ताज़ा तोड़ी या उखड़ी हुई दवा का प्रयोग सौं प्रतिशत कारगर : डॉ लियाकत अली मंसूरी
ताज़ा तोड़ी या उखड़ी हुई दवा का प्रयोग सौं प्रतिशत कारगर : डॉ लियाकत अली मंसूरी
यूनानी चिकित्सा में दवाइयों को खनिज, धातु और हर्बल जड़ी बूटियों से बनाई जाती हैं जिसमें पौधों के विभिन्न अंगों का उपयोग करते हैं जैसे कि फल, फूल, बीज, पत्तियाँ और जड़ें। यूनानी दवाइयों में जड़ी बूटियों को जिन्दा और मृत पदार्थों के रूप में इस्तेमाल करते हैं। दवाओं के रूप में प्रयोग की हुई जड़ी बूटियों को यदि ताज़ा तोड़ कर या ताज़ा उखड़ी जड़ों का तुरन्त प्रयोग किया जाता हैं तो वह सौं प्रतिशत कारगर होती हैं क्योंकि उनमें सभी तत्व जिन्दा रूप में होते हैं इसलिए इन्हें “जिन्दा दवा” या “जिन्दा तत्व” के रूप में जानी जाती हैं।
ठीक उसी प्रकार से हर्बल दवाओं को सूखा कर प्रयोग की जानी वाली जड़ी बूटियों को “मृत दवा” के रूप में जानी जाती है जो कि ये जड़ी बूटियाँ रोगों में उतना असर नहीं दिखा पाती है क्योंकि उनमें जिन्दा प्राकृतिक तत्व मर चुके होते हैं या उपस्थित नहीं होते हैं। लेकिन इन्हें ज्यादा दिनों तक संरक्षित रखने के तरीकों के आधार पर रख कर काम ली जाती हैं।
प्राचीन काल में यूनानी चिकित्सा के हकीम लोग अक्सर मरीज़ आने पर ही जिन्दा ताज़ा जड़ी बूटियों या जड़ों को तोड़ कर या उखाड़ कर उनसे तुरन्त शरबत, रस, अर्क या काढ़ा के रूप में तैयार किया करते थे और मरीज़ों को दिया करते हैं जिनका असर तुरन्त होता था। कुछ दवाइयों को सुखाकर दवाओं को चूर्ण के रूप में, शर्बत या अर्क के रूप में बना कर रखें जाते थे ताकि बेमौसम में उन दवाओं का उपयोग कर रोगियों को दे सकें ।
हर्बल दवाओं के ताज़ा होने और सूखने पर उनके रासायनिक गुणों में निम्न मुख्य अंतर आता है :
- संरचना और सांद्रता ताज़ा जड़ी-बूटी (शर्बत या अर्क) ताज़ा गीली जड़ी बूटी को निचोड़ कर उसका रस या अर्क निकाला जाता हैं। इसमें लगभग 70-80% पानी और प्राकृतिक रस मौजूद होता है । शरबत बनाने के लिए इसे शहद या चीनी के साथ उबाला या मिश्रित किया जाता है, जो इसे मीठा और स्वादिष्ट बनाता है लेकिन इसे उसी दिन लेना होता हैं। जबकि सूखी जड़ी-बूटी को सुखाने की प्रक्रिया में पौधे का सारा पानी भाप बनकर उड़ जाता है। इससे जड़ी-बूटी सिकुड़ जाती है और उसके सक्रिय औषधीय गुण व तत्व अत्यधिक सांद्र हो जाते हैं और प्राकृतिक रस की कमी होने से औषधीय गुणों में कमी आती हैं लेकिन अधिक सान्द्रता की वजह से कम मात्रा में प्रयोग करनी होती हैं।
- शेल्फ-लाइफ (भंडारण और जीवनकाल)ताज़ा जड़ी-बूटी से शरबत बनाना : चीनी या शहद की मौजूदगी के कारण हर्बल सिरप का जीवनकाल 3 से 12 महीने तक होती है। भण्डारण से ताज़ा पत्तियां बिना प्रोसेस किए कुछ ही दिनों में खराब हो जाती हैं और उनके प्राकृतिक गुण बदल जाते हैं। जबकि सूखी जड़ी-बूटी में नमी न होने के कारण सूखी और पिसी हुई जड़ी-बूटियां एयर-टाइट कंटेनर में 1 से 3 साल तक सुरक्षित रहती हैं।
- स्वाद और उपयोगिता ताज़ा जड़ी-बूटी (शरबत) स्वाद में अधिक सौम्य और मीठा होता है, जिसे बच्चे आसानी से खा लेते हैं। यह मुख्य रूप से खांसी, गले की खराश और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए उपयोग किया होता है। जबकि सूखी जड़ी-बूटी में स्वाद अधिक कड़वा, तीखा और मिट्टी जैसा हो सकता है। इसे आमतौर पर पानी के साथ काढ़े के रूप में या शहद के साथ सीधे फांकी (चूर्ण) के रूप में लिया जाता है।
- रासायनिक प्रभाव ताज़ा जड़ी-बूटी कुछ नाजुक फाइटोकेमिकल्स ताज़ी अवस्था में ही अपना पूरा असर दिखाते हैं। जबकि सूखी जड़ी-बूटी में सूखी जड़ी-बूटियों का प्रभाव आमतौर पर ताज़े की तुलना में 3 गुना अधिक शक्तिशाली होता है लेकिन कुछ प्राकृतिक रस और फाइटोकैमिकल का अभाव रहता हैं, इसलिए दवाओं में इसकी कम मात्रा ही पर्याप्त होती है।
डॉ लियाकत अली मंसूरी, यूनानी चिकित्सक, सवाई मानसिंह अस्पताल, जयपुर (राज़.)
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