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एक गांव में 17 शहीद, प्रथम विश्व-युद्ध से कारगिल तक:सेना में जाना यहां है परंपरा, चार-पांच पीढ़ियों से बन रहे फौजी


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एक गांव में 17 शहीद, प्रथम विश्व-युद्ध से कारगिल तक:सेना में जाना यहां है परंपरा, चार-पांच पीढ़ियों से बन रहे फौजी

एक गांव में 17 शहीद, प्रथम विश्व-युद्ध से कारगिल तक:सेना में जाना यहां है परंपरा, चार-पांच पीढ़ियों से बन रहे फौजी

झुंझुनूं : झुंझुनूं से करीब 15 किलोमीटर दूर धनूरी गांव में करीब 4 से 4.5 हजार लोग रहते हैं। मुस्लिम बाहुल्य इस गांव ने प्रथम विश्व युद्ध से लेकर कारगिल युद्ध तक देश को 17 शहीद दिए हैं। आज भी गांव के करीब 300 जवान भारतीय सेना में सेवा दे रहे हैं, जबकि 250 से ज्यादा पूर्व सैनिक पेंशनधारक हैं। अग्निवीर योजना में हाल ही में 12 युवाओं का चयन हुआ है और गांव के पूर्व सैनिक रोजाना युवाओं को सेना भर्ती की तैयारी कराते हैं।

प्रथम विश्व युद्ध से कारगिल तक शहादत

धनूरी को राजस्थान का सबसे ज्यादा शहीद देने वाला गांव माना जाता है। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में मोहम्मद इलियास खान, मोहम्मद सफी खान और निजामुद्दीन खान शहीद हुए थे। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में मेजर महमूद हसन खान, जाफर अली खान और कुतुबुद्दीन खान ने सर्वोच्च बलिदान दिया। कारगिल युद्ध में मोहम्मद रमजान खान ने वीरता दिखाई और शहादत दी। इससे पहले प्रथम विश्व युद्ध में करीम बख्स खान, करीम खान और अजीमुद्दीन खान वीरगति को प्राप्त हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध में ताज मोहम्मद खान और इमाम अली खान भी शहीद हुए।

राजस्थान के झुंझुनूं जिले से करीब 15 किलोमीटर दूर बसा गांव धनूरी।
राजस्थान के झुंझुनूं जिले से करीब 15 किलोमीटर दूर बसा गांव धनूरी।

सेना में जाना यहां परंपरा

धनूरी में कई परिवार ऐसे हैं, जहां चार और पांच पीढ़ियां लगातार भारतीय सेना में सेवा दे रही हैं। गांव में सेना की वर्दी पहनना सम्मान, गर्व और विरासत माना जाता है। सेवानिवृत्त सूबेदार आमीन अली का परिवार इसकी मिसाल है। उनके परदादा से शुरू हुई देश सेवा की परंपरा पांचवीं पीढ़ी तक पहुंच चुकी है। उनके दोनों बेटे भारतीय सेना में सीमा पर तैनात हैं। एक कारगिल-द्रास सेक्टर में और दूसरा कुपवाड़ा क्षेत्र में देश की रक्षा कर रहा है। शहीद कुतुबुद्दीन खान का परिवार भी चार पीढ़ियों से सेना में सेवा दे रहा है। गांव के कई अन्य परिवारों में भी दादा, पिता, बेटे और पोते लगातार सेना में भर्ती होकर देश सेवा कर रहे हैं।

सेवानिवृत्त सूबेदार आमीन अली के परिवार की पांच पीढ़ी फौज में है।
सेवानिवृत्त सूबेदार आमीन अली के परिवार की पांच पीढ़ी फौज में है।

आठ भाइयों में सात सेना में भर्ती हुए

शहीद मोहम्मद इलियास खान का परिवार गांव की सैन्य परंपरा का एक बड़ा उदाहरण है। आठ भाइयों में से सात भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1962 के युद्ध में मोहम्मद इलियास खान शहीद हो गए। इसके बावजूद परिवार की देश सेवा की परंपरा नहीं टूटी। उनके अन्य भाइयों ने भी सेना में रहकर देश की सेवा की।

