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“सर्दियों में पशुओं को स्वस्थ रखेंगे चूने का दूधिया पानी और आयुर्वेदिक लड्डू (दूध+लड्डू)” – डॉ योगेश आर्य (पशुचिकित्सा विशेषज्ञ)


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“सर्दियों में पशुओं को स्वस्थ रखेंगे चूने का दूधिया पानी और आयुर्वेदिक लड्डू (दूध+लड्डू)” – डॉ योगेश आर्य (पशुचिकित्सा विशेषज्ञ)

"सर्दियों में पशुओं को स्वस्थ रखेंगे चूने का दूधिया पानी और आयुर्वेदिक लड्डू (दूध+लड्डू)" - डॉ योगेश आर्य (पशुचिकित्सा विशेषज्ञ)

डॉ योगेश आर्य (पशुचिकित्सा विशेषज्ञ)

सर्दियों में घरों में देशी घी के लड्डू और दूध का नाश्ता करने की परंपरा रही है, पशुपालक विशेषज्ञों के अनुसार अब इसी तर्ज पर पशुओं के लिए भी दूध और लड्डू अर्थात चूने का दूधिया पानी और हर्बल लड्डू उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते है। सर्दियों में भैंसों के प्रसव भी चल रहे है तो दूध बढ़ाने और सर्दी से बचाव के उपाय पशुपालक करते है इसके लिए सर्दियों में भैंस का प्रसव हुआ है तो हफ्ते भर बाद शतावरी, अजवाइन, मैथी, सौंठ और गुड के लड्डू बनाकर खिलाएं। चूने का दूधिया पानी दें ये कैल्शियम की पूर्ति करेगा। सर्दियों में भैंस के ब्याने के बाद अक्सर दूध कम हो जाता है या उसे ठंड लग जाती है। सर्दियों में सिर्फ़ मेथी और गुड़ काफी नहीं है। आपको इसमें ‘सोंठ’ (Dry Ginger) जरूर मिलानी चाहिए।

​सही फार्मूला यह है:
​मेथी: पाचन सही रखेगी, भूख लगेगी
​गुड़: नेगेटिव एनर्जी बैलेंस में नहीं आने देगा
​सोंठ: सर्दी लगने से बचाव, कफ से मुक्ति और पाचन
​शतावरी: हार्मोनल उपचार से दूध बढ़ेगा
अजवाइन : बच्चेदानी की सफाई, गैस आफरा से बचाव
‘इस लड्डू को हमेशा शाम के समय हल्का गर्म (गुनगुना) खिलाएं और ऊपर से ठंडा पानी बिल्कुल न पिलाएं। इससे आपकी भैंस पूरी सर्दी दूध भी बढ़ाएगी और बीमार भी नहीं पड़ेगी।'”
घर पर चूने के पानी (Lime Water) से पशुओं में कैल्सियम की पूर्ति करना एक बहुत ही सस्ता और कारगर घरेलू उपाय है। इसे तैयार करने और देने की सही विधि निम्नलिखित है:

1. चूने का पानी तैयार करने की विधि : 

बर्तन का चुनाव: इसके लिए मिट्टी का घड़ा (मटका) सबसे अच्छा रहता है, क्योंकि चूना भिगोते समय गर्मी (heat) पैदा होती है जिसे मिट्टी का बर्तन आसानी से सोख लेता है।
मिश्रण: एक घड़े में लगभग 5 से 7 लीटर पानी लें और उसमें 1 किलो चूना (कली चूना/पुताई वाला चूना) डाल दें।
सावधानी: चूना डालते समय पानी उबलने लगता है, इसलिए सावधानी बरतें।
स्थिर होने दें: इस घोल को लकड़ी के डंडे से हिलाएं और तीन दिन तक दिन में कई बार इस पानी को हिलाते रहें। फिर अगले 24 घंटे के लिए शांत छोड़ दें। चूना नीचे बैठ जाएगा और ऊपर साफ पानी रह जाएगा।

2. पशु को देने का तरीका और मात्रा :

केवल निथरा हुआ पानी: 24 घंटे बाद, घड़े में ऊपर जो साफ पानी (Supernatant water) है, केवल उसी का उपयोग करना है। नीचे बैठे हुए गाढ़े चूने को पशु को नहीं देना है, इससे पथरी या पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

