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बिज्जी ने शब्द की महत्ता को समझा और शब्द के साथ अजर-अमर हो गए: डॉ. घासीराम वर्मा


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बिज्जी ने शब्द की महत्ता को समझा और शब्द के साथ अजर-अमर हो गए: डॉ. घासीराम वर्मा

विजयदान देथा ‘बिज्जी’ शताब्दी समारोह का भव्य उद्घाटन, साहित्यकारों ने याद किया योगदान

जनमानस शेखावाटी सवांददाता : मोहम्मद अली पठान

चूरू : प्रसिद्ध राजस्थानी साहित्यकार विजयदान देथा ‘बिज्जी’ के शताब्दी समारोह का भव्य शुभारंभ शताब्दी पुरुष डॉ. घासीराम वर्मा ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. कल्याणसिंह शेखावत ने की, जबकि पद्मश्री डॉ. चन्द्रप्रकाश देवल ने बिज्जी के साहित्य पर बीज भाषण दिया। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. सत्यनारायण एवं श्याम महर्षि मंचासीन रहे।

संस्थान के अध्यक्ष डॉ. दुलाराम सहारण ने अतिथियों का स्वागत करते हुए समारोह की रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. उम्मेद गोठवाल ने किया।

उद्घाटन अवसर पर डॉ. घासीराम वर्मा ने कहा कि बिज्जी ने शब्द की महत्ता को समझा और शब्द के साथ स्वयं भी अजर-अमर हो गए। वे विश्व स्तर के साहित्यकार थे। उनका साहित्य अपनी लोक जड़ों से जुड़ा होने के साथ-साथ सार्वभौमिक संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है।

‘आधुनिक राजस्थानी के पहले गद्य पुरुष थे बिज्जी’

पद्मश्री डॉ. चन्द्रप्रकाश देवल ने बिज्जी के साहित्य पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि बिज्जी आधुनिक राजस्थानी के पहले गद्य पुरुष थे। कहानी कैसे लिखी जाती है, यह बिज्जी से सीखा जाना चाहिए। उन्होंने सीमाओं का अतिक्रमण कर अखिल भारतीय स्तर पर राजस्थानी भाषा और साहित्य को पहचान दिलाई।

उन्होंने कहा कि कथा लेखन, संस्थान संचालन, संपादन और भाषा संस्कार सहित विभिन्न क्षेत्रों में बिज्जी का योगदान उल्लेखनीय रहा।श्याम महर्षि ने कहा कि बिज्जी हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित होना न केवल बिज्जी बल्कि राजस्थानी साहित्य के वैश्विक कद को भी दर्शाता है।

वहीं डॉ. सत्यनारायण ने बिज्जी को याद करते हुए उन्हें ‘प्रोत्साहन पुरुष’ बताया। उन्होंने कहा कि बिज्जी के प्रोत्साहन से अनेक युवा लेखकों को साहित्य में पहचान मिली। इस दौरान उन्होंने बिज्जी के साथ बिताए दिनों के कई आत्मीय संस्मरण भी साझा किए।

बिज्जी के रचना संसार पर हुई चर्चा

उद्घाटन सत्र के बाद दूसरे सत्र में ‘बिज्जी और उनका रचना संसार’ विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता राजाराम भादू ने की। फारूक अफरीदी, मालचंद तिवाड़ी, विनोद भारद्वाज, बुलाकी शर्मा, राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफिर’, महेन्द्र नेह, सत्येन्द्र चारण एवं दीनदयाल शर्मा ने बिज्जी के रचना संसार के विभिन्न पक्षों पर विचार रखे। संचालन डॉ. हरिमोहन सारस्वत ने किया।

तीसरे सत्र में ‘बिज्जी के लेखन में लोक’ विषय पर विचार गोष्ठी हुई, जिसकी अध्यक्षता नंद भारद्वाज ने की। रामस्वरूप किसान, गौरीशंकर प्रजापत, डॉ. कृष्ण जाखड़, डॉ. कालू खां देशवाली एवं मोहन सोनी ‘चक्र’ ने बिज्जी के साहित्य में लोक तत्व और उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति पर विचार साझा किए। संचालन राजूराम बिजारनिया ने किया।

चौथे सत्र में ‘विविध रूपा बिज्जी’ विषय पर गोष्ठी आयोजित हुई। अध्यक्षता डॉ. मंगत बादल ने की। डॉ. मदन सैनी, डॉ. सत्यनारायण सोनी, राजेन्द्र कसवा, राजेन्द्र जोशी, उमा सुशील बछावत, विश्वनाथ भाटी एवं डॉ. हाकम अली नागरा ने बिज्जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के विविध पक्षों पर विचार व्यक्त किए। संचालन डॉ. घनश्याम नाथ कच्छावा ने किया।

समारोह के विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने बिज्जी के साहित्य, लोक चेतना, भाषा संस्कार, कथा कला और उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को याद किया। वक्ताओं ने कहा कि विजयदान देथा ‘बिज्जी’ राजस्थानी साहित्य की ऐसी विराट प्रतिभा थे, जिन्होंने अपनी रचनात्मकता के माध्यम से राजस्थानी भाषा और साहित्य को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई।

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