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सनातन की अनदेखी पड़ेगी महंगी! विप्र कल्याण बोर्ड नहीं बना तो बदलेगा सियासी गणित – महेश बसावतिया


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सनातन की अनदेखी पड़ेगी महंगी! विप्र कल्याण बोर्ड नहीं बना तो बदलेगा सियासी गणित – महेश बसावतिया

अन्य समाजों को बोर्ड, विप्र समाज को अपमान, सरकार के दोहरे मापदंडों से खफा ब्राह्मण समाज

जनमानस शेखावाटी संवाददाता : चंद्रकान्त बंका

झुंझुनूं : राज्य सरकार द्वारा विप्र कल्याण बोर्ड के पुनर्गठन को लगातार टालने से अब यह मुद्दा प्रशासनिक न रहकर सीधे तौर पर राजनीतिक और चुनावी रूप लेता जा रहा है। विप्र सेना के प्रदेश वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेश बसावतिया ने सरकार को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो इसका खामियाजा सत्ता पक्ष को आने वाले चुनावों में भुगतना पड़ेगा।

बसावतिया ने कहा कि सनातन संस्कृति की रीढ़ रहे ब्राह्मण समाज को हाशिये पर धकेलना सरकार की बड़ी भूल साबित होगी। जिस समाज ने सदियों तक भारतीय सभ्यता को दिशा दी, वही समाज आज अपने अधिकारों के लिए संघर्ष को मजबूर है। यह स्थिति सरकार की राजनीतिक दूरदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनिंदा समाजों को खुश करने की नीति पर चल रही है। अन्य समाजों के लिए कल्याण बोर्ड सक्रिय हैं, बजट और योजनाएं मौजूद हैं, जबकि विप्र समाज को केवल आश्वासन और उपेक्षा मिली है। यह संतुलन नहीं, बल्कि तुष्टिकरण की राजनीति है, जिसे अब विप्र समाज खुलकर चुनौती देगा।

कांग्रेस से लेकर वर्तमान सरकार तक सवालों के घेरे में

महेश बसावतिया ने कहा कि पूर्व कांग्रेस सरकार ने विप्र कल्याण बोर्ड को जानबूझकर निष्क्रिय रखा, न अधिकार दिए गए, न संसाधन। उन्होंने चेताया कि यदि वर्तमान भाजपा सरकार भी वही रवैया अपनाती है, तो यह जनता के जनादेश की अनदेखी मानी जाएगी, जिसका सीधा असर चुनावी परिणामों में दिखाई देगा।

मुख्यमंत्री को अल्टीमेटम

बसावतिया ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से स्पष्ट मांग की कि सरकार विप्र समाज को हल्के में लेने की भूल न करे। उन्होंने कहा कि-तत्काल विप्र कल्याण बोर्ड का पुनर्गठन किया जाए, बोर्ड को पर्याप्त अधिकार, बजट और स्पष्ट कार्ययोजना दी जाए, नेतृत्व ऐसे सनातननिष्ठ विप्र को सौंपा जाए, जो समाज की आवाज़ को सत्ता के गलियारों तक प्रभावी ढंग से पहुंचा सके।

वोट की ताकत दिखाने का ऐलान

उन्होंने दो टूक कहा कि विप्र समाज अब चुप नहीं बैठेगा। यदि सरकार ने समय रहते निर्णय नहीं लिया, तो प्रदेशभर में चरणबद्ध आंदोलन, जनसंपर्क अभियान व चुनावी बहिष्कार जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यह आंदोलन सड़क से लेकर मतदान केंद्र तक असर दिखाएगा, जिसकी पूरी राजनीतिक जिम्मेदारी सरकार की होगी।

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