मात्रा (Dosage):
बड़े पशु (गाय/भैंस): 50 से 100 मिलीलीटर (ml) चूने का साफ पानी।
छोटे पशु (बछड़े/बकरी): 10 से 20 मिलीलीटर (ml)।
देने का तरीका: इस साफ पानी को पशु के पीने के पानी की टंकी (खेली) में मिला दें या पशु के पीने वाले पानी की बाल्टी में डाल दें।

उल्लेखनीय है कि पशुओं की विशेष देखभाल की जरूरत होती है। पशुओं के आवास प्रबंधन, आहार व्यवस्था और समय पर टीकाकरण में लापरवाही बरतने पर पशु बीमार हो जाते है। सर्दियों में गाय भैंस में मुख्यत निमोनिया, मुँहपका खुरपका, थनैला, वायरल दस्त, छोटे बछड़े बछड़ियो में हाइपोथर्मिया जैसे रोग हो जाते हैं। भेड़ बकरियों में पीपीआर या बकरी प्लेग, भेड़ चेचक, फड़किया, वायरल दस्त, हाइपोथर्मिया जैसे रोग हों जाते हैं।

निमोनिया (Pneumonia): सर्दियों के मौसम में यह रोग सबसे ज्यादा देखा जाता है। बछड़ों में यह जानलेवा भी हो सकता है। निमोनिया क्यों होता है? कारण :- ठंडी हवा / कोहरा सीधे छाती पर ठंडी हवा लगने से फेफड़ों में सूजन, गीला-नम बिछावन पर बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं। वेंटिलेशन खराब होने जैसे गौशाला में अमोनिया गैस जमा होना, फेफड़ों को नुकसान। बछड़ों में ख़ास कारण होता है कि जन्म के बाद कोलोस्ट्रम कम मिला तो शरीर का तापमान जल्दी गिरता है और इम्युनिटी कमजोर।

मुख्य लक्षण (Symptoms): तेज और बार बार खांसी या धांसी, नाक से पानी या गाढ़ा सफेद/पीला बलगम, तेज सांस, बुखार (103–105°F), दूध उत्पादन का गिरना
उपचार: पशु चिकित्सक की सलाह से प्रतिजैविक उपचार के साथ ही ये देशी उपचार भी आजमाएं। सफेदा/यूकेलिप्टस की हरी पत्तियां खौलते हुए पानी में डालकर उसकी भाप दें। अजवाइन का धुवां भी दिया जा सकता है।

छोटे बछड़े बछड़ियो की देखभाल : छोटे बछड़े बछड़ियो को गुनगुना पानी पिलाने से डिहाइड्रेशन और कब्ज, पथरी जैसी समस्या नहीं होगी। हफ्ते में एक दो बार तेल का फुआ देने से पाचन भी सही रहेगा और अतिरिक्त ऊर्जा भी मिलेगी।बछड़े बछड़ियो को हाइपोथर्मिया से बचाने के लिए कोलेस्ट्रम जरूर पिलाएं। सुबह शाम टाट बोरी उढ़ाए। दिन में धूप में बांधे। हफ्ते में एक बार हर्ब्स का काढ़ा जिसमें अजवाइन, गिलोय, तुलसी, अदरक और गुड मिलकर देवे। आफरा आने पर तारपीन के तेल को मीठे तेल मिलाकर देवें। हींग का टुकड़ा भी कारगर रहता हैं