8 गोलियां लगीं, फिर भी टाइगर हिल पहुंचे

गांव के पूर्व सैनिक इकराज अहमद ने अपने सैन्य जीवन का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि शरीर में आठ गोलियां लगने और स्वास्थ्य कारणों से अनुमति नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। कारगिल युद्ध के दौरान वे पैदल टाइगर हिल क्षेत्र तक पहुंचे और अपना दायित्व निभाया। इकराज अहमद ने कहा कि कायमखानी समाज हमेशा देश के नाम, नमक और निशान के लिए खड़ा रहा है और आगे भी खड़ा रहेगा।

पूर्व सैनिक इकराज अहमद।
पूर्व सैनिक इकराज अहमद।

रोजाना युवा करते हैं सेना भर्ती की तैयारी

धनूरी में सेना भर्ती युवाओं के लिए सपना ही नहीं, बल्कि तैयारी का हिस्सा है। गांव के वरिष्ठ पूर्व सैनिक अली हसन खान, कैप्टन टीपू सुल्तान और अन्य पूर्व सैनिक युवाओं को रोजाना प्रशिक्षण देते हैं। पूर्व सैनिक युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देते हैं। यही वजह है कि हर साल गांव के कई युवा सेना में चयनित हो रहे हैं। पूर्व सैनिकों का कहना है कि आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह देश सेवा करती रहें, यही उनकी सबसे बड़ी इच्छा है।

पिता शहीद हुए तो 15 महीने का था बेटा

शहीद मोहम्मद इलियास खान के बेटे अब्दुल हमीद ने बताया कि 21 अक्टूबर 1962 को जब उनके पिता शहीद हुए, तब वे महज 15 महीने के थे। उन्होंने बताया कि गांव में इतने शहीद होने की एक वजह यह है कि बचपन से ही बच्चों को सिखाया जाता है कि कायमखानी कभी पीठ दिखाकर नहीं भागता।

वरिष्ठ पूर्व सैनिक अली हसन खान,पूर्व सैनिक इकराज अहमद और शाहिद मोहम्मद इलियास खा के पोते साकिब हुसैन।
वरिष्ठ पूर्व सैनिक अली हसन खान,पूर्व सैनिक इकराज अहमद और शाहिद मोहम्मद इलियास खा के पोते साकिब हुसैन।

सेना में वर्तमान और पूर्व सैनिकों की संख्या

शहीद मोहम्मद इलियास खान के पोते और झुंझुनूं कलेक्ट्रेट में सहायक प्रशासनिक अधिकारी साकिब हुसैन ने बताया कि वर्तमान में गांव के 250 से ज्यादा जवान सेना में तैनात हैं और करीब 300 सेवानिवृत्त हैं। वहीं गांव से जुड़ी अन्य जानकारी के अनुसार करीब 300 जवान भारतीय सेना में सेवाएं दे रहे हैं और 250 से अधिक पूर्व सैनिक पेंशनधारक हैं।

हाल ही में अग्निवीर भर्ती में गांव के 12 बच्चों का चयन हुआ है। इसके अलावा 30 बच्चे लिखित परीक्षा पास कर फिजिकल की तैयारी कर रहे हैं। गांव के इस सैन्य इतिहास का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रोजाना 50 से 100 युवा सुबह-शाम सेना भर्ती की तैयारी करते हैं।

शादी के एक साल बाद विधवा हुईं मुमताज

देश के लिए त्याग की कहानियां भी धनूरी में हैं। शहीद जाफर खान की वीरांगना मुमताज बानो की शादी के महज एक साल बाद ही उनके पति शहीद हो गए थे।

शहीद मोहम्मद इलियास खा के बेटे अब्दुल हमीद , हाथ में अपने पिता की तस्वीर लिए हुए।
शहीद मोहम्मद इलियास खा के बेटे अब्दुल हमीद , हाथ में अपने पिता की तस्वीर लिए हुए।

गांव से बाहर जाते हैं तो मिलता है अलग सम्मान

कारगिल योद्धा परवेज फौजी ने बताया कि जब वे गांव से बाहर कहीं जाते हैं और लोग सम्मान से पूछते हैं, ‘आप उसी गांव से हैं न, जहां सबसे ज्यादा शहीद और फौजी हैं’, तो वह पल उनके लिए सबसे ज्यादा गर्व का होता है। उन्होंने बताया कि गांव में कई ऐसे परिवार हैं, जिनकी तीन से पांच पीढ़ियां लगातार सेना में रहकर देश की सेवा कर रही हैं।

