत अधिकारियों की जिम्मेदारियों के उल्लंघन और बल प्रयोग के आरोपों की जांच होगी। कानून-व्यवस्था के नाम पर पुलिस को नागरिकों के अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

6. केंद्र सरकार की ओर से मेहता ने कहा कि सभी मेट्रो स्टेशन और ट्रेनें सामान्य रूप से चल रही हैं तथा इंटरनेट सेवा बहाल हो चुकी है। उन्होंने बताया कि 303 में से 45 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए थे, लेकिन शनिवार रात 10 बजे तक सभी स्टेशन खोल दिए गए थे।

7. वकीलों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आसपास धारा 163 लागू होने के बोर्ड लगे थे और बैरिकेडिंग के कारण अदालत तक पहुंचने में परेशानी हो रही थी। मेहता ने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी लेकर बताना होगा। जस्टिस बागची ने कहा कि यदि वकीलों को प्रतिबंधों की जानकारी ही नहीं दी गई, तो यह आदेश को चुनौती देने का आधार हो सकता है। कोर्ट ने बोर्ड हटाने का निर्देश दिया।

8. एक वकील ने कहा कि कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के बजाय उनके मोबाइल फोन जब्त किए गए हैं। फोन में संवेदनशील जानकारी होने की बात उठाते हुए उन्हें लौटाने की मांग की गई। कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए आवेदन दाखिल करने को कहा।

9. जस्टिस बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का दायित्व है कि अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को रोके। जस्टिस वी. मोहना ने भी प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण रहने और उकसावे से बचने की अपील की। कोर्ट ने अधिकारियों को कथित हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर जवाब देने का निर्देश दिया। सभी संबंधित मामलों पर मंगलवार को एक साथ सुनवाई होगी।

दिल्ली में लोगों की आवाजाही कानून के मुताबिक सुचारू रूप से जारी रहनी चाहिए। कानून में तय प्रक्रिया के बिना किसी को हिरासत में नहीं लिया जाए। खासकर उन लोगों को जो शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। – सुप्रीम कोर्ट

शुरुआत में 57 स्टेशन बंद करने का प्रस्ताव था, जबकि बाद में 45 स्टेशन बंद किए गए। अगर रूट के बीच के स्टेशन बंद हों और दोनों छोर के स्टेशन खुले रहें, तो यात्री मेट्रो का इस्तेमाल कैसे कर पाएंगे। – सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को मामले में सुनवाई की थी, 4 बातें…

  • आम लोगों की सुविधा: आम नागरिकों को बेवजह परेशानी नहीं होनी चाहिए, हम बस इतना ही चाहते हैं।
  • सुरक्षा बनाम अधिकार: रेलवे और मेट्रो स्टेशनों पर सीसीटीवी कैमरे हैं और सरकार के पास सुरक्षा के दूसरे साधन भी हैं। आप उनका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन आम नागरिकों को भी स्टेशनों पर जाने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करने का पूरा हक है।
  • सख्त टिप्पणी: “क्या आप मक्खी को मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करेंगे?”
  • प्रदर्शन स्थल: जंतर-मंतर बहुत छोटी जगह है, प्रदर्शन के लिए किसी बड़ी जगह पर विचार किया जाना चाहिए।

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