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सीकर में 72.21% मतदान ने बढ़ाई सियासी धड़कनें, निर्दलीय बन सकते हैं किंगमेकर


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सीकर में 72.21% मतदान ने बढ़ाई सियासी धड़कनें, निर्दलीय बन सकते हैं किंगमेकर

2019 के मुकाबले 1.13 फीसदी ज्यादा वोटिंग; 64 वार्डों में 262 प्रत्याशियों का भाग्य EVM में बंद, भाजपा-कांग्रेस ने शुरू की बाड़ाबंदी की कवायद

सीकर : नगर परिषद चुनाव में मतदान समाप्त होने के साथ ही अब शहर की सरकार बनाने की सियासी कवायद तेज हो गई है। 64 वार्डों में मैदान में उतरे 262 प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में बंद हो चुका है। सीकर में इस बार 72.21 प्रतिशत मतदान हुआ, जो वर्ष 2019 के मुकाबले 1.13 प्रतिशत अधिक है।

मतदान प्रतिशत बढ़ने के बाद कांग्रेस के बढ़त बनाने के कयास लगाए जा रहे हैं, जबकि भाजपा भी पिछली स्थिति के मुकाबले अपनी सीटें बढ़ने की उम्मीद लगाए बैठी है। मुकाबला करीबी रहने की स्थिति में निर्दलीय पार्षद बोर्ड बनाने में किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं।

2019 के मुकाबले बढ़ी वोटिंग, 2014 का रिकॉर्ड बरकरार

सीकर में इस बार 2019 के 71.08 प्रतिशत मतदान के मुकाबले 1.13 फीसदी अधिक वोट पड़े। हालांकि, वर्ष 2014 में हुए नगर परिषद चुनाव का 74 प्रतिशत मतदान अब भी सबसे अधिक रहा है।

वर्ष मतदान प्रतिशत
2004 61.76%
2009 66.31%
2014 74.00%
2019 71.08%
2026 72.21%

खास बात यह रही कि SIR के विरोध के चलते इस बार मतदान कम रहने के कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन मतदाताओं के उत्साह ने इन अनुमानों को उलट दिया।

मतदान खत्म होते ही शुरू हुई ‘बाड़ाबंदी’ की तैयारी

मतदान के साथ ही भाजपा और कांग्रेस दोनों ने बोर्ड बनाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। सभापति का पद इस बार अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में महिला पार्षदों के साथ उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों की भूमिका भी अहम होगी। कांग्रेस की ओर से विधायक राजेंद्र पारीक और जिलाध्यक्ष सुनीता गठाला मोर्चा संभाल रहे हैं। वहीं भाजपा की रणनीति में पूर्व विधायक रतनलाल जलधारी और जिलाध्यक्ष मनोज बाटड़ सक्रिय बताए जा रहे हैं। कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों से संपर्क साधना शुरू कर दिया है। वहीं भाजपा की ओर से भी अपने प्रत्याशियों को एकजुट रखने की कवायद शुरू होने की चर्चा है। इसके साथ ही निर्दलीय प्रत्याशियों से संपर्क की अटकलें भी तेज हो गई हैं।

निर्दलीय पार्षदों पर टिकी बोर्ड की चाबी?

स्थानीय चुनावी आकलन में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीटों का अंतर बहुत ज्यादा रहने की संभावना नहीं जताई जा रही। ऐसे में यदि दोनों प्रमुख दल बहुमत से दूर रहते हैं तो निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका अचानक सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है। यही वजह है कि मतदान के बाद राजनीतिक दलों की नजर उन वार्डों पर है जहां निर्दलीय प्रत्याशियों ने मजबूत मुकाबला किया है। हालांकि वास्तविक स्थिति 14 सितंबर की मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगी।

सीकर में कांग्रेस का रहा है दबदबा

सीकर नगर परिषद के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस का दबदबा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1994 से अब तक अधिकांश बोर्ड कांग्रेस के रहे हैं। वर्ष 2014 में उपचुनाव के दौरान भाजपा की राजेश्वरी सैनी सभापति बनी थीं, जबकि बाद में इसी कार्यकाल में कांग्रेस के जीवण खां सभापति बने। वर्ष 2019 में भी जीवण खां सभापति निर्वाचित हुए।

वर्ष सभापति पार्टी
1994 सलमा शेख कांग्रेस
1999 हनीफ खत्री कांग्रेस
2004 हनीफ खत्री कांग्रेस
2009 सलमा शेख कांग्रेस
2014 राजेश्वरी सैनी (उपचुनाव) भाजपा
2014 जीवण खां कांग्रेस
2019 जीवण खां कांग्रेस

सभापति पद के लिए लॉबिंग तेज

मतदान समाप्त होते ही सभापति पद के संभावित दावेदारों को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कांग्रेस खेमे में वार्ड 15 से खतीजा बानो, वार्ड 19 से सूबे दौलत और वार्ड 40 से किरण चौधरी के नाम चर्चा में बताए जा रहे हैं। वहीं भाजपा खेमे में वार्ड 28 से कंचन खड़ोलिया, वार्ड 46 से मोनिका सैनी और वार्ड 48 से सरोज सैनी के नाम चर्चा में हैं। वार्ड 50 से भाजपा प्रत्याशी सोनल चौधरी का नाम भी संभावित दावेदारों में लिए जाने की बात सामने आ रही है। हालांकि, ये सभी राजनीतिक चर्चाएं और संभावित दावेदारों के नाम हैं। अंतिम तस्वीर चुनाव परिणाम और दलों के आधिकारिक निर्णय के बाद ही सामने आएगी।

जातीय समीकरण भी रहेंगे अहम

सभापति पद के चुनाव में जातीय और स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। परिसीमन के बाद कुछ ग्रामीण क्षेत्र भी नगर परिषद में शामिल हुए हैं, ऐसे में विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संतुलन साधने की चुनौती दोनों प्रमुख दलों के सामने रहेगी।

राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस की ओर से मुस्लिम समाज और भाजपा की ओर से माली समाज से सभापति बनाए जाने के कयास लगाए जा रहे हैं। वहीं जाट समाज की संभावित भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा रहा। इन समीकरणों पर अंतिम फैसला परिणाम आने और पार्षदों की संख्या स्पष्ट होने के बाद ही संभव होगा।

14 को खुलेगा EVM का पिटारा

अब सभी की नजर 14 सितंबर को होने वाली मतगणना पर है। इसके बाद 21 सितंबर को सभापति और 22 सितंबर को उपसभापति का चुनाव होगा। फिलहाल 72.21 प्रतिशत मतदान ने दोनों प्रमुख दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। किसके पक्ष में ‘मौन मतदाता’ गया और निर्दलीय किसका खेल बनाएंगे या बिगाड़ेंगे—इसका जवाब 14 सितंबर को EVM खुलने के साथ मिलेगा।

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