मुंहपका खुरपका रोग के कारण देश में प्रतिवर्ष लगभग 20 हजार करोड़ रूपये की आर्थिक हानि होती हैं। प्रदेश के पशुओं को एफ.एम.डी. (Foot And Mouth Disease अर्थात मुंहपका खुरपका रोग) रोगमुक्त करने हेतु राष्ट्रीय पशुरोग नियंत्रण कार्यक्रम अंतर्गत गौ एवं भैंस वंशीय पशुओं के “मुंहपका खुरपका रोग” से बचाव हेतु टीकाकरण अभियान प्रदेशभर में जारी है। एफ.एम.डी. एक विषाणु (पिकोरना वायरस) जनित संक्रामक रोग हैं, जिसका फैलाव हवा द्वारा, या बीमार पशु के झूठे पशुआहार, पानी और दूषित पदार्थो के संपर्क में आने से स्वस्थ पशुओ में हो सकता है।  संकर नस्ल के पशुओं में यह रोग ज्यादा तेजी से फैलता है। इसमें पशु को तेज बुखार, मुंह जीभ मसूड़ों पर छाले और लार गिरना, खुरो के बीच नरम भाग में छाले हो जाने से पशु लंगड़ा कर चलने लगता है। मुंहपका खुरपका रोग होने पर पशु के दूध उत्पादन में अचानक से गिरावट आ जाती हैं। मुंहपका खुरपका रोग हो जाने के बाद पशु गर्मियों में ज्यादा हांफने लगते है पशुओं का वर्ष में 2 बार सामान्यतया मार्च-अप्रैल और सितम्बर-अक्टूबर में मुंहपका खुरपका रोग का टीकाकरण अवश्य करवाए।
देशी आयुर्वेदिक नुस्खे: मसूड़ों और खुरों के छालों को नीम के पानी से धोए, घाव में कीड़े पड़ गए हो तो कपूर/नैप्थेलीन का उपयोग करें।

पी.पी.आर. रोग को बकरी-प्लेग भी कहा जाता हैं। ये रोग भेड़-बकरियों में महामारी की तरह फैलता हैं। सर्दियों में इसकी ज्यादा संभावना होती हैं अतः अब इस रोग के कारक, लक्षण और बचाव के तौर-तरीकों पर विचार करना अतिआवश्यक हैं-

रोगकारक: पी.पी.आर. रोग पैरामिक्सोविरिडी फेमिली के मोर्बिल्ली वंश के वायरस से होता हैं।
रोग के लक्षण:- पी.पी.आर. रोग में मुख्यतया बुखार, नाक से स्त्राव आना, खांसना और न्यूमोनिया जैसे लक्षण प्रमुख हैं। परन्तु कभी कभी मुहं में छाले और पतले खूनी दस्त भी हो जाते हैं। रोग के उपचार के लिए तुरंत वेटरनरी डॉक्टर के पास भेड़-बकरियों को ले जाना चाहिए।

रोग से बचाव : पी.पी.आर. रोग से बचाव के लिए 3 माह से बड़ी भेड़-बकरियों का 3 वर्ष में एक बार टीकाकरण करवाना आवश्यक हैं।  सर्दियां शुरू हो चुकी हैं इसलिए ध्यान रखिये पी.पी.आर. (बकरी-प्लेग) रोग से बचाव के लिए 3 वर्ष में एक बार टीकाकरण करवा कर हम इस नामक महामारी से अपनी भेड़-बकरियों को बचा सकते हैं।

भेड़-माता/भेड़ चेचक:
भेड़-माता (भेड़-चेचक या भेड़-पॉक्स) रोग का रोगकारक “पॉक्स वायरस” होता हैं। इस रोग में बुखार आना और शरीर के ऊन रहित भागो पर मवादभरी फुन्सिया और पपडिया हो जाना तथा पॉक्स चिंह बन जाना मुख्य लक्षण हैं। भेड़ को वेटरनरी डॉक्टर को दिखाकर उपचार करवाना चाहिए। इस रोग से बचाव हेतु 3 माह से बड़ी भेड़ का हर वर्ष दिसम्बर माह में टीकाकरण करवा लेना चाहिए।

थनैला रोग हो जाने पर कढ़ी पत्ता को गुड़ के साथ देवें। नींबू को काटकर पशु को खिलाएं। दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए शतावरी अच्छे परिणाम देता है।

सर्दियों में होने वाले पशु रोगों में देशी आयुर्वेदिक नुस्खे पशुओं के उपचार में कारगर है। पशुओं की अच्छी रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए देशी हर्ब्स का काढ़ा भी दिया जा सकता है। संतुलित आहार जरूर दिया जाना चाहिए। छोटे बछड़े बछड़ियो और मेंमनो को टाट बोरी उढ़ाए, धूप निकलने पर बाहर निकाले, धूप में बांधने से विटामिन डी मिलेगा। अपच होने पर सौंठ हरड़ और सेंधा नमक देना चाहिए।

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