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क्या दलबदलू नेताओं के लिए वफादारी, आपके अपनों से ज्यादा जरूरी है?


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क्या दलबदलू नेताओं के लिए वफादारी, आपके अपनों से ज्यादा जरूरी है?

क्या दलबदलू नेताओं के लिए वफादारी, आपके अपनों से ज्यादा जरूरी है?

आज के राजनीतिक परिदृश्य में ‘दलबदल’ एक अत्यंत सामान्य प्रक्रिया बन चुका है। सुबह जिस पार्टी की विचारधारा के लिए गला फाड़कर नारे लगाए जाते हैं, शाम ढलते-ढलते वही नेता दूसरी विचारधारा की टोपी पहने मुस्कुराता नजर आता है। नेताओं के लिए विचारधारा का मोल आज उन कपड़ों से भी सस्ता हो गया है, जिन्हें वे मौसम बदलते ही बदल लेते हैं। परंतु, इस सत्ता में दलबदल की सबसे बड़ी और कड़वी कीमत वह आम आदमी चुका रहा है, जो अपने प्रिय नेता के प्रति अंधे भरोसे में अपने सगे-संबंधियों से दूर हो रहा है।

अनिल शेखीसर, राइटर एण्ड रिपोर्टर 

खाई खोदती राजनीति

हम समाज में ऐसे हजारों उदाहरण देखते हैं, जहाँ लोग केवल अपने पसंदीदा नेता और उनकी पार्टी के प्रति वफादारी साबित करने के चक्कर में अपने भाइयों, मित्रों और पड़ोसियों तक से लड़ बैठते हैं। चुनावी माहौल में परिवारों के भीतर जो कड़वाहट पैदा होती है, वह चुनाव बीतने के बाद भी नहीं मिटती। आज स्थिति यह है कि राजनीतिक मतभेदों के कारण घरों में चूल्हे तो जलते हैं, लेकिन संवाद के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। शादियों, त्योहारों और सुख-दुख के आयोजनों में भी वह ‘चुप्पी’ और दूरियां साफ देखी जा सकती हैं।

विडंबना: समर्थकों का लड़ना और नेताओं का मिलना

सबसे बड़ा दुर्भाग्य उस ‘जहरीली जुबान’ का है, जिसका उपयोग ये नेता चुनावों के दौरान एक-दूसरे के खिलाफ करते हैं। आम आदमी इस उम्मीद में अपने रिश्ते दांव पर लगा देता है कि उसका नेता सच के साथ है, लेकिन कुछ समय बाद वही प्रतिद्वंद्वी नेता एक ही मंच पर गले मिलते, हाथ में हाथ डाले और ठहाके लगाते नजर आते हैं। उनके लिए यह ‘राजनीतिक रणनीति’ हो सकती है, लेकिन समर्थकों के लिए यह उन टूटे हुए रिश्तों का अपमान है जो उनके पीछे बिखर गए।

मतभेद रखें, मनभेद नहीं

समाज की नींव प्यार, सहयोग और आपसी संवाद पर टिकी है, न कि किसी पार्टी के झंडे पर। हमें यह समझने की सख्त जरूरत है कि लोकतंत्र में “मतभेद” होना एक स्वस्थ परंपरा है, लेकिन उस मतभेद की आंच में रिश्तों का “मनभेद” पैदा कर लेना समाज के लिए आत्मघाती है।

नेता तो अपनी सत्ता की सीढ़ियां चढ़कर अगले पड़ाव पर निकल जाएंगे, लेकिन जो दरारें हमारे परिवारों के बीच बन गई हैं, उन्हें भरने वाला कोई नहीं होगा। राजनीति केवल शासन चुनने का माध्यम है, समाज को बांटने का औजार नहीं। अपनी विचारधारा को अपनी पहचान जरूर बनाएं, लेकिन ध्यान रहे कि वह पहचान इतनी भारी न हो जाए कि आपके अपने रिश्ते ही उसके नीचे दब जाएं। याद रखिए, लोकतंत्र में वैचारिक भिन्नता स्वीकार्य है, लेकिन उस भिन्नता का अर्थ रिश्तों का अंत नहीं होना चाहिए।

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