बदनगढ़ में अद्भुत आस्था का संगम: पीपल–शालिग्राम विवाह बना आस्था और पर्यावरण का संदेश
बदनगढ़ में अद्भुत आस्था का संगम: पीपल–शालिग्राम विवाह बना आस्था और पर्यावरण का संदेश
झुंझुनूं : बदनगढ़ में एक अनूठा और ऐतिहासिक आयोजन देखने को मिला, जहां पीपल वृक्ष और शालिग्राम जी का विधिवत विवाह पूरे रीति-रिवाजों के साथ सम्पन्न हुआ। गाजे-बाजे, बारात और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुए इस आयोजन में हजारों ग्रामीणों ने भाग लेकर इसे अविस्मरणीय बना दिया। लगभग 70 वर्ष बाद दोबारा हुए इस आयोजन ने गांव की सांस्कृतिक परंपरा को नई पीढ़ी के सामने जीवंत कर दिया।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
कार्यक्रम के मुख्य यजमान ओमप्रकाश शर्मा व उनकी पत्नी सरोज शर्मा रहे। उन्होंने बताया कि यह पीपल वृक्ष उनके पिता स्व. हेमराज शर्मा द्वारा लगाया गया था और उनकी इच्छा थी कि वृक्ष बड़ा होने पर उसका विवाह शालिग्राम जी से कराया जाए। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है पेड़-पौधों को देवतुल्य मानकर उनकी रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है।

विवाह की रस्में बनी आकर्षण का केंद्र
इस अनूठे विवाह में पारंपरिक हिंदू विवाह की सभी रस्में निभाई गईं-भात, बारात स्वागत, वरमाला, गणेश पूजन, मंडप प्रवेश, कन्यादान, सात फेरे और विदाई। महिलाओं ने मंगल गीत गाए, वहीं युवाओं ने बारात में नृत्य कर माहौल को उत्सवमय बना दिया।
पूरे गांव की सहभागिता
गांव का आधा हिस्सा बाराती बना तो आधे गांव ने स्वागत की जिम्मेदारी संभाली। आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। पूरा बदनगढ़ एक विशाल विवाह समारोह में तब्दील हो गया।
बुजुर्गों का उत्साह और परंपरा का संबल
बुजुर्गों ने आयोजन की जिम्मेदारी संभालते हुए आतिशबाजी और व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाई। पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीणों ने इस आयोजन को और भी जीवंत बना दिया।

वैदिक विधि से सम्पन्न हुआ आयोजन
विवाह समारोह को डॉ. कैलाश चतुर्वेदी (प्रधान आचार्य), पंडित यशपाल शास्त्री, कुलदीप शास्त्री और दीपक शास्त्री के सानिध्य में विधिवत सम्पन्न कराया गया। मंत्रोच्चार से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
समाज के लिए प्रेरणा
इस अवसर पर जनप्रतिनिधियों व गणमान्य लोगों ने इसे भारतीय संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि वे प्रकृति की रक्षा करेंगे और आने वाली पीढ़ी को भी इस दिशा में प्रेरित करेंगे। यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का सशक्त संदेश बनकर उभरा।
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