मेजर एमएच खान के नाम पर स्कूल

शहीद मेजर एम.एच. खान के भाई मोहम्मद हफीज ने बताया कि गांव में उनके भाई के नाम पर स्कूल बना हुआ है। उन्होंने बताया कि मेजर खान को इमरजेंसी में बड़ी जिम्मेदारी मिली थी। उनकी शहादत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं उनकी वीरांगना को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया था। मेजर एम.एच. खान की वीरांगना ने राष्ट्रपति से वीर चक्र प्राप्त किया था।

शहीद जाफर खान की वीरांगना मुमताज बानो।
शहीद जाफर खान की वीरांगना मुमताज बानो।

3 साल की उम्र में पिता का साया उठा

1997 में जम्मू-कश्मीर के ऑपरेशन में शहीद हुए मोहम्मद रमजान की वीरांगना अल्हम्दु बानो ने बताया कि शादी के 10 साल बाद उनके पति शहीद हुए थे। उन्होंने बताया कि उस समय संचार माध्यम नहीं होने के कारण पार्थिव शरीर घर आने पर ही उन्हें पति की शहादत की खबर मिली थी। शहीद मोहम्मद रमजान के बेटे इरफान खान ने बताया, “जब पिता शहीद हुए, तब मैं 3 साल का था, बहन 5 की और छोटा भाई मां के गर्भ में था।”

अग्निवीर भर्ती में भी गांव के युवाओं का चयन

सूबेदार मेजर (ऑर्डिनरी कैप्टन) अली हसन खान ने बताया कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में गांव के 8 जवान शहीद हुए थे। उन्होंने बताया कि आजादी के बाद भारत के हर युद्ध में धनूरी का सैनिक लड़ा और शहीद हुआ। हाल ही में अग्निवीर योजना के तहत भी गांव के 12 युवाओं का चयन हुआ है। इसके अलावा दर्जनों युवा सेना भर्ती की तैयारी कर रहे हैं।

शहीद मेजर एम.एच. खान।
शहीद मेजर एम.एच. खान।

धनूरी की खासियत

  • गांव की आबादी करीब 4 से 4.5 हजार है।
  • गांव से अब तक 17 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया है।
  • प्रथम विश्व युद्ध से लेकर कारगिल युद्ध तक गांव के सैनिकों ने देश के लिए योगदान दिया।
  • अलग-अलग उपलब्ध जानकारी के अनुसार गांव के 200 से 250 या 250 से ज्यादा जवान सेना में तैनात बताए गए हैं।
  • करीब 250 से 300 पूर्व सैनिकों की जानकारी दी गई है।
  • कई परिवारों की चार और पांच पीढ़ियां सेना में सेवा कर रही हैं।
  • अग्निवीर योजना में भी गांव के युवाओं का चयन हुआ है।
  • हाल ही में 12 युवाओं का अग्निवीर योजना में चयन हुआ है।
  • 30 युवा लिखित परीक्षा पास कर फिजिकल की तैयारी कर रहे हैं।
  • रोजाना 50 से 100 युवा सुबह-शाम सेना भर्ती की तैयारी करते हैं।
उनकी शहादत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं उनकी वीरांगना को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया था और वीरांगना ने राष्ट्रपति से 'वीर चक्र' प्राप्त किया था।
उनकी शहादत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं उनकी वीरांगना को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया था और वीरांगना ने राष्ट्रपति से ‘वीर चक्र’ प्राप्त किया था।

देश सेवा की परंपरा जारी

धनूरी में सेना केवल नौकरी नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए सम्मान, संस्कार और विरासत है। प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आज तक गांव के लोगों ने सेना में सेवा की है। पूर्व सैनिक युवाओं को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दे रहे हैं, जबकि नई पीढ़ी भी सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने की तैयारी कर रही है। गांव के पूर्व सैनिकों का कहना है कि आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह देश सेवा करती रहें, यही उनकी सबसे बड़ी इच्छा है।

शहीद मोहम्मद रमजान की वीरांगना अल्हम्दु बानो
शहीद मोहम्मद रमजान की वीरांगना अल्हम्दु बानो

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